March 1/2021
प्रत्याशित रोड़े अगर अफगानी, ईरानी नहीं बने तो कम से कम पुणेकर तो बन ही जायेंगे, ये सोच क्यों है, इसका तो पता नहीं, परन्तु है अवश्य। अज़ान अच्छी लग सकती है परंतु दबाव में नहीं, खासकर उन लोगों को जिनको कथक से अधिक भरतनाट्यम पसंद है। कथक भी एक अच्छी कला है, कोई भी सांस्कृतिक कला बुरी कैसे हो सकती है?
चंदामामा और बालहंस जैसी पत्रिकाएं या तो समाप्त हो गयी हैं या उनका स्वरूप बदलते ज़माने के साथ परिवर्तित हो गया है।
छोटा पंडित अगर पंडित है तो उसको पंडित होने का बहुत घमंड होता है। बड़े पंडित के साथ ऐसा नहीं होता क्योंकि उसका सत्य से परिचय होता है, और जिसका सत्य से परिचय होता है उसमें घमंड नहीं होता, तब तक जब तक उस घमंड का स्रोत बाहरी न हो।
कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण होती हैं, जैसे कि नेहरू जी का एक आदिवासी महिला को सम्मान स्वरूप माला पहनाया जाने को उसके आदिवासी समाज के नियमों के हिसाब से उस समाज के द्वारा उन्हें विवाहित मान लिया जाना और उसे समाज से निष्काषित कर दिया जाना। लेकिन कुछ घटनाएं द्वेष और घृणा से प्रेरित होती हैं, जो कि आम आदमी के लिए कभी कभी एक सामान्य भावना हो सकती है लेकिन ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के लिए नहीं। अमरीकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने कहा था कि “एक हथौड़े वाले व्यक्ति को हर वस्तु एक कील के समान लगती है”, ये वाक्य खासकर उन लोगों के लिए है जो अपनी ताकत का इस्तेमाल लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए करते हैं, ताकत का ग़लत इस्तेमाल किसी का भला करने के लिए हो तो क्षम्य है, अन्यथा नहीं, लेकिन ऐसे लोगों को क्षमा की आवश्यता भी नहीं होती।
An archive of my writings and a place for my writing experiments and projects.
Wednesday, 16 March 2022
ऊर्जा, शक्ति और आदर्श
Feb 18/2021
आजकल Islam और left में भाईचारा बहुत बढ़ गया है या शायद सदा से रहा है। Left की ideology के हिसाब से उसे दबे कुचलों की मदद करनी चाहिए न कि एक ऐसी philosophy की जो exclusion और oppression पर based हो।
जो लोग मूर्तिपूजा पर विश्वास नहीं करते, वो स्वयं एक “literary deity” पर विश्वास करते हैं। आप परमेश्वर को किसी भी रूप में देख सकते हैं। शिव के रूप में जो प्रेम और क्रोध का प्रतीक हैं, विष्णु के रूप में जो order का प्रतीक हैं, या फिर शक्ति के रूप में।
मैं एक चार्वाक की तरह जीवन व्यतीत करता हूँ पर मैं ऊर्जा में विश्वास करता हूँ, वो ऊर्जा शिव के रूप में भी हो सकती है और शक्ति के रूप में भी, वो ऊर्जा एक शिल्पकार के हाथों से एक मूर्ति में भी जा सकती है और किसी किताब के पन्ने पर भी।
Leftist ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, लेकिन पता नहीं कैसे Islamic ideologies को समर्थन देते हैं। राजनीति मुझे कभी समझ नहीं आती। चार्वाक होने के बावजूद मुझे शिव के मूर्त स्वरूप अथवा ऊर्जा स्वरूप से प्रार्थना करना मुझे सदा से स्वीकार रहा है।
कोई असुर है या देवता ये जीतने वाले decide करते हैं लेकिन मैं बचपन से श्रीराम से प्रभावित रहा हूँ। उसके अपने कारण हैं, और सबसे बड़ा कारण कि मनुष्य होने के नाते श्रीराम relatable हैं। श्रीराम ने भी लंका जाने से पहले शिव की अर्चना की थी, मैं भी कभी कभी कर लेता हूँ। लेकिन जब भी मुझे भय लगता है तो मैं देवी माताओं के पास ही जाता हूँ।
आजकल Islam और left में भाईचारा बहुत बढ़ गया है या शायद सदा से रहा है। Left की ideology के हिसाब से उसे दबे कुचलों की मदद करनी चाहिए न कि एक ऐसी philosophy की जो exclusion और oppression पर based हो।
जो लोग मूर्तिपूजा पर विश्वास नहीं करते, वो स्वयं एक “literary deity” पर विश्वास करते हैं। आप परमेश्वर को किसी भी रूप में देख सकते हैं। शिव के रूप में जो प्रेम और क्रोध का प्रतीक हैं, विष्णु के रूप में जो order का प्रतीक हैं, या फिर शक्ति के रूप में।
मैं एक चार्वाक की तरह जीवन व्यतीत करता हूँ पर मैं ऊर्जा में विश्वास करता हूँ, वो ऊर्जा शिव के रूप में भी हो सकती है और शक्ति के रूप में भी, वो ऊर्जा एक शिल्पकार के हाथों से एक मूर्ति में भी जा सकती है और किसी किताब के पन्ने पर भी।
Leftist ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, लेकिन पता नहीं कैसे Islamic ideologies को समर्थन देते हैं। राजनीति मुझे कभी समझ नहीं आती। चार्वाक होने के बावजूद मुझे शिव के मूर्त स्वरूप अथवा ऊर्जा स्वरूप से प्रार्थना करना मुझे सदा से स्वीकार रहा है।
कोई असुर है या देवता ये जीतने वाले decide करते हैं लेकिन मैं बचपन से श्रीराम से प्रभावित रहा हूँ। उसके अपने कारण हैं, और सबसे बड़ा कारण कि मनुष्य होने के नाते श्रीराम relatable हैं। श्रीराम ने भी लंका जाने से पहले शिव की अर्चना की थी, मैं भी कभी कभी कर लेता हूँ। लेकिन जब भी मुझे भय लगता है तो मैं देवी माताओं के पास ही जाता हूँ।
Bastard प्रदेश, safe spaces और भारतीय संगीत और नृत्य
Dec 6/2020
भारत में 29 राज्य हैं, महाराष्ट्र में विदर्भ को चूसा जा रहा है, और उत्तर प्रदेश राज्य को छोटे राज्यों में अभी विभाजित करना ठीक नहीं। राज्यों का management आसान काम नहीं है लेकिन कम से कम एक राज्य ऐसा होना चाहिये जो संस्कृतियों के मेल को अपना सके।
कई बार हम संस्कृतियों के मेल को bastardization समझते हैं, लेकिन वो fusion भी हो सकता है। खासकर तब जब संस्कृतियाँ उदार हों। कट्टर संस्कृतियों, अगर हम उनको ठीक से समझते हैं तो उनके लिए nip in the bud का expression सही रहेगा, लेकिन ये ध्यान रखना होगा कि ये nip in the bud जब तक बहुत अधिक आवश्यकता न पड़े, क्रूर और हिंसक न हो।
भारत में कई ऐसी जगहें हैं जहां so called bastard प्रदेश बनाये जा सकते हैं, जहां या तो काफी खाली बेकार जमीन है, या फिर जहां का हवा पानी इसको support करता है, जैसे baghiyon की धरती बुंदेलखंड, राजस्थान या फिर north-east या कश्मीर।
हर किसी को खुशी के लिए और recharge होने के लिए safe space चाहिए होती है। अधिकतर लोगों के लिए वो safe space घर और मित्र होते हैं। पुरुषों के लिए safe spaces कम ही हैं, और मित्रों में किये गए हंसी मजाक को भी आजकल locker room talks का नाम दिया जा सकता है तो वो मज़ाक संभाल कर ही किये जायें तो बेहतर है। इन safe spaces की कमी का ही नतीजा है कि आजकल engineer से comedian बनने में समय नहीं लगता। मैं साफ सुथरी comedy का पक्षधर हूँ लेकिन जब ऋषिकेश मुखर्जी जैसे साफ सुथरी फिल्में बनाने वाले व्यक्ति का t o too से g o gu हो सकता है तो दोस्तों के बीच थोड़े बहुत भद्दे मज़ाक तो चल ही सकते हैं, दोस्तों के बीच, महिलाओं के बीच तभी अगर वो मित्र हैं, अगर आपका समाज महिला से मित्रता करने की अनुमति दे तो।
मुझे भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मामले में मैं थोड़ा purist हूँ। मुझे fusion और subcultures का music पसंद है मगर एक अलग genre के रूप में। मुझे भरतनाट्यम और कथकली अच्छे लगते हैं, मुझे गंगी जमुनी तहज़ीब पसंद थी परंतु आजकल के blatant propaganda के चलते मन उठ सा गया है। अटल बिहारी वाजपेयी कहते थे “मतभेद हों पर मनभेद न हों” पर आजकल के हालात कुछ और ही हैं।
भारत में 29 राज्य हैं, महाराष्ट्र में विदर्भ को चूसा जा रहा है, और उत्तर प्रदेश राज्य को छोटे राज्यों में अभी विभाजित करना ठीक नहीं। राज्यों का management आसान काम नहीं है लेकिन कम से कम एक राज्य ऐसा होना चाहिये जो संस्कृतियों के मेल को अपना सके।
कई बार हम संस्कृतियों के मेल को bastardization समझते हैं, लेकिन वो fusion भी हो सकता है। खासकर तब जब संस्कृतियाँ उदार हों। कट्टर संस्कृतियों, अगर हम उनको ठीक से समझते हैं तो उनके लिए nip in the bud का expression सही रहेगा, लेकिन ये ध्यान रखना होगा कि ये nip in the bud जब तक बहुत अधिक आवश्यकता न पड़े, क्रूर और हिंसक न हो।
भारत में कई ऐसी जगहें हैं जहां so called bastard प्रदेश बनाये जा सकते हैं, जहां या तो काफी खाली बेकार जमीन है, या फिर जहां का हवा पानी इसको support करता है, जैसे baghiyon की धरती बुंदेलखंड, राजस्थान या फिर north-east या कश्मीर।
हर किसी को खुशी के लिए और recharge होने के लिए safe space चाहिए होती है। अधिकतर लोगों के लिए वो safe space घर और मित्र होते हैं। पुरुषों के लिए safe spaces कम ही हैं, और मित्रों में किये गए हंसी मजाक को भी आजकल locker room talks का नाम दिया जा सकता है तो वो मज़ाक संभाल कर ही किये जायें तो बेहतर है। इन safe spaces की कमी का ही नतीजा है कि आजकल engineer से comedian बनने में समय नहीं लगता। मैं साफ सुथरी comedy का पक्षधर हूँ लेकिन जब ऋषिकेश मुखर्जी जैसे साफ सुथरी फिल्में बनाने वाले व्यक्ति का t o too से g o gu हो सकता है तो दोस्तों के बीच थोड़े बहुत भद्दे मज़ाक तो चल ही सकते हैं, दोस्तों के बीच, महिलाओं के बीच तभी अगर वो मित्र हैं, अगर आपका समाज महिला से मित्रता करने की अनुमति दे तो।
मुझे भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मामले में मैं थोड़ा purist हूँ। मुझे fusion और subcultures का music पसंद है मगर एक अलग genre के रूप में। मुझे भरतनाट्यम और कथकली अच्छे लगते हैं, मुझे गंगी जमुनी तहज़ीब पसंद थी परंतु आजकल के blatant propaganda के चलते मन उठ सा गया है। अटल बिहारी वाजपेयी कहते थे “मतभेद हों पर मनभेद न हों” पर आजकल के हालात कुछ और ही हैं।
जापान और दूध
Dec 6/2020
विश्व के सारे देशों में जापान culturally शायद मेरा सबसे favourite देश है। मुझे honour का concept बहुत पसंद है, हमारे यहां honour among thieves कुछ ज़्यादा ही है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जापान में suicide cases कुछ अधिक ही हो रहे हैं। Tattoos medically scars होते हैं, और जब मुझे लगा कि मैं dishonoured हो गया हूँ तो फिर मैंने Japanese Tattoo ही बनवाया, जापानी mein “Ronin”. मुझे एक और tattoo बनवाना है, बांग्ला में “शाह”(শাহ), कारण आप guess करते रहिए।
जापान एक polytheistic देश है, और हालांकि मैं परमेश्वर में मानता हूं, मेरा विश्वास mother goddesses में भी है, और मुझे बौद्ध स्तूपों में भी बहुत शांति मिलती है। मुझे जापानी cosmology पसंद है, हालांकि मेरा विश्वास भारतीय cosmology और वैज्ञानिक cosmology में है।
मैंने news में देखा कि लोग कहते हैं कि जापान एक racist देश है, मेरा मानना है कि अगर आप के पास जमीन के नाम पर सिर्फ कुछ islands हो तो आप भी racist होंगे। कम से कम वो दूसरे देशों में आतंकवाद तो नहीं फैला रहा।
दूध को एक complete खाद्य पदार्थ माना गया है। भारत में गांवों में इसका ज़िम्मा यादव जी लोगों ने ले रखा है। विदेशों में कई जगह दूध मशीन से निकाला जाता है। मुझे गर्म दूध पीना पसंद है, और चाय और coffee भी मैं दूध वाली अधिक पसंद करता हूँ। दूध में Horlicks डाल कर पीना मुझे पसंद है। भारत में गाय का दूध हाथ से दुहा जाता है लेकिन कभी कभी यही काम machines भी करती हैं। आवश्यक यही है कि जब गायों का दूध machines से दुहा जाए तो ये काम gently किया जाए।
विश्व के सारे देशों में जापान culturally शायद मेरा सबसे favourite देश है। मुझे honour का concept बहुत पसंद है, हमारे यहां honour among thieves कुछ ज़्यादा ही है। मैंने कहीं पढ़ा था कि जापान में suicide cases कुछ अधिक ही हो रहे हैं। Tattoos medically scars होते हैं, और जब मुझे लगा कि मैं dishonoured हो गया हूँ तो फिर मैंने Japanese Tattoo ही बनवाया, जापानी mein “Ronin”. मुझे एक और tattoo बनवाना है, बांग्ला में “शाह”(শাহ), कारण आप guess करते रहिए।
जापान एक polytheistic देश है, और हालांकि मैं परमेश्वर में मानता हूं, मेरा विश्वास mother goddesses में भी है, और मुझे बौद्ध स्तूपों में भी बहुत शांति मिलती है। मुझे जापानी cosmology पसंद है, हालांकि मेरा विश्वास भारतीय cosmology और वैज्ञानिक cosmology में है।
मैंने news में देखा कि लोग कहते हैं कि जापान एक racist देश है, मेरा मानना है कि अगर आप के पास जमीन के नाम पर सिर्फ कुछ islands हो तो आप भी racist होंगे। कम से कम वो दूसरे देशों में आतंकवाद तो नहीं फैला रहा।
दूध को एक complete खाद्य पदार्थ माना गया है। भारत में गांवों में इसका ज़िम्मा यादव जी लोगों ने ले रखा है। विदेशों में कई जगह दूध मशीन से निकाला जाता है। मुझे गर्म दूध पीना पसंद है, और चाय और coffee भी मैं दूध वाली अधिक पसंद करता हूँ। दूध में Horlicks डाल कर पीना मुझे पसंद है। भारत में गाय का दूध हाथ से दुहा जाता है लेकिन कभी कभी यही काम machines भी करती हैं। आवश्यक यही है कि जब गायों का दूध machines से दुहा जाए तो ये काम gently किया जाए।
अंतरिक्ष और Space Exploration
Dec 5/2020
एकता कपूर के serials से पहले दूरदर्शन पर अंतरिक्ष के बारे में कई serials आते थे। आजकल सारे young scientists twitter पर BJP vs. Congress कर रहे हैं या फिर youtube पर Divine का Mirchi Mirchi गाना सुन रहे हैं। रंगीनमिजाज जनता alt Balaji पर “गंदी बात” देख रही है, और कई लोग चाहते न चाहते हुए भी “Love Charzzing” करते हुए घूम रहे हैं।
Doctors अपना काम कर रहे हैं, और homeopathic doctors pharma companies के दास बन कर अपना काम भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं और “similar suffering” का अनुभव कर रहे हैं।
Bangalore में बैठे computer engineers masturbation करते हुए surangini गाते हुए अपने engineer दिमाग से लोगों को judge कर रहे हैं। किसी काम में race या caste नहीं देखनी चाहिए लेकिन “जिसका काम उसी को साझे” वाली बात भी ध्यान रखनी चाहिए। कुछ काम, जैसे लोगों के लिए algorithm बनाने वाले, mixed race/caste के हों तो ज़्यादा अच्छा है। अपने आप को superior समझने वाले लोग, लोगों के लिए algorithms बनाएंगे तो उसमें भेदभाव रहेगा, और अधिक प्रताड़ित लोग algorithm बनाएंगे तो उसमें बदले की भावना रहेगी।
आज की दुनिया में Space Exploration आवश्यक है, और मेरे विचार से इसका ज़िम्मा United Nations को लेना चाहिए। दूसरे ग्रहों के “coloniz(s)ation" के लिए जितना खाद चाहिए, दुनिया के सारे “streetshitters” भी अगर लग जाएं तो काफी मेहनत लगेगी। साथ ही, जितनी ऊर्जा चाहिए, उसमें दुनिया के पूरे nuclear arsenal की आवश्यकता पड़ेगी, साथ ही pharma companies को असली बीमारियों की दवाइयां बनाने का मौका भी मिलेगा।
एकता कपूर के serials से पहले दूरदर्शन पर अंतरिक्ष के बारे में कई serials आते थे। आजकल सारे young scientists twitter पर BJP vs. Congress कर रहे हैं या फिर youtube पर Divine का Mirchi Mirchi गाना सुन रहे हैं। रंगीनमिजाज जनता alt Balaji पर “गंदी बात” देख रही है, और कई लोग चाहते न चाहते हुए भी “Love Charzzing” करते हुए घूम रहे हैं।
Doctors अपना काम कर रहे हैं, और homeopathic doctors pharma companies के दास बन कर अपना काम भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं और “similar suffering” का अनुभव कर रहे हैं।
Bangalore में बैठे computer engineers masturbation करते हुए surangini गाते हुए अपने engineer दिमाग से लोगों को judge कर रहे हैं। किसी काम में race या caste नहीं देखनी चाहिए लेकिन “जिसका काम उसी को साझे” वाली बात भी ध्यान रखनी चाहिए। कुछ काम, जैसे लोगों के लिए algorithm बनाने वाले, mixed race/caste के हों तो ज़्यादा अच्छा है। अपने आप को superior समझने वाले लोग, लोगों के लिए algorithms बनाएंगे तो उसमें भेदभाव रहेगा, और अधिक प्रताड़ित लोग algorithm बनाएंगे तो उसमें बदले की भावना रहेगी।
आज की दुनिया में Space Exploration आवश्यक है, और मेरे विचार से इसका ज़िम्मा United Nations को लेना चाहिए। दूसरे ग्रहों के “coloniz(s)ation" के लिए जितना खाद चाहिए, दुनिया के सारे “streetshitters” भी अगर लग जाएं तो काफी मेहनत लगेगी। साथ ही, जितनी ऊर्जा चाहिए, उसमें दुनिया के पूरे nuclear arsenal की आवश्यकता पड़ेगी, साथ ही pharma companies को असली बीमारियों की दवाइयां बनाने का मौका भी मिलेगा।
क्या आपने देखा है?
Dec 5/2020
क्या आपने किसी सरदार जी को लगातार टैक्स भरते रहने के बावजूद “की करां टैक्स खत्म ही नी हुँदा” बोलते देखा है?
क्या आपने किसी को जिससे वो प्रेम करता है अपने प्रियजन को अपनी की आंखों के सामने मरते देखा है?
क्या आपने किसी डॉक्टर को अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते देखा है क्योंकि वो डॉक्टर है?
क्या आपने french film Perfume ‘minus the murders part' देखा है?
क्या आपने हाफिज सईद को नौजवानों के हाथों में बंदूक पकड़ाते हुए देखा है?
क्या आपने लोगों को किसी को उस subject के बारे में जिसके बारे में उन्हें ज्ञान नहीं है, ज्ञान देते देखा है?
क्या आपने लोगों को porn देखते देखा है?
क्या आपने किसी को लगातार यातना दे कर, अपनी कही करवाते देखा है?
क्या आपने किसी बीमार आदमी को लगातार टैक्स भरते देखा है?
क्या आपने कठपुतली के खेल को देखा है?
क्या आपने भगवान को बदतमीज़ी से बात करते देखा है?
क्या आपने दी गयी मदद को भी यातना में तब्दील होते देखा है?
क्या आपने ‘रन’ फ़िल्म में विजय राज़ को देखा है?
क्या आपने गधे को अपने सिर से बंधी गाजर के पीछे दौड़ते देखा है?
क्या आपने Nokia 6600 पर ‘चूतिये’ बजते सुना है?
क्या आपने आदमखोरों को, जिसको वो खा रहे हैं, उसी को आदमखोर बोलते सुना है?
क्या आपने किसी सरदार जी को लगातार टैक्स भरते रहने के बावजूद “की करां टैक्स खत्म ही नी हुँदा” बोलते देखा है?
क्या आपने किसी को जिससे वो प्रेम करता है अपने प्रियजन को अपनी की आंखों के सामने मरते देखा है?
क्या आपने किसी डॉक्टर को अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते देखा है क्योंकि वो डॉक्टर है?
क्या आपने french film Perfume ‘minus the murders part' देखा है?
क्या आपने हाफिज सईद को नौजवानों के हाथों में बंदूक पकड़ाते हुए देखा है?
क्या आपने लोगों को किसी को उस subject के बारे में जिसके बारे में उन्हें ज्ञान नहीं है, ज्ञान देते देखा है?
क्या आपने लोगों को porn देखते देखा है?
क्या आपने किसी को लगातार यातना दे कर, अपनी कही करवाते देखा है?
क्या आपने किसी बीमार आदमी को लगातार टैक्स भरते देखा है?
क्या आपने कठपुतली के खेल को देखा है?
क्या आपने भगवान को बदतमीज़ी से बात करते देखा है?
क्या आपने दी गयी मदद को भी यातना में तब्दील होते देखा है?
क्या आपने ‘रन’ फ़िल्म में विजय राज़ को देखा है?
क्या आपने गधे को अपने सिर से बंधी गाजर के पीछे दौड़ते देखा है?
क्या आपने Nokia 6600 पर ‘चूतिये’ बजते सुना है?
क्या आपने आदमखोरों को, जिसको वो खा रहे हैं, उसी को आदमखोर बोलते सुना है?
संयुक्त राष्ट्र की बेबसी क्यों?
Dec 4/2020
हम सोच सकते हैं कि मानव के अंदर की पाशविक प्रवृत्ति अभी तक दूर नहीं हुई है जब संयुक्त राष्ट्र जो कि सारे राष्ट्रों का संगठन है इतना बेबस है कि वो विश्व में होने वाली हिंसा को नहीं रोक पाए। संगठन में शक्ति होती है ये हमें school में पढ़ाया जाता है लेकिन जब कभी भी विश्व में कोई घटना होती है संयुक्त राष्ट्र हल निकालने में असमर्थ रहता है। ऐसे संगठन का क्या अर्थ जो लोगों को मरने दे, या global problems का हल ही न निकाल पाये, वो भी तब जब उसके पास पूरे विश्व के specialists हों।
कश्मीर का हल अभी तक नहीं निकल पाया। समस्या पैदा होने पर तब तक इंतज़ार होता है जब तक समस्या और complicated न हो जाये। सामान्य मानवता और policy समझना क्या इतना कठिन है? या फिर संयुक्त राष्ट्र अभी भी religion और race की बेड़ियों को नहीं तोड़ पाया है।
World Trade Centre पर हमला होता है तो USA की सेना क्यों जाती है और उसकी मदद को NATO की सेना क्यों जाती है, जो कि (ध्यान देने के लिए माफ करियेगा) एक particular race को belong करती है। वहां UN की सेना क्यों नहीं जाती? क्या इतने लोगों की मृत्यु से सारे देशों के संगठन को कोई फर्क नहीं पड़ता?
Ethiopia में लोग मारे जा रहे हैं पर Peacekeeping Force peacekeeping होने के साथ साथ एक force भी है। Observe करने के लिए observers, analysts और बुद्धिजीवी हैं। Force तभी deploy होती है जब force की आवश्यकता होती है। Peacekeeping force को normal force से कहीं अधिक चेतावनियां देना आवश्यक है, लेकिन केवल observer बने रहना एक force को शोभा नहीं देता। Observing force deploy करने का काम है, फ़ोर्स deploy करने के बाद का नहीं। UN involved में मारे जाने वालों को उतना सम्मान नहीं मिलता नहीं दिखता जितना normally सैनिकों को मिलता है।
हम सोच सकते हैं कि मानव के अंदर की पाशविक प्रवृत्ति अभी तक दूर नहीं हुई है जब संयुक्त राष्ट्र जो कि सारे राष्ट्रों का संगठन है इतना बेबस है कि वो विश्व में होने वाली हिंसा को नहीं रोक पाए। संगठन में शक्ति होती है ये हमें school में पढ़ाया जाता है लेकिन जब कभी भी विश्व में कोई घटना होती है संयुक्त राष्ट्र हल निकालने में असमर्थ रहता है। ऐसे संगठन का क्या अर्थ जो लोगों को मरने दे, या global problems का हल ही न निकाल पाये, वो भी तब जब उसके पास पूरे विश्व के specialists हों।
कश्मीर का हल अभी तक नहीं निकल पाया। समस्या पैदा होने पर तब तक इंतज़ार होता है जब तक समस्या और complicated न हो जाये। सामान्य मानवता और policy समझना क्या इतना कठिन है? या फिर संयुक्त राष्ट्र अभी भी religion और race की बेड़ियों को नहीं तोड़ पाया है।
World Trade Centre पर हमला होता है तो USA की सेना क्यों जाती है और उसकी मदद को NATO की सेना क्यों जाती है, जो कि (ध्यान देने के लिए माफ करियेगा) एक particular race को belong करती है। वहां UN की सेना क्यों नहीं जाती? क्या इतने लोगों की मृत्यु से सारे देशों के संगठन को कोई फर्क नहीं पड़ता?
Ethiopia में लोग मारे जा रहे हैं पर Peacekeeping Force peacekeeping होने के साथ साथ एक force भी है। Observe करने के लिए observers, analysts और बुद्धिजीवी हैं। Force तभी deploy होती है जब force की आवश्यकता होती है। Peacekeeping force को normal force से कहीं अधिक चेतावनियां देना आवश्यक है, लेकिन केवल observer बने रहना एक force को शोभा नहीं देता। Observing force deploy करने का काम है, फ़ोर्स deploy करने के बाद का नहीं। UN involved में मारे जाने वालों को उतना सम्मान नहीं मिलता नहीं दिखता जितना normally सैनिकों को मिलता है।
सन्यासी, साधु, स्वामी, नाविक, यांत्रिक और तांत्रिक
Dec 3/2020
समाचारों में जब भी किसी तांत्रिक के बारे में पढ़ने को मिलता है, कई बार वो मुस्लिम निकलता है। इसमें कोई बुराई नहीं है अगर वो व्यक्ति सच में तांत्रिक हो। हम तंत्रों से घिरे हुए हैं, जनतंत्र, संचारतंत्र, प्रजातंत्र आदि। भारत में कई बार सड़क पर निकलने पर आपको टोटके दिख जाएंगे। भारतीय महिलाएं अपने बच्चों को बचाने के लिए कितने यत्न करती हैं। भारत में धर्मशास्त्रों और रीति रिवाजों के अतिरिक्त तंत्र विद्या भी है। अगर तंत्र विद्या सच में है, तो मुझे लगता है कि उसका उपयोग केवल आत्मरक्षा में करना उचित होगा। मुझे लगता है कि कई बार तथाकथित मुस्लिम ‘तांत्रिकों’ को तांत्रिक कहना उचित नहीं होगा।
साधु शब्द का अर्थ ‘सज्जनता’ के निकट है पर कई बार परिस्थितियों के तंत्र में उलझ कर वो कितना भी चाहते हुए सज्जन नहीं रह पाता। फिर भी साधु तो साधु होता है। मेरे मन में सच्चे सन्यासियों और साधुओं के प्रति बहुत आदर और श्रद्धा है। मैं उतना धार्मिक न होने के कारण यांत्रिकों में विश्वास रखता हूँ लेकिन ISRO के अतिरिक्त अन्य यांत्रिकों ने अधिकतर निराश ही किया है।
सज्जनता और सज्जन पुरुष मुझे बहुत प्रिय हैं लेकिन मेरा व्यवहार नाविकों की तरह होने के कारण मैं उनसे दूर ही रहने का प्रयत्न करता हूँ।
भारत में कई प्रकार के सम्प्रदाय हैं, कश्मीर शैव उनमें से एक है। मुझे स्वर्ण मंदिर में जितनी शांति मिलती है उतनी ही शांति कश्मीर शैव, मंदिरों मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय मंदिरों, बौद्ध स्तूपों और नाथ सम्प्रदाय के बारे में पढ़ कर मिलती है। यहां “यही तो खूबसूरती है इस देश की साहिब” कहना एकदम उचित होगा।
समाचारों में जब भी किसी तांत्रिक के बारे में पढ़ने को मिलता है, कई बार वो मुस्लिम निकलता है। इसमें कोई बुराई नहीं है अगर वो व्यक्ति सच में तांत्रिक हो। हम तंत्रों से घिरे हुए हैं, जनतंत्र, संचारतंत्र, प्रजातंत्र आदि। भारत में कई बार सड़क पर निकलने पर आपको टोटके दिख जाएंगे। भारतीय महिलाएं अपने बच्चों को बचाने के लिए कितने यत्न करती हैं। भारत में धर्मशास्त्रों और रीति रिवाजों के अतिरिक्त तंत्र विद्या भी है। अगर तंत्र विद्या सच में है, तो मुझे लगता है कि उसका उपयोग केवल आत्मरक्षा में करना उचित होगा। मुझे लगता है कि कई बार तथाकथित मुस्लिम ‘तांत्रिकों’ को तांत्रिक कहना उचित नहीं होगा।
साधु शब्द का अर्थ ‘सज्जनता’ के निकट है पर कई बार परिस्थितियों के तंत्र में उलझ कर वो कितना भी चाहते हुए सज्जन नहीं रह पाता। फिर भी साधु तो साधु होता है। मेरे मन में सच्चे सन्यासियों और साधुओं के प्रति बहुत आदर और श्रद्धा है। मैं उतना धार्मिक न होने के कारण यांत्रिकों में विश्वास रखता हूँ लेकिन ISRO के अतिरिक्त अन्य यांत्रिकों ने अधिकतर निराश ही किया है।
सज्जनता और सज्जन पुरुष मुझे बहुत प्रिय हैं लेकिन मेरा व्यवहार नाविकों की तरह होने के कारण मैं उनसे दूर ही रहने का प्रयत्न करता हूँ।
भारत में कई प्रकार के सम्प्रदाय हैं, कश्मीर शैव उनमें से एक है। मुझे स्वर्ण मंदिर में जितनी शांति मिलती है उतनी ही शांति कश्मीर शैव, मंदिरों मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय मंदिरों, बौद्ध स्तूपों और नाथ सम्प्रदाय के बारे में पढ़ कर मिलती है। यहां “यही तो खूबसूरती है इस देश की साहिब” कहना एकदम उचित होगा।
खरोष्ठी, कैथी, मोदी और शारदा लिपियाँ और Woke और Enlightened का अंतर
Dec 3/2020
भारत में कई लिपियाँ हैं, और कई लिपियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। देवनागरी लिपि का प्रयोग लगभग पूरे उत्तर भारत में होता है। अरबी और पर्शियन लिपि का उपयोग भारत में एक समुदाय अधिक करता है और अधिकतर जनता ये लिपियाँ न जानने के अभाव में ये जानने से वंचित रह जाती हैं कि जो अखबार इन लिपियों में खबर छापते हैं वो क्या कह रहे हैं। भारत की कई लिपियाँ अब विलुप्त हो चुकी हैं जैसे खरोष्ठी, कैथी, मोदी और शारदा। लिपियाँ इस लिए आवश्यक हैं क्योंकि बच्चे लिपियों के द्वारा ही शिक्षा पाते हैं।
कई बार अपनी local भाषा के कारण उनको तुच्छ समझा जाता है, लेकिन लिपि उस भाषा को पहचान देती है, और फिर किसी दूसरे के उसे तुच्छ समझने से फर्क नहीं पड़ता।
भारत में सरकारी कार्यों के लिए पर्शियन का प्रयोग हो सकता है लेकिन शारदा और खरोष्ठी जैसी लिपियाँ प्रयोग से बाहर हो जाती हैं।
भाषा की बात करें तो मैंने संस्कृत स्कूल में पढ़ी थी, मैं धर्म ग्रंथ पढ़ने के लिए proper संस्कृत सीखना चाहता था लेकिन मैं स्वयं को उस लायक नहीं समझता। रोमन लिपि लिखने में आसान है, खासकर electronic devices पर तो इससे काम चल जाता है।
Electronic education का ही कमाल है कि आजकल की युवा जनता woke हो चुकी है, मैं पहले शब्दों के चयन पर विश्वास नहीं करता था क्योंकि मुझे लगता था कि भावनाओं से काम चल जाएगा, लेकिन जैसे जैसे उम्र (आयु) बढ़ी, ये समझ आया कि शब्दों सही चयन बहुत आवश्यक है, तब भी जब आप कोई celebrity न हों। मुझे woke होने में कोई बुराई नहीं लगती लेकिन कभी कभी ये ज़्यादा हो जाता है। जैसे लिंग परिवर्तन करवाना, मैं समझ सकता हूँ कि जो लिंग परिवर्तन करवाते हैं वो क्यों करवाते हैं क्योंकि मेरी संस्कृति में भी ‘लवंडा’ और ‘मउगड़ा’ प्रथा चली आ रही है, लेकिन अगर कोई पुरुष स्त्री जैसा महसूस करे तो वो स्त्री वेश में रहे जैसा कि आजतक भारत में चला आ रहा है। लेकिन मैं ज़्यादा नहीं कहूंगा क्योंकि मेरे favourite Hollywood directors Wachowskis ने भी लिंग परिवर्तन करवाया है। मेरा अपना मानना है कि ईश्वर या प्रकृति, जिसमें भी आप मानते हैं, ने आपको लिंग दिया है आप उसका धर्म निभाइये, लेकिन जा के पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई। प्राकृतिक transgenders से मेरी पूरी सहानुभूति है। समाज अलग लोगों पर कठोर होता है। मैं woke हूँ पर मेरा woke, enlightenment की तरफ वाला अधिक है। आवश्यकता से अधिक woke militant हो जाता है लेकिन enlightened व्यक्ति संतुलन बनाये रखने का प्रयत्न करता है।
भारत में कई लिपियाँ हैं, और कई लिपियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। देवनागरी लिपि का प्रयोग लगभग पूरे उत्तर भारत में होता है। अरबी और पर्शियन लिपि का उपयोग भारत में एक समुदाय अधिक करता है और अधिकतर जनता ये लिपियाँ न जानने के अभाव में ये जानने से वंचित रह जाती हैं कि जो अखबार इन लिपियों में खबर छापते हैं वो क्या कह रहे हैं। भारत की कई लिपियाँ अब विलुप्त हो चुकी हैं जैसे खरोष्ठी, कैथी, मोदी और शारदा। लिपियाँ इस लिए आवश्यक हैं क्योंकि बच्चे लिपियों के द्वारा ही शिक्षा पाते हैं।
कई बार अपनी local भाषा के कारण उनको तुच्छ समझा जाता है, लेकिन लिपि उस भाषा को पहचान देती है, और फिर किसी दूसरे के उसे तुच्छ समझने से फर्क नहीं पड़ता।
भारत में सरकारी कार्यों के लिए पर्शियन का प्रयोग हो सकता है लेकिन शारदा और खरोष्ठी जैसी लिपियाँ प्रयोग से बाहर हो जाती हैं।
भाषा की बात करें तो मैंने संस्कृत स्कूल में पढ़ी थी, मैं धर्म ग्रंथ पढ़ने के लिए proper संस्कृत सीखना चाहता था लेकिन मैं स्वयं को उस लायक नहीं समझता। रोमन लिपि लिखने में आसान है, खासकर electronic devices पर तो इससे काम चल जाता है।
Electronic education का ही कमाल है कि आजकल की युवा जनता woke हो चुकी है, मैं पहले शब्दों के चयन पर विश्वास नहीं करता था क्योंकि मुझे लगता था कि भावनाओं से काम चल जाएगा, लेकिन जैसे जैसे उम्र (आयु) बढ़ी, ये समझ आया कि शब्दों सही चयन बहुत आवश्यक है, तब भी जब आप कोई celebrity न हों। मुझे woke होने में कोई बुराई नहीं लगती लेकिन कभी कभी ये ज़्यादा हो जाता है। जैसे लिंग परिवर्तन करवाना, मैं समझ सकता हूँ कि जो लिंग परिवर्तन करवाते हैं वो क्यों करवाते हैं क्योंकि मेरी संस्कृति में भी ‘लवंडा’ और ‘मउगड़ा’ प्रथा चली आ रही है, लेकिन अगर कोई पुरुष स्त्री जैसा महसूस करे तो वो स्त्री वेश में रहे जैसा कि आजतक भारत में चला आ रहा है। लेकिन मैं ज़्यादा नहीं कहूंगा क्योंकि मेरे favourite Hollywood directors Wachowskis ने भी लिंग परिवर्तन करवाया है। मेरा अपना मानना है कि ईश्वर या प्रकृति, जिसमें भी आप मानते हैं, ने आपको लिंग दिया है आप उसका धर्म निभाइये, लेकिन जा के पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई। प्राकृतिक transgenders से मेरी पूरी सहानुभूति है। समाज अलग लोगों पर कठोर होता है। मैं woke हूँ पर मेरा woke, enlightenment की तरफ वाला अधिक है। आवश्यकता से अधिक woke militant हो जाता है लेकिन enlightened व्यक्ति संतुलन बनाये रखने का प्रयत्न करता है।
तिल का ताड़
Dec 1/2020
बचपन में मैं अक्सर ताड़ी बनाने वालों को ताड़ के पेड़ पर चढ़ते उतरते देखता था। खुशी ढूंढने वाले हर परिस्थिति में खुशी ढूंढ लेते हैं और कभी कभी वो खुशी नशों में मिलती है, तो फिर नशे करने वाले हर कीमत पर अपना नशा ढूंढने की कोशिश करते हैं।
सरदार जी दूसरों को पानी क्यों पिलाते हैं, इसलिए कि उनके धर्म में लिखा है।
जो लोग बहुत दर्द में होते हैं उनको morphine दी जाती है, morphine यानी कि अफीम। मुझे cigarette पीने की आदत है, मैं इसको नशा नहीं मानता था पर सामाजिक perception के कारण मानना पड़ा।
हर व्यक्ति का धर्म कुछ कहता है, मैं किन्ही कारणों से उतना धार्मिक नहीं बन पाया, और प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने, और अनुसंधान करने पर विश्वास करने लगा। मेरे अनुभवों के आधार पर ये रास्ता अपनाने का सुझाव कम ही लोगों को दूंगा।
विश्व कैसा हो हर व्यक्ति का अपना मत है, कोई स्वार्थ के आधार पर सोचता है, कोई सबके भले के आधार पर। सबका भला चाहना भी एक तरह का स्वार्थ ही है, और इन दोनों में कौन सा सही है, ईश्वर ही जानता है।
विज्ञान वाला मैं विज्ञान पर focus करता है पर सामाजिक मैं जो कि कहीं दबा हुआ सा है, देवी-देवताओं पर विश्वास करता है। किस तरह से करता है अगर मैं समझाने का प्रयास भी करूँ तो समझाना कठिन होगा तो मैं रहने ही देता हूँ।
कितनी अजीब बात है न, बचपन में जब हम शैतानी करते हैं तो हमारे माता पिता मार लगाते हैं, या कम से कम डांट तो लगाते ही हैं। यहां Islamic State आतंकवाद फैला रहा है तो उसकी जन्मभूमि और इस्लाम की जन्मभूमि उसके खिलाफ कुछ कर क्यों नहीं रही। क्या उन्हें ऐसा विश्व नहीं चाहिए जिसमें कम से कम ईश्वर के नाम पर दूसरों को दुख न दिया जाए।
आपस में commonality ढूंढने की जगह हम हमेशा differences ढूंढते हैं। Islamophobia बुरा लगता है लेकिन आप उसको militant तरीके से दूर करेंगे तो वो कैसे दूर होगा। कोई कारण तो होगा, उस कारण के मूल तक जाने के बजाय, भटके नौजवानों को हिंसा, आतंक और बलात्कार के रास्ते पर भेज दिया जाता है। कुछ भटके नौजवान condom का इस्तेमाल करके खुशी से darwin award ग्रहण कर लेते हैं, कुछ इतने दुखित होते हैं कि प्रेम करके और tweet करके ही Darwin award प्राप्त कर लेते हैं।
Note: Cigarette पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
बचपन में मैं अक्सर ताड़ी बनाने वालों को ताड़ के पेड़ पर चढ़ते उतरते देखता था। खुशी ढूंढने वाले हर परिस्थिति में खुशी ढूंढ लेते हैं और कभी कभी वो खुशी नशों में मिलती है, तो फिर नशे करने वाले हर कीमत पर अपना नशा ढूंढने की कोशिश करते हैं।
सरदार जी दूसरों को पानी क्यों पिलाते हैं, इसलिए कि उनके धर्म में लिखा है।
जो लोग बहुत दर्द में होते हैं उनको morphine दी जाती है, morphine यानी कि अफीम। मुझे cigarette पीने की आदत है, मैं इसको नशा नहीं मानता था पर सामाजिक perception के कारण मानना पड़ा।
हर व्यक्ति का धर्म कुछ कहता है, मैं किन्ही कारणों से उतना धार्मिक नहीं बन पाया, और प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने, और अनुसंधान करने पर विश्वास करने लगा। मेरे अनुभवों के आधार पर ये रास्ता अपनाने का सुझाव कम ही लोगों को दूंगा।
विश्व कैसा हो हर व्यक्ति का अपना मत है, कोई स्वार्थ के आधार पर सोचता है, कोई सबके भले के आधार पर। सबका भला चाहना भी एक तरह का स्वार्थ ही है, और इन दोनों में कौन सा सही है, ईश्वर ही जानता है।
विज्ञान वाला मैं विज्ञान पर focus करता है पर सामाजिक मैं जो कि कहीं दबा हुआ सा है, देवी-देवताओं पर विश्वास करता है। किस तरह से करता है अगर मैं समझाने का प्रयास भी करूँ तो समझाना कठिन होगा तो मैं रहने ही देता हूँ।
कितनी अजीब बात है न, बचपन में जब हम शैतानी करते हैं तो हमारे माता पिता मार लगाते हैं, या कम से कम डांट तो लगाते ही हैं। यहां Islamic State आतंकवाद फैला रहा है तो उसकी जन्मभूमि और इस्लाम की जन्मभूमि उसके खिलाफ कुछ कर क्यों नहीं रही। क्या उन्हें ऐसा विश्व नहीं चाहिए जिसमें कम से कम ईश्वर के नाम पर दूसरों को दुख न दिया जाए।
आपस में commonality ढूंढने की जगह हम हमेशा differences ढूंढते हैं। Islamophobia बुरा लगता है लेकिन आप उसको militant तरीके से दूर करेंगे तो वो कैसे दूर होगा। कोई कारण तो होगा, उस कारण के मूल तक जाने के बजाय, भटके नौजवानों को हिंसा, आतंक और बलात्कार के रास्ते पर भेज दिया जाता है। कुछ भटके नौजवान condom का इस्तेमाल करके खुशी से darwin award ग्रहण कर लेते हैं, कुछ इतने दुखित होते हैं कि प्रेम करके और tweet करके ही Darwin award प्राप्त कर लेते हैं।
Note: Cigarette पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
जहाज़ पर सफेदी की चमकार और निरमा शुद्ध नमक
Nov28/2020
आप जहाज़ पर जाते हैं, आपका मन नहीं है पर फिर भी आप जहाज़ पर जाते हैं। वहां एक गोरा व्यक्ति आपको देख कर मुंह बनाता है। आप notice करते हैं। अब अगर आप सोचें कि आप उसकी जगह होते तो क्या करते। मेरे अंदर जितना भी रंगभेद है वो बाहरी है, लेकिन हां aesthetic के मामले में मैं ज़रा पक्षपाती हूँ। मतलब है कि शारीरिक रूप से जो लोग सुंदरता के सामाजिक मानक पर खरे नहीं उतरते उन्हें academics या research में जाना चाहिए जैसे विचार मेरे मन में आते रहते हैं। फिल्मों में hero और heroine सुंदरता के सामाजिक मानकों पर खरे उतरने चाहिए जैसे खयाल मेरे मष्तिष्क में आते रहते हैं। फिल्मों में ऐसे कई लोग हैं जो पर्दे पर उतने आकर्षक नहीं दिखते पर पर्दे के पीछे उनका कार्य जैसे कि direction etc. कमाल का होता है। आज कल representation का ज़माना है। सबको representation चाहिए। चाहने और ज़बरदस्ती करने में अंतर होता है, और आजकल ज़बरदस्ती भी चल पड़ी है। इसलिए आजकल हम लोगों को ऐसी फिल्में देखने को मिलती हैं जिसमें किरदार तो अलग अलग नस्लों और समाजों से होते हैं पर महसूस हो जाता है कि ये forced है। जो forced नहीं होता वो भी पता लग जाता है। लोग The Little Mermaid में काली Ariel चाहते हैं लेकिन जिनका मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं होता वो Ariel को वैसे ही रहने देते और नया किरदार लिखते, श्याम वर्ण की जलपरी या फिर गेहुएं रंग की।
कभी कभी निरमा नमक का वो प्रचार याद आ जाता है जिसमें एक बालक कहता है “सारे काम मैं करूँ, सफाई भी, shopping भी”। आलस्य मेरी कमज़ोरी है, और मुझे ज़्यादातर थकान रहती है पर जो काम आवश्यक है, और जितना शरीर साथ देता है मैं करता हूँ।
वैसे मुंह बनाने वाले भारत में भी कम नहीं, कुछ तो पहले आपके व्यक्तिगत मामलों में झांकेंगे और उसके बाद मुंह बनाएंगे। कभी कभार मैं भी इस मुंह बनाने वाली बात का दोषी रहा हूँ। कभी कभी बात मुंह बनाने वाली होती भी है।
कभी कभी जिन “नवीन” या “पाश्चात्य” चीजों को हम for granted ले लेते हैं, या फिर “peer pressure” में आ कर हम जिन चीजों को सच मान लेते हैं वो हमारे चरित्र के लिए सही साबित नहीं होतीं। वैसे भी कई बार दिखने वाले चरित्र और वास्तविक चरित्र में अंतर होता है। विज्ञान पर विश्वास इसलिए होता है क्योंकि वो तथ्य पर based होता है लेकिन विज्ञान को भी सत्य परखने या उसको मापने के लिए एक standard चाहिए होता है। कभी कभी Darwin पर बहुत अधिक विश्वास कर लेने पर आपको Darwin अवार्ड मिल सकता है, जो अगर आप आज कल के meme culture से परिचित हैं तो आपको पता होगा कि ये बहुत अच्छी बात नहीं है।
आप जहाज़ पर जाते हैं, आपका मन नहीं है पर फिर भी आप जहाज़ पर जाते हैं। वहां एक गोरा व्यक्ति आपको देख कर मुंह बनाता है। आप notice करते हैं। अब अगर आप सोचें कि आप उसकी जगह होते तो क्या करते। मेरे अंदर जितना भी रंगभेद है वो बाहरी है, लेकिन हां aesthetic के मामले में मैं ज़रा पक्षपाती हूँ। मतलब है कि शारीरिक रूप से जो लोग सुंदरता के सामाजिक मानक पर खरे नहीं उतरते उन्हें academics या research में जाना चाहिए जैसे विचार मेरे मन में आते रहते हैं। फिल्मों में hero और heroine सुंदरता के सामाजिक मानकों पर खरे उतरने चाहिए जैसे खयाल मेरे मष्तिष्क में आते रहते हैं। फिल्मों में ऐसे कई लोग हैं जो पर्दे पर उतने आकर्षक नहीं दिखते पर पर्दे के पीछे उनका कार्य जैसे कि direction etc. कमाल का होता है। आज कल representation का ज़माना है। सबको representation चाहिए। चाहने और ज़बरदस्ती करने में अंतर होता है, और आजकल ज़बरदस्ती भी चल पड़ी है। इसलिए आजकल हम लोगों को ऐसी फिल्में देखने को मिलती हैं जिसमें किरदार तो अलग अलग नस्लों और समाजों से होते हैं पर महसूस हो जाता है कि ये forced है। जो forced नहीं होता वो भी पता लग जाता है। लोग The Little Mermaid में काली Ariel चाहते हैं लेकिन जिनका मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं होता वो Ariel को वैसे ही रहने देते और नया किरदार लिखते, श्याम वर्ण की जलपरी या फिर गेहुएं रंग की।
कभी कभी निरमा नमक का वो प्रचार याद आ जाता है जिसमें एक बालक कहता है “सारे काम मैं करूँ, सफाई भी, shopping भी”। आलस्य मेरी कमज़ोरी है, और मुझे ज़्यादातर थकान रहती है पर जो काम आवश्यक है, और जितना शरीर साथ देता है मैं करता हूँ।
वैसे मुंह बनाने वाले भारत में भी कम नहीं, कुछ तो पहले आपके व्यक्तिगत मामलों में झांकेंगे और उसके बाद मुंह बनाएंगे। कभी कभार मैं भी इस मुंह बनाने वाली बात का दोषी रहा हूँ। कभी कभी बात मुंह बनाने वाली होती भी है।
कभी कभी जिन “नवीन” या “पाश्चात्य” चीजों को हम for granted ले लेते हैं, या फिर “peer pressure” में आ कर हम जिन चीजों को सच मान लेते हैं वो हमारे चरित्र के लिए सही साबित नहीं होतीं। वैसे भी कई बार दिखने वाले चरित्र और वास्तविक चरित्र में अंतर होता है। विज्ञान पर विश्वास इसलिए होता है क्योंकि वो तथ्य पर based होता है लेकिन विज्ञान को भी सत्य परखने या उसको मापने के लिए एक standard चाहिए होता है। कभी कभी Darwin पर बहुत अधिक विश्वास कर लेने पर आपको Darwin अवार्ड मिल सकता है, जो अगर आप आज कल के meme culture से परिचित हैं तो आपको पता होगा कि ये बहुत अच्छी बात नहीं है।
नालंदा और तक्षशिला
Nov 19/2020
आज भारत जैसा है, और जिस तरह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, अपना इतिहास जानना और भी आवश्यक हो गया है। मुझे इतिहास कोई खास लगाव नहीं था लेकिन आजकल जिस तरह से इतिहास को तोड़ मरोड़ कर दिखाया जाता है, इतिहास के ज्ञान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक हो गयी है।
इतिहास का सबसे बड़ा basis सत्य और तथ्य होने चाहिए, लेकिन आजकल की information warfare की दुनिया में इन्ही दो चीजों की कमी है। सच्चा justice achieve करने के लिए और भी कई चीजों के अलावा सत्य और तथ्य दोनों आवश्यक हैं।
भारत के इतिहास के दो प्रमुख प्रमाण नालंदा और तक्षशिला के खंडहर अभी भी हैं। Archeological Survey of India भले ही पुराणों के समय के प्रमाण सिद्ध नहीं कर पाया हो लेकिन नालंदा और तक्षशिला के खंडहर प्रमाण स्वरूप अभी भी उपस्थित हैं।
आक्रांताओं ने सबसे पहले विश्वविद्यालयों पर आक्रमण करके यह सिद्ध कर दिया कि उनका मकसद क्या था। दक्षिण भारत में प्रमाण प्रचुर मात्रा में हैं, वहीं उत्तर भारत अभी भी अधिकांशतः मुग़ल संस्कृति के प्रभाव में जान पड़ता है।
बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को टैंकों द्वारा ध्वस्त किया जाना इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार के लोग ऐसी चीजों को अंजाम देते हैं। सिख गुरु स्वर्ण मंदिर की आधारशिला रखने के दौरान goodwill gesture के तहत ईंट रखवाते हैं वहीं बर्बर आक्रांता दूसरी संस्कृतियों के प्रमाण भी नेस्तोनाबूद कर देते हैं।
हर धर्म के अपने नियम होते हैं, लेकिन ये जानने में बहुत अधिक बुद्धि नहीं लगती की भले ही आपका मुखिया अलग हो लेकिन अगर आप मानते हैं कि ईश्वर एक है तो फिर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि जिनको आप प्रताड़ित करते हैं उनका भी ईश्वर वही है।
अगर बामियान बुद्ध की प्रतिमा होती तो अफ़ग़ानिस्तान भी मिस्र की भांति अपनी पुरातन संस्कृति विश्व को दिखा सकता था, और शायद थोड़ी शांति बहाल होने पर पर्यटन से कमाई भी कर सकता था।
मैंने वीर सावरकर को कभी नहीं पढ़ा लेकिन उनका एक quote अवश्य पढ़ा है, exact quote याद नहीं, इसलिए शायद paraphrase हो जाए – “तुम मुसलमान हो इसलिए मैं हिन्दू हूँ, अन्यथा मैं तो विश्वमानव हूँ।” ये बात केवल एक धर्म पर लागू नहीं होती। ये बात उन सब पर लागू होती है जो अपनी कट्टरता से दूसरों को झुकाने और कष्ट देने पर विश्वास रखते हैं।
आज भारत जैसा है, और जिस तरह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, अपना इतिहास जानना और भी आवश्यक हो गया है। मुझे इतिहास कोई खास लगाव नहीं था लेकिन आजकल जिस तरह से इतिहास को तोड़ मरोड़ कर दिखाया जाता है, इतिहास के ज्ञान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक हो गयी है।
इतिहास का सबसे बड़ा basis सत्य और तथ्य होने चाहिए, लेकिन आजकल की information warfare की दुनिया में इन्ही दो चीजों की कमी है। सच्चा justice achieve करने के लिए और भी कई चीजों के अलावा सत्य और तथ्य दोनों आवश्यक हैं।
भारत के इतिहास के दो प्रमुख प्रमाण नालंदा और तक्षशिला के खंडहर अभी भी हैं। Archeological Survey of India भले ही पुराणों के समय के प्रमाण सिद्ध नहीं कर पाया हो लेकिन नालंदा और तक्षशिला के खंडहर प्रमाण स्वरूप अभी भी उपस्थित हैं।
आक्रांताओं ने सबसे पहले विश्वविद्यालयों पर आक्रमण करके यह सिद्ध कर दिया कि उनका मकसद क्या था। दक्षिण भारत में प्रमाण प्रचुर मात्रा में हैं, वहीं उत्तर भारत अभी भी अधिकांशतः मुग़ल संस्कृति के प्रभाव में जान पड़ता है।
बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को टैंकों द्वारा ध्वस्त किया जाना इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार के लोग ऐसी चीजों को अंजाम देते हैं। सिख गुरु स्वर्ण मंदिर की आधारशिला रखने के दौरान goodwill gesture के तहत ईंट रखवाते हैं वहीं बर्बर आक्रांता दूसरी संस्कृतियों के प्रमाण भी नेस्तोनाबूद कर देते हैं।
हर धर्म के अपने नियम होते हैं, लेकिन ये जानने में बहुत अधिक बुद्धि नहीं लगती की भले ही आपका मुखिया अलग हो लेकिन अगर आप मानते हैं कि ईश्वर एक है तो फिर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि जिनको आप प्रताड़ित करते हैं उनका भी ईश्वर वही है।
अगर बामियान बुद्ध की प्रतिमा होती तो अफ़ग़ानिस्तान भी मिस्र की भांति अपनी पुरातन संस्कृति विश्व को दिखा सकता था, और शायद थोड़ी शांति बहाल होने पर पर्यटन से कमाई भी कर सकता था।
मैंने वीर सावरकर को कभी नहीं पढ़ा लेकिन उनका एक quote अवश्य पढ़ा है, exact quote याद नहीं, इसलिए शायद paraphrase हो जाए – “तुम मुसलमान हो इसलिए मैं हिन्दू हूँ, अन्यथा मैं तो विश्वमानव हूँ।” ये बात केवल एक धर्म पर लागू नहीं होती। ये बात उन सब पर लागू होती है जो अपनी कट्टरता से दूसरों को झुकाने और कष्ट देने पर विश्वास रखते हैं।
रात्रि भी सुंदर हो सकती है और कुछ और बातें
Nov 14/2020
India में nightlife कम ही जगह देखने को मिलती है। एक जगह जहां nightlife देखने को मिलती है वो है Goa. रात्रि को ज़्यादातर negative रूप में ही देखा जाता है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि येशु मसीह का जन्म, श्री कृष्ण का जन्म भी रात्रि में हुआ था। हर जगह रात्रि विश्राम का निर्धारित समय होता है लेकिन कुछ लोग निशाचर होते हैं। जंगल में रात्रि predators के शिकार का समय होता है, इंसानी predators और जानवरों में यही अंतर होता है कि जानवर need based शिकार करते है, वहीं इंसान पर ये बात हर बार लागू नहीं होती। वैसे इंसानी निशाचर predator ही हो कोई ज़रूरी नहीं है।
कई भारतीय संस्कृतियों में दिव्यता को personify किया जाता है। यहां तक कि कई जगहों पर small pox और chicken pox जैसी बीमारियों को भी माता का प्रकोप माना जाता है। सोचिये, जो लोग रोगों को भी माँ का प्रकोप मान कर उससे उबरने के लिए सविनय निवेदन करते हैं उनको colonize करने की कोशिश करने वाला कितना, असंसदीय शब्दों के लिए क्षमा करियेगा, gigantic asshole, होगा। मुझे British संस्कृति पसंद है, इंडिया में अभी भी ये पॉश संस्कृति के रूप में कायम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं भूल गया कि एक समय पर, मैं generalize नहीं करूंगा, कुछ लोग “Dogs and Indians not allowed” के बोर्ड लगाया करते थे।
खैर हम रात्रि की बात कर रहे थे। रात्रि को हर बार negatively देखना आवश्यक नहीं। रात्रि आराम करने का समय तो होती ही है, साथ ही कभी कभी enjoy करने का समय भी हो सकती है। दिन में मनुष्य काम करें और machines charge हों और रात में मनुष्य विश्राम या enjoy करें और मशीन काम करें, या light प्रदान करें। देखा जाए तो श्री राम भी अयोध्या अमावस की रात को ही पहुंचे थे।
कई वैज्ञानिक, intellectuals और महान व्यक्ति भी निशाचर ही थे। Predators और निशाचरों का अंतर समझना आवश्यक है। हर predator निशाचर नहीं होता, और हर निशाचर predator नहीं होता।
India में nightlife कम ही जगह देखने को मिलती है। एक जगह जहां nightlife देखने को मिलती है वो है Goa. रात्रि को ज़्यादातर negative रूप में ही देखा जाता है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि येशु मसीह का जन्म, श्री कृष्ण का जन्म भी रात्रि में हुआ था। हर जगह रात्रि विश्राम का निर्धारित समय होता है लेकिन कुछ लोग निशाचर होते हैं। जंगल में रात्रि predators के शिकार का समय होता है, इंसानी predators और जानवरों में यही अंतर होता है कि जानवर need based शिकार करते है, वहीं इंसान पर ये बात हर बार लागू नहीं होती। वैसे इंसानी निशाचर predator ही हो कोई ज़रूरी नहीं है।
कई भारतीय संस्कृतियों में दिव्यता को personify किया जाता है। यहां तक कि कई जगहों पर small pox और chicken pox जैसी बीमारियों को भी माता का प्रकोप माना जाता है। सोचिये, जो लोग रोगों को भी माँ का प्रकोप मान कर उससे उबरने के लिए सविनय निवेदन करते हैं उनको colonize करने की कोशिश करने वाला कितना, असंसदीय शब्दों के लिए क्षमा करियेगा, gigantic asshole, होगा। मुझे British संस्कृति पसंद है, इंडिया में अभी भी ये पॉश संस्कृति के रूप में कायम है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं भूल गया कि एक समय पर, मैं generalize नहीं करूंगा, कुछ लोग “Dogs and Indians not allowed” के बोर्ड लगाया करते थे।
खैर हम रात्रि की बात कर रहे थे। रात्रि को हर बार negatively देखना आवश्यक नहीं। रात्रि आराम करने का समय तो होती ही है, साथ ही कभी कभी enjoy करने का समय भी हो सकती है। दिन में मनुष्य काम करें और machines charge हों और रात में मनुष्य विश्राम या enjoy करें और मशीन काम करें, या light प्रदान करें। देखा जाए तो श्री राम भी अयोध्या अमावस की रात को ही पहुंचे थे।
कई वैज्ञानिक, intellectuals और महान व्यक्ति भी निशाचर ही थे। Predators और निशाचरों का अंतर समझना आवश्यक है। हर predator निशाचर नहीं होता, और हर निशाचर predator नहीं होता।
रंगभेद, नस्लभेद और साम, दाम, दंड, भेद
Nov 13/2020
एक बात मैं कह सकता हूँ कि मैंने जानबूझ कर कभी नस्लभेद या रंग भेद नहीं किया। अगर किसी प्रकार का भेद किया है तो वो सांस्कृतिक या फिर geographical था, वो भी बस इसलिए क्योंकि अगर कोई आपकी संस्कृति से है या आपकी जगह से है तो निस्संदेह common traits होते हैं।
भारत में जगह के हिसाब से inferiority या superiority काम्प्लेक्स होते हैं। कहीं मेरठ में चीनी मिल होती हैं और कहीं राजस्थान में मसालेदार खाना और दक्षिण भारत में फ़िल्टर कॉफ़ी।
साम, _____, दंड और भेद का शिकार व्यक्ति जीते जी zombie बन जाता है। अपनी मृत्यु का इंतज़ार करते करते, श्री राम और रावण के बीच झूलेलाल बनते बनते थकता तो है पर पृथ्वी पर अपने “फ़र्ज़” और अपने उद्देश्य निभाने के लिए किसी तरह अपनी miserable existence को suitable तरीके से ढालने का प्रयत्न करता है।
दक्षिण भारत में अगर अपने सहपाठी को उसने कहा कि वो फलां व्यक्ति के निकट इसलिए है क्योंकि वो व्यक्ति उसके शहर से है तो वो रंगभेदी/नस्लभेदी बन जाता है, जबकि सत्य यही है कि निकटता का कारण कई common विषय होना है।
यदि कोई मसखरा जो सबका मज़ाक बनाता है अगर कोई मज़ाक बना दे तो वो नस्लभेदी बन जाता है, क्योंकि दिक्कत उसमें नहीं बल्कि सुनने वाले के inferiority complex में है। कभी कभी inferiority complex दूर करने में वर्षों लग जाते हैं, पर आसान तरीका ये है कि आप कोई positive ढूंढे। South की फ़िल्टर कॉफ़ी का मुकाबला north की कॉफ़ी नहीं कर सकती क्योंकि north में कॉफ़ी उगती ही नहीं।
Quentin Tarantino, Uma Thurman को ले कर मूवी बनाता है तो उस समय आपके दिमाग में ये नहीं आता कि feminism नाम की भी कोई चीज़ होती है। आप बस “The Bride” का दुश्मनों से बदला लेने का इंतज़ार करते हैं क्योंकि उन्होंने उसके साथ ग़लत किया था। वहीं आजकल की फिल्मों में काले को गोरा बनाया जा रहा है, और लड़कियां बॉयकट बाल काट के feminism वाली फिल्मों में आ रही हैं। थोपा हुआ feminism किसी काम नहीं आता, क्योंकि glass ceiling बहुत मजबूत है। नारीवाद को तरसती महिलाएं एक अदद sanitary pad को तरस रही हैं और यहां आधे मन से feminist फिल्में बनाई जा रही हैं जिसमें कई बार दारू और सिगरेट पीना feminism को परिभाषित करता है। खैर, जनतंत्र है। काश कम से कम भारत में feminism को import करने से पहले, feminism और नारीवाद का अंतर समझ लिया होता तो आज ये हालात नहीं होते। अच्छे मर्द रंडी बजाज बन गए और बाकियों का कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि वो glass ceiling के ऊपर हैं।
एक बात मैं कह सकता हूँ कि मैंने जानबूझ कर कभी नस्लभेद या रंग भेद नहीं किया। अगर किसी प्रकार का भेद किया है तो वो सांस्कृतिक या फिर geographical था, वो भी बस इसलिए क्योंकि अगर कोई आपकी संस्कृति से है या आपकी जगह से है तो निस्संदेह common traits होते हैं।
भारत में जगह के हिसाब से inferiority या superiority काम्प्लेक्स होते हैं। कहीं मेरठ में चीनी मिल होती हैं और कहीं राजस्थान में मसालेदार खाना और दक्षिण भारत में फ़िल्टर कॉफ़ी।
साम, _____, दंड और भेद का शिकार व्यक्ति जीते जी zombie बन जाता है। अपनी मृत्यु का इंतज़ार करते करते, श्री राम और रावण के बीच झूलेलाल बनते बनते थकता तो है पर पृथ्वी पर अपने “फ़र्ज़” और अपने उद्देश्य निभाने के लिए किसी तरह अपनी miserable existence को suitable तरीके से ढालने का प्रयत्न करता है।
दक्षिण भारत में अगर अपने सहपाठी को उसने कहा कि वो फलां व्यक्ति के निकट इसलिए है क्योंकि वो व्यक्ति उसके शहर से है तो वो रंगभेदी/नस्लभेदी बन जाता है, जबकि सत्य यही है कि निकटता का कारण कई common विषय होना है।
यदि कोई मसखरा जो सबका मज़ाक बनाता है अगर कोई मज़ाक बना दे तो वो नस्लभेदी बन जाता है, क्योंकि दिक्कत उसमें नहीं बल्कि सुनने वाले के inferiority complex में है। कभी कभी inferiority complex दूर करने में वर्षों लग जाते हैं, पर आसान तरीका ये है कि आप कोई positive ढूंढे। South की फ़िल्टर कॉफ़ी का मुकाबला north की कॉफ़ी नहीं कर सकती क्योंकि north में कॉफ़ी उगती ही नहीं।
Quentin Tarantino, Uma Thurman को ले कर मूवी बनाता है तो उस समय आपके दिमाग में ये नहीं आता कि feminism नाम की भी कोई चीज़ होती है। आप बस “The Bride” का दुश्मनों से बदला लेने का इंतज़ार करते हैं क्योंकि उन्होंने उसके साथ ग़लत किया था। वहीं आजकल की फिल्मों में काले को गोरा बनाया जा रहा है, और लड़कियां बॉयकट बाल काट के feminism वाली फिल्मों में आ रही हैं। थोपा हुआ feminism किसी काम नहीं आता, क्योंकि glass ceiling बहुत मजबूत है। नारीवाद को तरसती महिलाएं एक अदद sanitary pad को तरस रही हैं और यहां आधे मन से feminist फिल्में बनाई जा रही हैं जिसमें कई बार दारू और सिगरेट पीना feminism को परिभाषित करता है। खैर, जनतंत्र है। काश कम से कम भारत में feminism को import करने से पहले, feminism और नारीवाद का अंतर समझ लिया होता तो आज ये हालात नहीं होते। अच्छे मर्द रंडी बजाज बन गए और बाकियों का कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि वो glass ceiling के ऊपर हैं।
मानचित्र और लोगों की दबंगई
Nov 10, 2020
जिसकी लाठी उसकी भैंस पुरानी कहावत है, ग्रामीण परिवेश के आधार पर ये बात कुछ हद तक सही है पर इसके उदाहरण सभ्य समाज में भी कम नहीं हैं।सहायता और शक्ति प्रदर्शन में से एक चुनना पड़े तो कई सारे लोग शक्ति प्रदर्शन चुनेंगे। ताक़त के मद में लोग इतने चूर हैं कि youtube पर दारू के commercials दिखाते समय भी लोग लंगड़े दोस्त को मदद पाता हुआ दिखाते हैं। ऐसा भी तो हो सकता है कि वो लंगड़ा दोस्त बाकी दोस्तों को पढ़ाता हो। खैर commercial तो दारू का ही था न।
प्रेम बहुत दुख देता है, लेकिन प्रेम का क्षणिक आनंद भी ऐसा होता है कि व्यक्ति अपने आप तक को ही भूल जाता है और क्षणिक प्रेम के बदले दुख ले बैठता है।
अब आते हैं लोगों के जुड़ाव पर। श्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं “सब मिले हुए हैं जी”। Individualistic लोगों को ये पसंद नहीं आएगा। आपके पेशाब करते समय कोई आ कर झांके या आपकी निजता का उल्लंघन करे तो आपको कैसा लगेगा ये आप पर निर्भर करता है लेकिन privacy पसंद करने वाले लोगों को तो दिक्कत होगी ही।
पूजा करने वाले लोगों को भी खांसी आती है, मैं तो फिर भी एक चार्वाक हूँ, जो पूजा कम ही करता है।
भारत का आम आदमी भी क्या करे, भारत में रहो तो खांसी या गठिया और बाहर जाओ तो दूसरों की दबंगई झेलो।
दबंगई के विषय से याद आता है पाकिस्तान और याद आती है खालिस्तानियों की। मैं उनको उतना दोष नहीं दूंगा जितना देना चाहिए क्योंकि मैं स्वयं कभी कभी खांसी का शिकार हो जाता हूँ। सलमान खान और शाहरुख खान कैसे झेलते हैं, भगवान ही जानते हैं।
कश्मीरी पंडित, भाग के कैम्पों में रहते हैं, और कई सालों बाद उनपर फ़िल्म बनाई जाती है तो खांसी के बदले के स्वरूप में कश्मीरी पंडित मुस्लिम बन जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन अगर कोई दबंगई का शिकार हो कर या बदले स्वरूप मुस्लिम बने तो बुराई अवश्य है। मुझे religious बातें या religion के बारेमें बातें करना पसंद नहीं लेकिन जब देशों की politics ही religion पर based हो तो ये सब बातें करते हुए शर्म आने पर भी करनी पड़ती हैं।
अगर आप धनी नहीं हैं तो Islam एक one-way street है। आप छोड़ना चाहें तो सीधे ex-muslim ही बनते हैं। चावल ले कर convert होने वालों को कभी अपने आप को ex-hindu बोलते सुना है? हिंदुत्व में काफी बुराइयां है लेकिन उसमें समय के साथ विकसित होने की भी क्षमता है। यहां हिंदुत्व का अर्थ वैसा ही है जैसा मैं समझता हूं, भौगोलिक, और ना कि किसी प्रार्थना एवं विधि पद्धति पर आधारित। धर्म कि प्रार्थना और विधि पद्धतियां indigenous हैं लेकिन हिंदुत्व का सार ही सबको अपनाना है भले ही थोड़ी खांसी क्यों न आये। खैर जो लोग फिर से “हिन्दू” हिन्दू बनना चाहें उन्हें क्या करना चाहिए, ये तो विद्वान ही बता सकते हैं, लेकिन थोड़ी खांसी आ जाये तो Vicks कि गोली तो ले ही सकते हैं।
अंत में, एक बात समझ नहीं आती कि जब ननकाना साहिब पाकिस्तान में है तो खालिस्तानी भारतीय पंजाब के चक्कर में क्यों पड़े हैं, और, जब एक आज़ाद कश्मीर पहले से है तो जिनको कश्मीर आज़ाद चाहिए वो वहीं क्यों नहीं चले जाते?
जिसकी लाठी उसकी भैंस पुरानी कहावत है, ग्रामीण परिवेश के आधार पर ये बात कुछ हद तक सही है पर इसके उदाहरण सभ्य समाज में भी कम नहीं हैं।सहायता और शक्ति प्रदर्शन में से एक चुनना पड़े तो कई सारे लोग शक्ति प्रदर्शन चुनेंगे। ताक़त के मद में लोग इतने चूर हैं कि youtube पर दारू के commercials दिखाते समय भी लोग लंगड़े दोस्त को मदद पाता हुआ दिखाते हैं। ऐसा भी तो हो सकता है कि वो लंगड़ा दोस्त बाकी दोस्तों को पढ़ाता हो। खैर commercial तो दारू का ही था न।
प्रेम बहुत दुख देता है, लेकिन प्रेम का क्षणिक आनंद भी ऐसा होता है कि व्यक्ति अपने आप तक को ही भूल जाता है और क्षणिक प्रेम के बदले दुख ले बैठता है।
अब आते हैं लोगों के जुड़ाव पर। श्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं “सब मिले हुए हैं जी”। Individualistic लोगों को ये पसंद नहीं आएगा। आपके पेशाब करते समय कोई आ कर झांके या आपकी निजता का उल्लंघन करे तो आपको कैसा लगेगा ये आप पर निर्भर करता है लेकिन privacy पसंद करने वाले लोगों को तो दिक्कत होगी ही।
पूजा करने वाले लोगों को भी खांसी आती है, मैं तो फिर भी एक चार्वाक हूँ, जो पूजा कम ही करता है।
भारत का आम आदमी भी क्या करे, भारत में रहो तो खांसी या गठिया और बाहर जाओ तो दूसरों की दबंगई झेलो।
दबंगई के विषय से याद आता है पाकिस्तान और याद आती है खालिस्तानियों की। मैं उनको उतना दोष नहीं दूंगा जितना देना चाहिए क्योंकि मैं स्वयं कभी कभी खांसी का शिकार हो जाता हूँ। सलमान खान और शाहरुख खान कैसे झेलते हैं, भगवान ही जानते हैं।
कश्मीरी पंडित, भाग के कैम्पों में रहते हैं, और कई सालों बाद उनपर फ़िल्म बनाई जाती है तो खांसी के बदले के स्वरूप में कश्मीरी पंडित मुस्लिम बन जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन अगर कोई दबंगई का शिकार हो कर या बदले स्वरूप मुस्लिम बने तो बुराई अवश्य है। मुझे religious बातें या religion के बारेमें बातें करना पसंद नहीं लेकिन जब देशों की politics ही religion पर based हो तो ये सब बातें करते हुए शर्म आने पर भी करनी पड़ती हैं।
अगर आप धनी नहीं हैं तो Islam एक one-way street है। आप छोड़ना चाहें तो सीधे ex-muslim ही बनते हैं। चावल ले कर convert होने वालों को कभी अपने आप को ex-hindu बोलते सुना है? हिंदुत्व में काफी बुराइयां है लेकिन उसमें समय के साथ विकसित होने की भी क्षमता है। यहां हिंदुत्व का अर्थ वैसा ही है जैसा मैं समझता हूं, भौगोलिक, और ना कि किसी प्रार्थना एवं विधि पद्धति पर आधारित। धर्म कि प्रार्थना और विधि पद्धतियां indigenous हैं लेकिन हिंदुत्व का सार ही सबको अपनाना है भले ही थोड़ी खांसी क्यों न आये। खैर जो लोग फिर से “हिन्दू” हिन्दू बनना चाहें उन्हें क्या करना चाहिए, ये तो विद्वान ही बता सकते हैं, लेकिन थोड़ी खांसी आ जाये तो Vicks कि गोली तो ले ही सकते हैं।
अंत में, एक बात समझ नहीं आती कि जब ननकाना साहिब पाकिस्तान में है तो खालिस्तानी भारतीय पंजाब के चक्कर में क्यों पड़े हैं, और, जब एक आज़ाद कश्मीर पहले से है तो जिनको कश्मीर आज़ाद चाहिए वो वहीं क्यों नहीं चले जाते?
ले ला कटहर के कोआ
Oct 29/2020
ई ससुरा नेता लोगन दारू पिया पिया के vote ले लिहन अउरी फिर सरकार बना के खेले खाये क उमर वाला लइका लईकी के दारू पिया के जंग क मैदान में भेज देवेलं।
केहू “this morning I woke up at night” कहत बा, केहू त जब से आइल बा पनिये क कमी पड़ गइल। ओकरो पहिले भी कुछो अइसन बढ़िया न रहल।
राजा लोगन क privy purse बंद हो गइल, राजा लोग सड़क प आ गइलें। जे एतना बरिस प्रजा के बोझा ढोअलस ओकरे खानदान के बेसिक पेंशनों ना मिलल, राजा लोग होटल खोल के जीयत बाड़ें।
जे कपार प टट्टी उठावत रहे उ आजो उठावत बा, कौनों न कौनों रूप में। एतना साल से का भइल कुछ पता ना। सरस्सत्ति पूजा में लइका कुल “लगावेलु जब लिपिस्टिक प दारू पी के नाचत बाड़न, अउरी दारू पी के नाचे वाला जगह प ताला लागल बा।
केहू रंडी बा के पुलिस बा पते ना चलत बा। चोर के चौकीदार के लाठी से डर न लागेला, आम अदमी के लागेला, चोर त मौका देख मस्ता के चोरावे ला अउरी जा के बाज़ार में बेच देवेला।
पढ़ल लिखल लैकवन के पियाक लोगन क कुक्कुर बने के पड़ेला काहिं के कपार प त सौ मन वजन राखल बा।
एडवर्ड स्नोडेन ससुरा रुसिया में जा के लुकाइल बा, काहीं के इहाँ त रोबोट के रिमोट कंट्रोल से चला के शक्तिप्रदर्शन करल जाला। बिग बॉस देखा के रसपान करल जाला। ब्राउन मैन के कब्बो ब्लैक त कब्बो व्हाइट, ससुरा गदहा मतीन गाजर देखा के एहर ओहर दौड़ावल जात बा। बेहूदा लोगन के पानी क कमी बा लेकिन झुंड का ताकत त बटले बा।
स्वयंसेवक बहिरे स्वयंसेवा करत हउवें अउरी अकेल लइका बाथरूम में जा के स्वयं सेवा क ले त हकीम रहमानी के हिसाब हो जाला।
टीवीयो प पता नाहीं का देखावेलं सो। दादी नानी अउरी गांवे के एतना किस्सा कहनी कुल बिलुप्त हो गइल, बस चूतड़ मटका के बोझा ढोआवेके ह, ससुरा न पिएं वालन के भी, जे कथा कहानी वाला ह खाली, ओहुके पियाक बना देवेलं सो। फिर जूतम पैजार होवेला की ई ससुरा त पियले ह।
जब बकरा बने के ह कैसनहु आम आदमी के, त कम से कम आपन दिल क बात लिख के बकरा बने। ससुर खस्सी काट के खा जालं सो, पता नाहीं का होइ जौना दिन खस्सी के दांत निकल आइल अउरी खस्सी बडियार हो गइल।
ई ससुरा नेता लोगन दारू पिया पिया के vote ले लिहन अउरी फिर सरकार बना के खेले खाये क उमर वाला लइका लईकी के दारू पिया के जंग क मैदान में भेज देवेलं।
केहू “this morning I woke up at night” कहत बा, केहू त जब से आइल बा पनिये क कमी पड़ गइल। ओकरो पहिले भी कुछो अइसन बढ़िया न रहल।
राजा लोगन क privy purse बंद हो गइल, राजा लोग सड़क प आ गइलें। जे एतना बरिस प्रजा के बोझा ढोअलस ओकरे खानदान के बेसिक पेंशनों ना मिलल, राजा लोग होटल खोल के जीयत बाड़ें।
जे कपार प टट्टी उठावत रहे उ आजो उठावत बा, कौनों न कौनों रूप में। एतना साल से का भइल कुछ पता ना। सरस्सत्ति पूजा में लइका कुल “लगावेलु जब लिपिस्टिक प दारू पी के नाचत बाड़न, अउरी दारू पी के नाचे वाला जगह प ताला लागल बा।
केहू रंडी बा के पुलिस बा पते ना चलत बा। चोर के चौकीदार के लाठी से डर न लागेला, आम अदमी के लागेला, चोर त मौका देख मस्ता के चोरावे ला अउरी जा के बाज़ार में बेच देवेला।
पढ़ल लिखल लैकवन के पियाक लोगन क कुक्कुर बने के पड़ेला काहिं के कपार प त सौ मन वजन राखल बा।
एडवर्ड स्नोडेन ससुरा रुसिया में जा के लुकाइल बा, काहीं के इहाँ त रोबोट के रिमोट कंट्रोल से चला के शक्तिप्रदर्शन करल जाला। बिग बॉस देखा के रसपान करल जाला। ब्राउन मैन के कब्बो ब्लैक त कब्बो व्हाइट, ससुरा गदहा मतीन गाजर देखा के एहर ओहर दौड़ावल जात बा। बेहूदा लोगन के पानी क कमी बा लेकिन झुंड का ताकत त बटले बा।
स्वयंसेवक बहिरे स्वयंसेवा करत हउवें अउरी अकेल लइका बाथरूम में जा के स्वयं सेवा क ले त हकीम रहमानी के हिसाब हो जाला।
टीवीयो प पता नाहीं का देखावेलं सो। दादी नानी अउरी गांवे के एतना किस्सा कहनी कुल बिलुप्त हो गइल, बस चूतड़ मटका के बोझा ढोआवेके ह, ससुरा न पिएं वालन के भी, जे कथा कहानी वाला ह खाली, ओहुके पियाक बना देवेलं सो। फिर जूतम पैजार होवेला की ई ससुरा त पियले ह।
जब बकरा बने के ह कैसनहु आम आदमी के, त कम से कम आपन दिल क बात लिख के बकरा बने। ससुर खस्सी काट के खा जालं सो, पता नाहीं का होइ जौना दिन खस्सी के दांत निकल आइल अउरी खस्सी बडियार हो गइल।
चंद्रगुप्त अउर चाणक्य
Oct 28/2020
बिहार भारत क प्राचीनतम civilizations में रहे। पता नाहीं का भइल की ई प्राचीनतम uncivilization में बदल गइल। बिहारी कुल labour बन के बाहर बढ़िया काम करेलन सों पर अपने घरे पता नहीं का हो जाला कि अंदर अउरी बाहर क balance एकदम्मे गड़बड़ा जला। बड़ा खेला बा। लालू लालटेन जला दिहलें लेकिन उ लालटेन क रोशनी खाली यादव लोगन के पहुँचल। पान न खाए क भारी कीमत चुकावे के पड़ल बिहार के। ससुरा जे देखा बइस्ति क के चल जाला। खान साहब अउरी कपूर साहब लोग बिहारी के बकरा मति नाचावेलें। बिहारी बुद्धिमान होलें, लेकिन खान साहिब अउरी कपूर साहिब से डरा जालें। आज के दुनिया में बिहारी क जनम खाली खान साहिब अउरी कपूर साहिब क कुली बने खातीं थोड़े भइल ह। लेकिन बिहारी कुल चतुराई के बाद भी एतना सरीफ बा कि आपन कर्तव्य पूरा करेला। बिहारी बहिरे जाला त आईएस बन जाला अउरी कुछो लायक न भइल त construction क काम त हइये ह। अउरी अपना इहाँ रहेला त चोर अउरी बकचोद बन जला। भट्ट साहिब अपना ड्राइवर के ठीक से रखत हउअन की नाहीं? ड्राइवर के ठीक से रखे के चाही, कब्बो कब्बो, बख्शीश भी दे देवे के चाही।
बिहारियन के West Indies ले जा के चीनी का खेती करा के “भय बिन होई न प्रीति” के सार्थक करल जाला। बिहारी ससुरा दांत चिपोर के बोझा उठावत जाला।
बिहारियन के दारू पिये बदे लुकाये के पड़ेला, इहाँ तक कि चाट खाये बदे भी पर्दा लगावे के पड़ेला। बियाह न भइल त गुड्डू रंगीला बने के पड़ेला। रणवीर सेना क कुल पराक्रम बिहारे तक सीमित दिखाई पड़ेला। अहिरन मति गाड़ी चोरावे अउरी लईकी उठावे से रणवीर न बन जइबा। असली रणभूमि जहां बा उन्हें कुछ होखी, नाहीं त संजय मति खाली महाभारत क खेला देखा।
बिहार भारत क प्राचीनतम civilizations में रहे। पता नाहीं का भइल की ई प्राचीनतम uncivilization में बदल गइल। बिहारी कुल labour बन के बाहर बढ़िया काम करेलन सों पर अपने घरे पता नहीं का हो जाला कि अंदर अउरी बाहर क balance एकदम्मे गड़बड़ा जला। बड़ा खेला बा। लालू लालटेन जला दिहलें लेकिन उ लालटेन क रोशनी खाली यादव लोगन के पहुँचल। पान न खाए क भारी कीमत चुकावे के पड़ल बिहार के। ससुरा जे देखा बइस्ति क के चल जाला। खान साहब अउरी कपूर साहब लोग बिहारी के बकरा मति नाचावेलें। बिहारी बुद्धिमान होलें, लेकिन खान साहिब अउरी कपूर साहिब से डरा जालें। आज के दुनिया में बिहारी क जनम खाली खान साहिब अउरी कपूर साहिब क कुली बने खातीं थोड़े भइल ह। लेकिन बिहारी कुल चतुराई के बाद भी एतना सरीफ बा कि आपन कर्तव्य पूरा करेला। बिहारी बहिरे जाला त आईएस बन जाला अउरी कुछो लायक न भइल त construction क काम त हइये ह। अउरी अपना इहाँ रहेला त चोर अउरी बकचोद बन जला। भट्ट साहिब अपना ड्राइवर के ठीक से रखत हउअन की नाहीं? ड्राइवर के ठीक से रखे के चाही, कब्बो कब्बो, बख्शीश भी दे देवे के चाही।
बिहारियन के West Indies ले जा के चीनी का खेती करा के “भय बिन होई न प्रीति” के सार्थक करल जाला। बिहारी ससुरा दांत चिपोर के बोझा उठावत जाला।
बिहारियन के दारू पिये बदे लुकाये के पड़ेला, इहाँ तक कि चाट खाये बदे भी पर्दा लगावे के पड़ेला। बियाह न भइल त गुड्डू रंगीला बने के पड़ेला। रणवीर सेना क कुल पराक्रम बिहारे तक सीमित दिखाई पड़ेला। अहिरन मति गाड़ी चोरावे अउरी लईकी उठावे से रणवीर न बन जइबा। असली रणभूमि जहां बा उन्हें कुछ होखी, नाहीं त संजय मति खाली महाभारत क खेला देखा।
चार्वाक, वैज्ञानिकों और तत्वज्ञानियों की आवश्यकता
Oct 27/2020
मुझे Netflix की सीरीज Leila बिल्कुल पसंद नहीं परंतु अगर हमने अपने यहां के चार्वाकों, वैज्ञानिकों और तत्वज्ञानियों पर ध्यान नहीं दिया तो वो दिन दूर नहीं जब सच में हर कोई गेरुए वस्त्रों में दिखाई देगा। अपने राष्ट्रीय परिचय की सुरक्षा करते करते हम सच में वो बन जाएंगे जिनसे हम अपनी संस्कृति की सुरक्षा करना चाहते हैं और शायद फिर हम स्वयं से स्वयं का पानी काटने लगें।
मज़हबी कट्टरपंथ की आवश्यकता नहीं होगी जब अपने धर्म का पालन सच्ची लगन से करें। एकम सत्य बहुधा वदन्ति, में वो लोग खासकर फंस जाते हैं जिनके उस सत्य को प्राप्त करने का रास्ता और नियम कठोर होता है। कट्टरपंथ, कट्टरपंथ को जन्म देता है, और ये सत्य है कि इंटरनेट के युग में भारत को अपनी राष्ट्रीय पहचान बचाने के लिए थोड़ा तो संघर्ष करना पड़ ही रहा है, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि हम वो चीज़ें ही भूल जाएं जो भारत को भारत बनाती हैं।
जिनका ईश्वर को प्राप्त करने का रास्ता कठिन है उनसे हमें सहानुभूति रखनी चाहिए, परंतु अपनी सारी अच्छाई को बचाते हुए अडिग रहना भी एक कठिन कार्य है, लेकिन मिल कर प्रयास करने पर असंभव कुछ भी नहीं। दूसरे की भावनाओं का सम्मान, और अपना सत्य उन पर थोपना नहीं, लेकिन कोई अपना सत्य आप पर थोपे तो उसे स्वीकार नहीं करना और अपनी सारी अच्छाइयों को बरकरार रखना कठिन तो है ही। हर कोई पूजा विधियों, और धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञाता नहीं होता, और हर किसी को validation भी नहीं चाहिए होता।
व्यक्ति को बहुत देर तक पानी न मिले तो वो बुद्धिजीवी से, असंसदीय शब्द के लिए माफ करियेगा, ‘फुद्दीजीवी’ बन जाता है, और जो नहीं बनता, वो बना दिया जाता है।
जो लोग अपने नामों को उर्दू में लिख कर विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आम आदमी को गेरुए गमछे पहनने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, और ये भी की Afrika में लोगों को वास्तविकता में खाना और पानी नहीं मिल रहा।
मुझे Netflix की सीरीज Leila बिल्कुल पसंद नहीं परंतु अगर हमने अपने यहां के चार्वाकों, वैज्ञानिकों और तत्वज्ञानियों पर ध्यान नहीं दिया तो वो दिन दूर नहीं जब सच में हर कोई गेरुए वस्त्रों में दिखाई देगा। अपने राष्ट्रीय परिचय की सुरक्षा करते करते हम सच में वो बन जाएंगे जिनसे हम अपनी संस्कृति की सुरक्षा करना चाहते हैं और शायद फिर हम स्वयं से स्वयं का पानी काटने लगें।
मज़हबी कट्टरपंथ की आवश्यकता नहीं होगी जब अपने धर्म का पालन सच्ची लगन से करें। एकम सत्य बहुधा वदन्ति, में वो लोग खासकर फंस जाते हैं जिनके उस सत्य को प्राप्त करने का रास्ता और नियम कठोर होता है। कट्टरपंथ, कट्टरपंथ को जन्म देता है, और ये सत्य है कि इंटरनेट के युग में भारत को अपनी राष्ट्रीय पहचान बचाने के लिए थोड़ा तो संघर्ष करना पड़ ही रहा है, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि हम वो चीज़ें ही भूल जाएं जो भारत को भारत बनाती हैं।
जिनका ईश्वर को प्राप्त करने का रास्ता कठिन है उनसे हमें सहानुभूति रखनी चाहिए, परंतु अपनी सारी अच्छाई को बचाते हुए अडिग रहना भी एक कठिन कार्य है, लेकिन मिल कर प्रयास करने पर असंभव कुछ भी नहीं। दूसरे की भावनाओं का सम्मान, और अपना सत्य उन पर थोपना नहीं, लेकिन कोई अपना सत्य आप पर थोपे तो उसे स्वीकार नहीं करना और अपनी सारी अच्छाइयों को बरकरार रखना कठिन तो है ही। हर कोई पूजा विधियों, और धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञाता नहीं होता, और हर किसी को validation भी नहीं चाहिए होता।
व्यक्ति को बहुत देर तक पानी न मिले तो वो बुद्धिजीवी से, असंसदीय शब्द के लिए माफ करियेगा, ‘फुद्दीजीवी’ बन जाता है, और जो नहीं बनता, वो बना दिया जाता है।
जो लोग अपने नामों को उर्दू में लिख कर विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आम आदमी को गेरुए गमछे पहनने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, और ये भी की Afrika में लोगों को वास्तविकता में खाना और पानी नहीं मिल रहा।
जंगल और प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत
Oct 27/2020
जंगल में केवल जानवर ही नहीं रहते, पेड़ भी रहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल बहुत कम होता है। प्रकृति का सही उपयोग, खासकर आज के तकनीकी समय में आवश्यक है।
कोयले का खनन जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक पवन चक्कियों, water turbines और solar energy का इस्तेमाल करना है। ऊर्जा और अच्छे शिक्षक ही एक देश का भविष्य बनाते हैं।
प्राकृतिक संसाधनों पर मारामारी, वो भी तब जब प्रकृति हमें ऊर्जा प्राप्त करने के कई और तरीके प्रदान करती है, बात कुछ समझ नहीं आती।
जिनको खनन करने की आवश्यकता है वो खनन करें, जिनको कपास बीनने की आवश्यकता है वो कपास बीनें और जिनको कपड़े बेचने की आवश्यकता है वो कपड़े बेचें।
एक बात और, जो व्यक्ति अपने कुत्ते से प्रेम नहीं कर सकता उसे कुत्ते पालने नहीं चाहिए। अपने पालतू से प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार आपके स्वभाव को दर्शाता है।
कितनी अजीब बात हैं ना, लोग बच्चों को ईश्वर की देन मानते हैं और संबंध शारीरिक सुख के लिए बनाते हैं। आत्मीयता से दूर दूर तक का वास्ता नहीं। France ने कंडोम का आविष्कार किया क्योंकि वो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को ईश्वर पर नहीं थोपता। बात पवित्रता और अपवित्रता की कम और उसको ईश्वर पर थोपने की ज़्यादा है।
वैसे भी दूसरों का genocide कर के कुछ खास नहीं मिलने वाला। किसी का पानी काट देने से कुछ नहीं होता वो भी खासकर तब जब उसे दूसरों को प्रसन्न देख कर सुख मिलता हो।
मनोज कुमार “काले गोरे का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है” गाते हैं लेकिन यहां आए दिन उन लोगों को भी जो दारू नहीं पीते, पता नहीं कैसे नशा हो जाता है।
कभी कभी बात validation की होती है, और कभी कभी बात इस बात पर निर्भर करती है कि आप नशे में न हों तो क्या फैसला करेंगे। विधि का विधान तो जैसा है वैसा है लेकिन आप अपने विवेक के अनुसार सही निर्णय तो ले ही सकते हैं।
जंगल में केवल जानवर ही नहीं रहते, पेड़ भी रहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल बहुत कम होता है। प्रकृति का सही उपयोग, खासकर आज के तकनीकी समय में आवश्यक है।
कोयले का खनन जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक पवन चक्कियों, water turbines और solar energy का इस्तेमाल करना है। ऊर्जा और अच्छे शिक्षक ही एक देश का भविष्य बनाते हैं।
प्राकृतिक संसाधनों पर मारामारी, वो भी तब जब प्रकृति हमें ऊर्जा प्राप्त करने के कई और तरीके प्रदान करती है, बात कुछ समझ नहीं आती।
जिनको खनन करने की आवश्यकता है वो खनन करें, जिनको कपास बीनने की आवश्यकता है वो कपास बीनें और जिनको कपड़े बेचने की आवश्यकता है वो कपड़े बेचें।
एक बात और, जो व्यक्ति अपने कुत्ते से प्रेम नहीं कर सकता उसे कुत्ते पालने नहीं चाहिए। अपने पालतू से प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार आपके स्वभाव को दर्शाता है।
कितनी अजीब बात हैं ना, लोग बच्चों को ईश्वर की देन मानते हैं और संबंध शारीरिक सुख के लिए बनाते हैं। आत्मीयता से दूर दूर तक का वास्ता नहीं। France ने कंडोम का आविष्कार किया क्योंकि वो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को ईश्वर पर नहीं थोपता। बात पवित्रता और अपवित्रता की कम और उसको ईश्वर पर थोपने की ज़्यादा है।
वैसे भी दूसरों का genocide कर के कुछ खास नहीं मिलने वाला। किसी का पानी काट देने से कुछ नहीं होता वो भी खासकर तब जब उसे दूसरों को प्रसन्न देख कर सुख मिलता हो।
मनोज कुमार “काले गोरे का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है” गाते हैं लेकिन यहां आए दिन उन लोगों को भी जो दारू नहीं पीते, पता नहीं कैसे नशा हो जाता है।
कभी कभी बात validation की होती है, और कभी कभी बात इस बात पर निर्भर करती है कि आप नशे में न हों तो क्या फैसला करेंगे। विधि का विधान तो जैसा है वैसा है लेकिन आप अपने विवेक के अनुसार सही निर्णय तो ले ही सकते हैं।
आलू डालो सोना निकालो
Oct 26/2020
जैनियों की weightlifting ability का जवाब नहीं। सुमेरिया और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच व्यापारिक संबंध थे। आजतक जब भी अतिक्रमण और आक्रमण हुए हैं ज़्यादातर उत्तर पश्चिम से हुए हैं। ये ऐसा है कि जैसे आप किसी की बुद्धिमता से चिढ़ कर उस पर लात घूसों की बरसात कर दें।
मुझे सूफी संगीत और संस्कृति बहुत पसंद है, परंतु जब भी कहीं पहले सूफी संत आते हैं कुछ दिनों बाद वहां वहाबी तत्व भी आ जाते हैं। कश्मीर में कुछ ऐसा ही हुआ। जहां पहले कश्मीरी संस्कृति थी, वहां पहले सूफी संस्कृति आयी और फिर आतंकवाद।
सद्भावना की कमी हो तो यही होता है। पानी नहीं मिलना हो तो कैसे भी नहीं मिलेगा, चाहे आतंकवाद फैलाओ या शांति से रहो। सूफी संगीत मुझे बहुत पसंद है परंतु उसके बाद वाली परिस्थिति कुछ खास नहीं। आक्रमणकारियों को पानी बहुत कम लोग पिलाते हैं।
कितना अजीब है ना, भारत अपनी धरोहरों को भी सहेज कर नहीं रख पाता। Archeological Survey of India पता नहीं क्या करता है कि लोग धरोहरों पर पान थूक कर चले जाते हैं।
वैसे आजकल स्वच्छ भारत अभियान काफी जोर शोर से चल रहा है। Crafty bastard का अलग ही मतलब निकलता है जब आपने विद्यालय में SUPW सीखा हो। कचरा डालिये कला निकालिये, कचरा डालिये recycle करिये, आलू डालिये, सोना निकालिये।
शौचालय के मल को खाद की तरह इस्तेमाल कीजिये, या फिर उसकी राख बना खेतों को पर्याप्त कार्बन दीजिये। अगर मल को सीधे राख बना देने वाले commode आ जाएं तो नदियां तो गंदी होंगी ही नहीं। कारखाने तो अपना कुछ न कुछ जुगाड़ ढूंढ ही लेंगे।अगर बाहर से कचरा आ रहा है तो घबराइए नहीं, विद्यालय में सीखे गए SUPW का पर्याप्त इस्तेमाल कीजिये।
जैनियों की weightlifting ability का जवाब नहीं। सुमेरिया और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच व्यापारिक संबंध थे। आजतक जब भी अतिक्रमण और आक्रमण हुए हैं ज़्यादातर उत्तर पश्चिम से हुए हैं। ये ऐसा है कि जैसे आप किसी की बुद्धिमता से चिढ़ कर उस पर लात घूसों की बरसात कर दें।
मुझे सूफी संगीत और संस्कृति बहुत पसंद है, परंतु जब भी कहीं पहले सूफी संत आते हैं कुछ दिनों बाद वहां वहाबी तत्व भी आ जाते हैं। कश्मीर में कुछ ऐसा ही हुआ। जहां पहले कश्मीरी संस्कृति थी, वहां पहले सूफी संस्कृति आयी और फिर आतंकवाद।
सद्भावना की कमी हो तो यही होता है। पानी नहीं मिलना हो तो कैसे भी नहीं मिलेगा, चाहे आतंकवाद फैलाओ या शांति से रहो। सूफी संगीत मुझे बहुत पसंद है परंतु उसके बाद वाली परिस्थिति कुछ खास नहीं। आक्रमणकारियों को पानी बहुत कम लोग पिलाते हैं।
कितना अजीब है ना, भारत अपनी धरोहरों को भी सहेज कर नहीं रख पाता। Archeological Survey of India पता नहीं क्या करता है कि लोग धरोहरों पर पान थूक कर चले जाते हैं।
वैसे आजकल स्वच्छ भारत अभियान काफी जोर शोर से चल रहा है। Crafty bastard का अलग ही मतलब निकलता है जब आपने विद्यालय में SUPW सीखा हो। कचरा डालिये कला निकालिये, कचरा डालिये recycle करिये, आलू डालिये, सोना निकालिये।
शौचालय के मल को खाद की तरह इस्तेमाल कीजिये, या फिर उसकी राख बना खेतों को पर्याप्त कार्बन दीजिये। अगर मल को सीधे राख बना देने वाले commode आ जाएं तो नदियां तो गंदी होंगी ही नहीं। कारखाने तो अपना कुछ न कुछ जुगाड़ ढूंढ ही लेंगे।अगर बाहर से कचरा आ रहा है तो घबराइए नहीं, विद्यालय में सीखे गए SUPW का पर्याप्त इस्तेमाल कीजिये।
संधि विच्छेद एवं सेतु निर्माण
Oct 25/2020
जहां आजकल की युवा जनता कार्टून देखने में मस्त है, वहीं मुझे बचपन का एक animation याद आता है, “श्री रघुबर की वानर सेना सेतु बांध रही”।
अजीब बात है है ना कि राना अय्यूब जैसे पत्रकार, जिन्हें व्यक्तिगत क्षति पहुंची है, अपनी नाराजगी प्रशासन पर निकालने की जगह एक पूरे समाज के विरुद्ध विष उगलते रहते हैं। हर कोई शिव नहीं होता, आपके विष फैलाने से दूसरी ओर से भी विष ही मिलता है, जिससे समाज में विष बढ़ता है। अल इलाह का अर्थ अरबी में होता है “The God”। जब तक आपकी सोच में हिटलरशाही नहीं होगी, तब तक अल इलाह को मानने वाले, परमेश्वर को मानने वालों के खिलाफ विष नहीं उगलेंगे। सत्य क्या है, परमेश्वर जानता है।
एक state ईश्वर को जिस रूप में देखता है, वो उसको लागू कर सकता है, परंतु पूरे विश्व को Islamic, ध्यान रखिये इस इस्लाम का अर्थ समर्पण (devotion) नहीं है बल्कि submission है।
Communes और exclusive clubs में अंतर होता है। किसी को बन्दूक या तलवार के ज़ोर पर किसी exclusive club में दाखिल करवाना कहाँ का न्याय है? ओशो का पतन उसी दिन शुरू हुआ था जब उनका commune एक exclusive club बन गया था।
खैर, गणेश गायतोंडे मार खाता रहा तो सरदार जी ने ही उसको पानी पिलाया।
मुझे इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं, बस कुछ सवाल ये हैं कि Syrian Christian, केरल में क्यों रह रहे हैं, और यज़ीदियों पर जुल्म क्यों हो रहा है। एक और बात, पारसी बीच में क्यों पिसते हैं।
नालन्दा और तक्षशिला कब तक आक्रमण सहते रहेंगे, और कब तक नेपाल के हवाईजहाज़ अगवा कर के गांधार देश ले जाये जाएंगे?
जहां आजकल की युवा जनता कार्टून देखने में मस्त है, वहीं मुझे बचपन का एक animation याद आता है, “श्री रघुबर की वानर सेना सेतु बांध रही”।
अजीब बात है है ना कि राना अय्यूब जैसे पत्रकार, जिन्हें व्यक्तिगत क्षति पहुंची है, अपनी नाराजगी प्रशासन पर निकालने की जगह एक पूरे समाज के विरुद्ध विष उगलते रहते हैं। हर कोई शिव नहीं होता, आपके विष फैलाने से दूसरी ओर से भी विष ही मिलता है, जिससे समाज में विष बढ़ता है। अल इलाह का अर्थ अरबी में होता है “The God”। जब तक आपकी सोच में हिटलरशाही नहीं होगी, तब तक अल इलाह को मानने वाले, परमेश्वर को मानने वालों के खिलाफ विष नहीं उगलेंगे। सत्य क्या है, परमेश्वर जानता है।
एक state ईश्वर को जिस रूप में देखता है, वो उसको लागू कर सकता है, परंतु पूरे विश्व को Islamic, ध्यान रखिये इस इस्लाम का अर्थ समर्पण (devotion) नहीं है बल्कि submission है।
Communes और exclusive clubs में अंतर होता है। किसी को बन्दूक या तलवार के ज़ोर पर किसी exclusive club में दाखिल करवाना कहाँ का न्याय है? ओशो का पतन उसी दिन शुरू हुआ था जब उनका commune एक exclusive club बन गया था।
खैर, गणेश गायतोंडे मार खाता रहा तो सरदार जी ने ही उसको पानी पिलाया।
मुझे इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं, बस कुछ सवाल ये हैं कि Syrian Christian, केरल में क्यों रह रहे हैं, और यज़ीदियों पर जुल्म क्यों हो रहा है। एक और बात, पारसी बीच में क्यों पिसते हैं।
नालन्दा और तक्षशिला कब तक आक्रमण सहते रहेंगे, और कब तक नेपाल के हवाईजहाज़ अगवा कर के गांधार देश ले जाये जाएंगे?
विजयदशमी और रंगा गिरगिट
Oct 25/2020
अपने अंदर के रावण को मारना आसान नहीं। लेकिन उसके ब्राह्मण होने के कारण जब तक वो है उसके ज्ञान का यथोचित इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं। आपका रावण है, या तो आप उसके राक्षस का प्रयोग करें या तो उसके ब्राह्मण का।
छिपकलियों के देश में रंगा गिरगिट को adjustment issues हो सकते हैं। कालिया नाग और शेष नाग का युद्ध जारी है, हम सत्यमेव जयते पर विश्वास कर सकते हैं। हिंदुत्व सबको अपनाता है। inclusive society के यही फायदे हैं। अल मन्नत, अल उज़्ज़ा और और अल लत के साथ शेर है तो देवी दुर्गा का वाहन भी सिंह है। लेकिन सबको अपनाना कठिन तब हो जाता है जब लोग ज़िद पर आ जाएं। हिंदुत्व में समय समय पर कोई न कोई reform होता रहता है। वैदिक परममेश्वर है तो मां भगवती भी है। चार्वाक और आजीविक भी हैं। कभी कभी सातवीं सदी से आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। भय चीज़ ही ऐसी है। इसीलिए प्रेम आवश्यक है। बहुत ज़्यादा प्रेम परेशानी पैदा कर सकता है पर बहुत ज़्यादा भय विध्वंसक होता है।
मार्क ज़ुकेरबर्ग अपनी चीनी बीवी के साथ डेटा की खेती कर सकता है, वहीं लाइनस टोर्वल्डस की पत्नी को कराटे सीखने पड़ते हैं।
“तू चंडीगढ़ तो आयी नी” की आवश्यकता नहीं पड़ेगी अगर धर्मशाला को सम्मान मिले। खैर डेटा की खेती करने वाला किसान भी तो किसान ही है। लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद में जान गंवानी पड़ती है, वहीं आम आदमी एक हाथ में झाड़ू और एक हाथ में कंप्यूटर ले कर राहुल द्रविड़ की तरह सायरस ब्रोचा द्वारा बकरा बनाया जाता है।
अपने अंदर के रावण को मारना आसान नहीं। लेकिन उसके ब्राह्मण होने के कारण जब तक वो है उसके ज्ञान का यथोचित इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं। आपका रावण है, या तो आप उसके राक्षस का प्रयोग करें या तो उसके ब्राह्मण का।
छिपकलियों के देश में रंगा गिरगिट को adjustment issues हो सकते हैं। कालिया नाग और शेष नाग का युद्ध जारी है, हम सत्यमेव जयते पर विश्वास कर सकते हैं। हिंदुत्व सबको अपनाता है। inclusive society के यही फायदे हैं। अल मन्नत, अल उज़्ज़ा और और अल लत के साथ शेर है तो देवी दुर्गा का वाहन भी सिंह है। लेकिन सबको अपनाना कठिन तब हो जाता है जब लोग ज़िद पर आ जाएं। हिंदुत्व में समय समय पर कोई न कोई reform होता रहता है। वैदिक परममेश्वर है तो मां भगवती भी है। चार्वाक और आजीविक भी हैं। कभी कभी सातवीं सदी से आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। भय चीज़ ही ऐसी है। इसीलिए प्रेम आवश्यक है। बहुत ज़्यादा प्रेम परेशानी पैदा कर सकता है पर बहुत ज़्यादा भय विध्वंसक होता है।
मार्क ज़ुकेरबर्ग अपनी चीनी बीवी के साथ डेटा की खेती कर सकता है, वहीं लाइनस टोर्वल्डस की पत्नी को कराटे सीखने पड़ते हैं।
“तू चंडीगढ़ तो आयी नी” की आवश्यकता नहीं पड़ेगी अगर धर्मशाला को सम्मान मिले। खैर डेटा की खेती करने वाला किसान भी तो किसान ही है। लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद में जान गंवानी पड़ती है, वहीं आम आदमी एक हाथ में झाड़ू और एक हाथ में कंप्यूटर ले कर राहुल द्रविड़ की तरह सायरस ब्रोचा द्वारा बकरा बनाया जाता है।
पान सिंह तोमर और ढोलकी
Oct 23/2020
Rudebox, Robbie Williams है, और दोनों तरफ से ढोलकी की तरह मार पान सिंह तोमर खाता है। फाइट क्लब ऐसी ही चीज़ है। कभी कभी मार खाने के पैसे मिलते हैं, कभी कभी व्यक्ति इसी सांत्वना पर मार खाता है कि और नहीं मारेंगे। किसी को बहुत मारो तो पिटाई रोकने पर वो बेचारा इसी बात से संतुष्ट रहता है और एहसान मानता है कि कम से कम और पिटाई तो नहीं कर रहे।
Robbie Williams के आस पास लड़कियां twerk करती रहती हैं। पान सिंह तोमर पान खा कर शांति से किताबें पढ़ना चाहता है, शास्त्रीय संगीत सुनना चाहता है। पान सिंह तोमर को भरतनाट्यम पसंद है, क्योंकि उसमें शालीनता है। twerking में भी उसे कोई बुराई नहीं नज़र आती क्योंकि कला तो कला है, लेकिन कला में शालीनता या (grace) हो तो उसका महत्व बढ़ जाता है।
Robbie Williams को California के सपने पता नहीं कौन दिखाता है। पान सिंह तोमर संतुष्ट है, Robbie Williams को गुटका खाना पसंद नहीं।
ज़बान Robbie Williams की चलती है, मार पान सिंह तोमर खाता है।
पान सिंह तोमर की सहायता भी हुई मगर Robbie Williams की भी अपनी ज़िद है। दूसरों का माल अपना समझने की आदत नहीं गयी शायद। दूसरों का माल भी हड़प लो, और फिर उन्हें “civilized” भी बनाओ। क्यों? क्योंकि आपकी civilization ही best है, हो सकता है हो, मगर ये भी तो याद रखने की ज़रूरत है कि ये “civilization” न जाने कितने ही सजीब साहों की लाशों के ऊपर बनी हैं।
अकबर की सोच ठीक थी क्योंकि उसका approach “din-e-ilahi” वाला था। लेकिन वर्तमान समय में “दीन-ए-इलाही” की सबसे ज़्यादा आवश्यकता पाकिस्तान को है। भारत में परमेश्वर सदा से रहा है, और साथ में देवी देवता भी।
Rudebox, Robbie Williams है, और दोनों तरफ से ढोलकी की तरह मार पान सिंह तोमर खाता है। फाइट क्लब ऐसी ही चीज़ है। कभी कभी मार खाने के पैसे मिलते हैं, कभी कभी व्यक्ति इसी सांत्वना पर मार खाता है कि और नहीं मारेंगे। किसी को बहुत मारो तो पिटाई रोकने पर वो बेचारा इसी बात से संतुष्ट रहता है और एहसान मानता है कि कम से कम और पिटाई तो नहीं कर रहे।
Robbie Williams के आस पास लड़कियां twerk करती रहती हैं। पान सिंह तोमर पान खा कर शांति से किताबें पढ़ना चाहता है, शास्त्रीय संगीत सुनना चाहता है। पान सिंह तोमर को भरतनाट्यम पसंद है, क्योंकि उसमें शालीनता है। twerking में भी उसे कोई बुराई नहीं नज़र आती क्योंकि कला तो कला है, लेकिन कला में शालीनता या (grace) हो तो उसका महत्व बढ़ जाता है।
Robbie Williams को California के सपने पता नहीं कौन दिखाता है। पान सिंह तोमर संतुष्ट है, Robbie Williams को गुटका खाना पसंद नहीं।
ज़बान Robbie Williams की चलती है, मार पान सिंह तोमर खाता है।
पान सिंह तोमर की सहायता भी हुई मगर Robbie Williams की भी अपनी ज़िद है। दूसरों का माल अपना समझने की आदत नहीं गयी शायद। दूसरों का माल भी हड़प लो, और फिर उन्हें “civilized” भी बनाओ। क्यों? क्योंकि आपकी civilization ही best है, हो सकता है हो, मगर ये भी तो याद रखने की ज़रूरत है कि ये “civilization” न जाने कितने ही सजीब साहों की लाशों के ऊपर बनी हैं।
अकबर की सोच ठीक थी क्योंकि उसका approach “din-e-ilahi” वाला था। लेकिन वर्तमान समय में “दीन-ए-इलाही” की सबसे ज़्यादा आवश्यकता पाकिस्तान को है। भारत में परमेश्वर सदा से रहा है, और साथ में देवी देवता भी।
गौसेवा और दो पालतू कुत्ते
Oct 23/2020
आजकल की युवा पीढ़ी में बिल्ली पालने का चलन है। मुझे बिल्लियां कुछ खास पसंद नहीं लेकिन अगर कभी पाली तो नाम सोच कर रखा हुआ है, “नेफेरतीति”। मुझे कुत्तों से खास लगाव है। मेरे परिवार में कुत्ते पाले गए, लेकिन बड़े होने के बाद आपको लगता है कि आपके पर्सनल कुत्ते भी होने चाहिए। कुत्ते वफादार होते हैं, आपकी सुरक्षा करते हैं। अगर मैंने कुत्ते पाले तो उनका नाम होगा “Hitler” और “Babar”.
मुझे लगता है कि कुत्ते पालना इंसान पालने से ज़्यादा बेहतर है। मैं काफी दिनों से शाकाहार का पालन कर रहा हूँ, सामान्यतः मैं शाकाहारी ही हूँ लेकिन कभी कभी मांसाहार का मन करता है, खासकर poultry. मछली कभी कभी ही खाना पसंद है, freshwater या seawater ये बनाने वाले पर निर्भर करता है।
बिल्लियां वफादार नहीं होती, लेकिन वो आपसे वफादारी मांगती हैं। मेरे विचार से वफादारी two way street है, और one way street तब है जब आप किसी के नौकर या retainer हों। इसमें भी कई बातें आती हैं, और अच्छा मालिक अपने retainer का खयाल रखता है।
गौसेवा आवश्यक क्यों है? क्योंकि आप गाय के बच्चे का दूध पी लेते हैं। अगर पैसे से दूध खरीद रहे हैं तो कोई बात नहीं लेकिन अगर आप बीफ खाते हैं (जो कि सांस्कृतिक और culinary preference है) तो (अगर आप भारतीय हैं तो) कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि सोशल मीडिया पर चीख चीख कर ये ना बताएं कि बीफ कितनी अच्छी चीज़ है (western preferences अलग हैं, और उनके लिए नार्मल बात है, साथ ही (कइयों में) सालों का colonization का arrogance भी है), जो कि अज्ञानता या संयम की कमी से आता है। मैं संयम की कमी के लिए कभी किसी को दोष नहीं देता क्योंकि संयम या धैर्य की समस्या को मैंने स्वयं भुगता है)।
भारत में दो किस्म के ब्राह्मण पाए जाते हैं, सरकारी ब्राह्मण और जाति के ब्राह्मण। धार्मिक ब्राह्मण इन दोनों में होते हैं, जो अपने ब्राह्मण होने का कर्तव्य निभाते हैं आचार और विचार दोनों से।
कुछ सिर्फ जाति के ब्राह्मण होते हैं, जिनको आदर तो पूरा चाहिए लेकिन कार्य बस दूसरों का शोषण और entitlement रखना है। entitlement हर बार वैधानिक हो सकता है, जब विधि ही आपके हाथ में हो।
“अहिर, गड़रिया, कुनबी, चोर
धय सारे की टंगड़ी तोड़”
इनके कई सिद्धांतो में से एक है, जिसका सही interpretation ये स्वयं भी नहीं कर पाते।
अफसोस, येशु मसीह भी गड़रिये ही थे।
कभी कभी आप किसी से प्यार करते हैं तो आपको उनके भी कुत्ते पालने पड़ते हैं। और एक बात तो मैं बिल्कुल कह सकता हूँ कि dog handling आसान काम बिल्कुल नहीं है, especially तब जब आपको जानवरों से डर लगता हो, भले ही आपको कुत्तों की वफादारी कितनी ही पसंद हो।
आजकल की युवा पीढ़ी में बिल्ली पालने का चलन है। मुझे बिल्लियां कुछ खास पसंद नहीं लेकिन अगर कभी पाली तो नाम सोच कर रखा हुआ है, “नेफेरतीति”। मुझे कुत्तों से खास लगाव है। मेरे परिवार में कुत्ते पाले गए, लेकिन बड़े होने के बाद आपको लगता है कि आपके पर्सनल कुत्ते भी होने चाहिए। कुत्ते वफादार होते हैं, आपकी सुरक्षा करते हैं। अगर मैंने कुत्ते पाले तो उनका नाम होगा “Hitler” और “Babar”.
मुझे लगता है कि कुत्ते पालना इंसान पालने से ज़्यादा बेहतर है। मैं काफी दिनों से शाकाहार का पालन कर रहा हूँ, सामान्यतः मैं शाकाहारी ही हूँ लेकिन कभी कभी मांसाहार का मन करता है, खासकर poultry. मछली कभी कभी ही खाना पसंद है, freshwater या seawater ये बनाने वाले पर निर्भर करता है।
बिल्लियां वफादार नहीं होती, लेकिन वो आपसे वफादारी मांगती हैं। मेरे विचार से वफादारी two way street है, और one way street तब है जब आप किसी के नौकर या retainer हों। इसमें भी कई बातें आती हैं, और अच्छा मालिक अपने retainer का खयाल रखता है।
गौसेवा आवश्यक क्यों है? क्योंकि आप गाय के बच्चे का दूध पी लेते हैं। अगर पैसे से दूध खरीद रहे हैं तो कोई बात नहीं लेकिन अगर आप बीफ खाते हैं (जो कि सांस्कृतिक और culinary preference है) तो (अगर आप भारतीय हैं तो) कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि सोशल मीडिया पर चीख चीख कर ये ना बताएं कि बीफ कितनी अच्छी चीज़ है (western preferences अलग हैं, और उनके लिए नार्मल बात है, साथ ही (कइयों में) सालों का colonization का arrogance भी है), जो कि अज्ञानता या संयम की कमी से आता है। मैं संयम की कमी के लिए कभी किसी को दोष नहीं देता क्योंकि संयम या धैर्य की समस्या को मैंने स्वयं भुगता है)।
भारत में दो किस्म के ब्राह्मण पाए जाते हैं, सरकारी ब्राह्मण और जाति के ब्राह्मण। धार्मिक ब्राह्मण इन दोनों में होते हैं, जो अपने ब्राह्मण होने का कर्तव्य निभाते हैं आचार और विचार दोनों से।
कुछ सिर्फ जाति के ब्राह्मण होते हैं, जिनको आदर तो पूरा चाहिए लेकिन कार्य बस दूसरों का शोषण और entitlement रखना है। entitlement हर बार वैधानिक हो सकता है, जब विधि ही आपके हाथ में हो।
“अहिर, गड़रिया, कुनबी, चोर
धय सारे की टंगड़ी तोड़”
इनके कई सिद्धांतो में से एक है, जिसका सही interpretation ये स्वयं भी नहीं कर पाते।
अफसोस, येशु मसीह भी गड़रिये ही थे।
कभी कभी आप किसी से प्यार करते हैं तो आपको उनके भी कुत्ते पालने पड़ते हैं। और एक बात तो मैं बिल्कुल कह सकता हूँ कि dog handling आसान काम बिल्कुल नहीं है, especially तब जब आपको जानवरों से डर लगता हो, भले ही आपको कुत्तों की वफादारी कितनी ही पसंद हो।
खून, ज़मीन या मज़हब?
Oct 21/2020
भारत, विविधता का देश, धर्म का देश। विश्व में जेनेटिक समानता और विभिन्नता बहुत है। भारत और पाकिस्तान में जेनेटिक समानता है, पाकिस्तान और ईरान, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जेनेटिक समानता है, मंगोलिया और तुर्की में जेनेटिक समानता है, नेपाल और तिब्बत में जेनेटिक समानता है।
हम अपना प्रकार ढूंढते हैं, अपना प्रकार और अपने से थोड़ा सा भिन्न। कभी कभी कोई काफी कुछ अपने जैसा हो तो उससे चिढ़ भी होती है। कोई बहुत अलग हो तो विस्मय या कभी कभी घृणा भी हो सकती है।
यहां पर मज़हब कहाँ आता है? मज़हब तब आता है जब हम दूसरे का genocide करने पर उतर आते हैं।
याद है, पाकिस्तानियों ने क्या किया था बांग्लादेश में? Genocidal rape, न जाने कितनी महिलाओं का। जो लोग ये मान कर की अल्लाह को सिर्फ अरबी भाषा आती है, अल्लाह का अपमान कर सकते हैं, उनके लिए किसी की संस्कृति का अपमान करना कितना कठिन है? अल्लाह में मानो, ठीक है, अपने नियम भी मानो, ठीक है, पर दूसरों को तो उनके नियम मानने दो। कहते हैं ना, नया मुल्ला ज़्यादा बांग देता है। अरबी तसल्ली से रहते हैं, अपने वतन का विकास करते हैं, अपने नियम मानते हैं, वहीं पाकिस्तान अपना इतिहास भी झुठलाने पर तुला हुआ है।
बड़े लोगों में purity वाला हिसाब बहुत होता है। genetic makeup का फर्क बहुत होता है, विडम्बना की बात है ना कि मैंने पढ़ा था कि हिटलर में यहूदी खून भी था, ऐसा व्यक्ति जो आर्यन supremacy मानने वाला था। बहुत ज़्यादा आज़ादी ज़रूरी नहीं परन्तु इतनी तो होनी ही चाहिए की अपने प्रकार के लोगों से खुल कर मिलजुल सकें, लेकिन यहीं पर आ जाता है मज़हब, और उससे ज़्यादा मज़हब का ग़लत इस्तेमाल करने वाले लोग। बंगालियों का genocide कर के क्या मिला? पूरे विश्व को इस्लामिक कर के क्या मिलेगा? विविधता में क्या बुराई है? छोटे communes में क्या बुराई है? विकास के लिए ज़रूरी पूंजीवाद या capitalism में क्या बुराई है? समाज का खयाल रखने वाली socialist सरकार में क्या बुराई है? क्या balance सिर्फ Thanos के तरीके का होना आवश्यक है? सामंजस्य और सद्भावना में क्या बुराई है?
भारत, विविधता का देश, धर्म का देश। विश्व में जेनेटिक समानता और विभिन्नता बहुत है। भारत और पाकिस्तान में जेनेटिक समानता है, पाकिस्तान और ईरान, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जेनेटिक समानता है, मंगोलिया और तुर्की में जेनेटिक समानता है, नेपाल और तिब्बत में जेनेटिक समानता है।
हम अपना प्रकार ढूंढते हैं, अपना प्रकार और अपने से थोड़ा सा भिन्न। कभी कभी कोई काफी कुछ अपने जैसा हो तो उससे चिढ़ भी होती है। कोई बहुत अलग हो तो विस्मय या कभी कभी घृणा भी हो सकती है।
यहां पर मज़हब कहाँ आता है? मज़हब तब आता है जब हम दूसरे का genocide करने पर उतर आते हैं।
याद है, पाकिस्तानियों ने क्या किया था बांग्लादेश में? Genocidal rape, न जाने कितनी महिलाओं का। जो लोग ये मान कर की अल्लाह को सिर्फ अरबी भाषा आती है, अल्लाह का अपमान कर सकते हैं, उनके लिए किसी की संस्कृति का अपमान करना कितना कठिन है? अल्लाह में मानो, ठीक है, अपने नियम भी मानो, ठीक है, पर दूसरों को तो उनके नियम मानने दो। कहते हैं ना, नया मुल्ला ज़्यादा बांग देता है। अरबी तसल्ली से रहते हैं, अपने वतन का विकास करते हैं, अपने नियम मानते हैं, वहीं पाकिस्तान अपना इतिहास भी झुठलाने पर तुला हुआ है।
बड़े लोगों में purity वाला हिसाब बहुत होता है। genetic makeup का फर्क बहुत होता है, विडम्बना की बात है ना कि मैंने पढ़ा था कि हिटलर में यहूदी खून भी था, ऐसा व्यक्ति जो आर्यन supremacy मानने वाला था। बहुत ज़्यादा आज़ादी ज़रूरी नहीं परन्तु इतनी तो होनी ही चाहिए की अपने प्रकार के लोगों से खुल कर मिलजुल सकें, लेकिन यहीं पर आ जाता है मज़हब, और उससे ज़्यादा मज़हब का ग़लत इस्तेमाल करने वाले लोग। बंगालियों का genocide कर के क्या मिला? पूरे विश्व को इस्लामिक कर के क्या मिलेगा? विविधता में क्या बुराई है? छोटे communes में क्या बुराई है? विकास के लिए ज़रूरी पूंजीवाद या capitalism में क्या बुराई है? समाज का खयाल रखने वाली socialist सरकार में क्या बुराई है? क्या balance सिर्फ Thanos के तरीके का होना आवश्यक है? सामंजस्य और सद्भावना में क्या बुराई है?
थकान से राहत, कुछ लघु शंकाएं
Oct 19/2020
कहानियां बहुत सारी हैं। बचपन में अगर हम भाग्यशाली रहे तो एक बहुत तो हमारा मन एक बहुत सुंदर दुनिया गढ़ता है। लेकिन मन को हमेशा कुछ बेहतर चाहिए होता है।
दुनिया को देखने के कई नज़रिये हैं, और मेरा दुनिया को देखने का खूबसूरत नज़रिया तब बदला जब मैंने वो मारामारी, वो आपाधापी देखी, उस ईर्ष्या को देखा जो संबंधों को खराब कर देती है।
मेरे मन ने भी भी एक सुंदर दुनिया को गढ़ा था। मेरे बचपन का समय ऐसा ही था। दूरदर्शन, सुपर मारियो, श्री कृष्णा, शक्तिमान, पुरानी फिल्में, स्कूल में दोस्त, कुछ गलतियां, कुछ मज़ेदार बातें।
और फिर नज़रिया धीरे धीरे बदलना शुरू हुआ। हैरी पॉटर जैसी किताबें पढ़ के आपको अच्छाई पर भरोसा होता है। रामायण और महाभारत आप को हमेशा यही सिखाते हैं कि बुराई पर अच्छाई की विजय होती है। आम भाषा में जो शब्द प्रयुक्त होते हैं वो शायद ही शुद्ध हिंदी या हिंदुस्तानी में प्रयुक्त होते हों। कभी किसी ने कहा है कि मुझे लघुशंका जाना है। इस्तेमाल करके देखिए, लघुशंका। ज़मीनी तौर पर जो शब्द प्रयुक्त होते हैं, मेरा मतलब है एकदम ज़मीनी तौर पर, या कहें रसातल पर, वो सभ्य समाज में नहीं होते। जानता हर कोई है, या ज़्यादातर लोग, लेकिन सब को सज्जन बनना है।
कभी अपने कॉलेज के दोस्त से कह कर देखिये, “यार मैं, लघुशंका जा रहा हूँ”, ना मज़ाक उड़ाया तो कहना। फिर व्यक्ति किन शब्दों का प्रयोग करे? यहां पर अंग्रेज़ी मदद के लिए आती है, “यार मैं ‘लू’ जा रहा हूँ”। ये सारी बातें बिल्कुल कहें तो “बेसिक” हैं, लेकिन हमारे हिंदी प्रेमी और हिंदी “एनफोरसिंग” विद्वानों को इन बातों पर इसलिए ध्यान नहीं देना है क्योंकि, न तो उन्हें लघुशंका होती है, और “दीर्घशंका” तो छोड़ ही दो।
सबका अपना स्वभाव होता है। मेरा स्वभाव ये है कि अगर मैं अपने घर में आलसी हो कर भले ही साफ सफाई न करूं, परंतु अगर मैं अगर बाहर जाता हूँ तो कोशिश करता हूँ कि अगर साफ सफाई न कर सकूं तो कम से कम कचरा तो न ही फैलाऊँ। लेकिन ये मैं अपनी प्रवृत्ति के बारे में बता रहा हूँ। जब आप उन लोगों को देखते हैं, जो धड़ल्ले से कचरा फैलाते हैं, तो आपको लगता है कि भारत की सरकार आलसी है। इसी सरकार का आलस उसी समय तुरंत दूर हो जाता है जब आपकी कल्पनाशीलता थोड़ी ज़्यादा हो जाती है, या आपके विचार थोड़ी “एक्सप्लोरेशन” करने लगते हैं। मेरे बचपन में एक और प्रोग्राम आता था, “छुपा रुस्तम”। भारत में कई छुपे रुस्तम हैं, और हमारा भारत जो इन रुस्तमों को रुस्तम-ए-हिन्द बना सकता है, ऐसी शंकाओं में घिरा है, जो लघु शंकाओं पर बहुत समय तक ध्यान न देने से ही पैदा होती हैं। “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, संविधान अवश्य देता है, लेकिन क्या भारत में संविधान का कोई महत्व है?
जब लिखने की कोशिश करने, या फिर कुछ उससे भी ज़्यादा “बेसिक” बातों पर, “ऊपर दी गुड़ गुड़ दी एनेक्सी दे बेधियाना…..” हो सकता है।
“ठाकुर, बाभन” तो जात ही है, लेकिन “काला, सफेद” तो वर्ण हैं। गेंहुआ, वो रंग है जो अक्सर ‘गुमशुदा की तलाश’ में प्रयुक्त होता है। कभी कभी अपने आपको ठाकुर या जाट या यादव जी समझने वाले लोगों को भी “भारी मिश्टेक हो गया सर, एकदम बलंडर हो गया” कह के दांत निपोरने पड़ते हैं।
“आज़ादी”, “आज़ादी” के रैप सुनकर खून में जोश ले कर सड़कों पर उतरने पर, पृष्ठभूमि पर लट्ठ, रैप बनाने वाला नहीं खाता, वो तो यूट्यूब पर हिट्स और लाइक्स खाता है।
आप ने भले ही कभी “डार्क वेब”, नहीं चलाया हो, पर कोई ज़रूरी नहीं कि इससे आप किसी “कांस्पीरेसी” का हिस्सा न बनें। बस शौकिया तौर पर लगाया हुआ एक “गाए फॉक्स” मास्क भी आपको एक गाय बना सकता है। खेल गहरा है, और कांटेक्ट ट्रेसिंग कौन करे इसलिए ट्रेन में बकरा ढूंढो? इसी बात से एक गाना याद आ गया।
“देखो देखो, क्या वो पेड़ है, चादर ओढ़े या खड़ा कोई”
एक और,
“देखो इन्हें ये हैं, ओस की बूंदे”
और एक आखिर में,
“भगवान, कहाँ है रे तू?”
कहानियां बहुत सारी हैं। बचपन में अगर हम भाग्यशाली रहे तो एक बहुत तो हमारा मन एक बहुत सुंदर दुनिया गढ़ता है। लेकिन मन को हमेशा कुछ बेहतर चाहिए होता है।
दुनिया को देखने के कई नज़रिये हैं, और मेरा दुनिया को देखने का खूबसूरत नज़रिया तब बदला जब मैंने वो मारामारी, वो आपाधापी देखी, उस ईर्ष्या को देखा जो संबंधों को खराब कर देती है।
मेरे मन ने भी भी एक सुंदर दुनिया को गढ़ा था। मेरे बचपन का समय ऐसा ही था। दूरदर्शन, सुपर मारियो, श्री कृष्णा, शक्तिमान, पुरानी फिल्में, स्कूल में दोस्त, कुछ गलतियां, कुछ मज़ेदार बातें।
और फिर नज़रिया धीरे धीरे बदलना शुरू हुआ। हैरी पॉटर जैसी किताबें पढ़ के आपको अच्छाई पर भरोसा होता है। रामायण और महाभारत आप को हमेशा यही सिखाते हैं कि बुराई पर अच्छाई की विजय होती है। आम भाषा में जो शब्द प्रयुक्त होते हैं वो शायद ही शुद्ध हिंदी या हिंदुस्तानी में प्रयुक्त होते हों। कभी किसी ने कहा है कि मुझे लघुशंका जाना है। इस्तेमाल करके देखिए, लघुशंका। ज़मीनी तौर पर जो शब्द प्रयुक्त होते हैं, मेरा मतलब है एकदम ज़मीनी तौर पर, या कहें रसातल पर, वो सभ्य समाज में नहीं होते। जानता हर कोई है, या ज़्यादातर लोग, लेकिन सब को सज्जन बनना है।
कभी अपने कॉलेज के दोस्त से कह कर देखिये, “यार मैं, लघुशंका जा रहा हूँ”, ना मज़ाक उड़ाया तो कहना। फिर व्यक्ति किन शब्दों का प्रयोग करे? यहां पर अंग्रेज़ी मदद के लिए आती है, “यार मैं ‘लू’ जा रहा हूँ”। ये सारी बातें बिल्कुल कहें तो “बेसिक” हैं, लेकिन हमारे हिंदी प्रेमी और हिंदी “एनफोरसिंग” विद्वानों को इन बातों पर इसलिए ध्यान नहीं देना है क्योंकि, न तो उन्हें लघुशंका होती है, और “दीर्घशंका” तो छोड़ ही दो।
सबका अपना स्वभाव होता है। मेरा स्वभाव ये है कि अगर मैं अपने घर में आलसी हो कर भले ही साफ सफाई न करूं, परंतु अगर मैं अगर बाहर जाता हूँ तो कोशिश करता हूँ कि अगर साफ सफाई न कर सकूं तो कम से कम कचरा तो न ही फैलाऊँ। लेकिन ये मैं अपनी प्रवृत्ति के बारे में बता रहा हूँ। जब आप उन लोगों को देखते हैं, जो धड़ल्ले से कचरा फैलाते हैं, तो आपको लगता है कि भारत की सरकार आलसी है। इसी सरकार का आलस उसी समय तुरंत दूर हो जाता है जब आपकी कल्पनाशीलता थोड़ी ज़्यादा हो जाती है, या आपके विचार थोड़ी “एक्सप्लोरेशन” करने लगते हैं। मेरे बचपन में एक और प्रोग्राम आता था, “छुपा रुस्तम”। भारत में कई छुपे रुस्तम हैं, और हमारा भारत जो इन रुस्तमों को रुस्तम-ए-हिन्द बना सकता है, ऐसी शंकाओं में घिरा है, जो लघु शंकाओं पर बहुत समय तक ध्यान न देने से ही पैदा होती हैं। “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, संविधान अवश्य देता है, लेकिन क्या भारत में संविधान का कोई महत्व है?
जब लिखने की कोशिश करने, या फिर कुछ उससे भी ज़्यादा “बेसिक” बातों पर, “ऊपर दी गुड़ गुड़ दी एनेक्सी दे बेधियाना…..” हो सकता है।
“ठाकुर, बाभन” तो जात ही है, लेकिन “काला, सफेद” तो वर्ण हैं। गेंहुआ, वो रंग है जो अक्सर ‘गुमशुदा की तलाश’ में प्रयुक्त होता है। कभी कभी अपने आपको ठाकुर या जाट या यादव जी समझने वाले लोगों को भी “भारी मिश्टेक हो गया सर, एकदम बलंडर हो गया” कह के दांत निपोरने पड़ते हैं।
“आज़ादी”, “आज़ादी” के रैप सुनकर खून में जोश ले कर सड़कों पर उतरने पर, पृष्ठभूमि पर लट्ठ, रैप बनाने वाला नहीं खाता, वो तो यूट्यूब पर हिट्स और लाइक्स खाता है।
आप ने भले ही कभी “डार्क वेब”, नहीं चलाया हो, पर कोई ज़रूरी नहीं कि इससे आप किसी “कांस्पीरेसी” का हिस्सा न बनें। बस शौकिया तौर पर लगाया हुआ एक “गाए फॉक्स” मास्क भी आपको एक गाय बना सकता है। खेल गहरा है, और कांटेक्ट ट्रेसिंग कौन करे इसलिए ट्रेन में बकरा ढूंढो? इसी बात से एक गाना याद आ गया।
“देखो देखो, क्या वो पेड़ है, चादर ओढ़े या खड़ा कोई”
एक और,
“देखो इन्हें ये हैं, ओस की बूंदे”
और एक आखिर में,
“भगवान, कहाँ है रे तू?”
सबका कोई न कोई ठाकुर है
Oct 16/2020
नारीवाद और feminism में एक अंतर है, जहां नारीवाद मौलिक अधिकारों की लड़ाई है वहीं feminism एक power struggle. अनुवाद में बहुत कुछ खो जाता है, जैसे कि हिन्दू राष्ट्रवाद और Hindu Nationalism का अंतर। Individualism पाश्चात्य सोच है, और इसका जन्म मनुष्य की एक कमी के कारण हुआ है और वो है मतलबीपन या अहंकार। एक आम आदमी की दृष्टि से देखें तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। Individualism के कई फायदे हैं।
समाज की गुणवत्ता उसमें रहने वाले लोगों से बनती है। जैसे लोग वैसा समाज। अपना समाज हमेशा अच्छा लगता हैं। अपने लोग हमेशा अच्छे लगते हैं। कभी कभी नहीं भी लगते, और जब नहीं लगते तो फिर हम पलायन कर लेते हैं।
हमारे अनुभव अलग अलग हैं और इसलिए हमारे विचार भी। कुछ अहंकार है, कुछ संस्कार है, और कुछ आनुवंशिकी, आजकल काफी कुछ तकनीकी भी है।
मुझे ज्ञान बांटने का कोई शौक नहीं है क्योंकी मेरा हाल जैसे कि कहते हैं, “बड़ी बड़ी बातें, वडापाव खाते” वाला है। लेकिन कभी कभी लिखना पड़ता है क्योंकि जब कोई विचार समझने के बाद भी चम्मच से खाना चाहता हो जिसे अंग्रेज़ी में spoon-feed कहते हैं, तो लिखना आवश्यक हो जाता है।
बिना पिये कुछ नशा हो जाये तो व्यक्ति क्या करे। संस्कृतियों के इस तंत्र में हर कदम फूंक फूंक कर रखना थोड़ा तो कठिन है ही, खासकर तब जब दिव्यांग रहने की इतनी आदत लग जाये कि व्यक्ति आंखें ही न खोलना चाहता हो।
कभी कभी आंखें इतनी बंद हो जाती हैं कि व्यक्ति या तो स्वयं corporate मवाली बन जाता है, या किसी corporate मवाली को पहचान नहीं पाता। मुझे पूंजीवाद से कभी कोई दिक्कत नहीं रही। पूंजीवाद का विरोध करने वालों से एक बार कहिये की वो अपने घर में किसी को मुफ्त में रख लें। विरले ही होंगे जो ऐसा करेंगे। हां, मुश्किल तब होती है जब किसी की अधूरी कहानी या उपन्यास के पूरा होने से पहले ही वो विक्षिप्त हो जाये, या फिर स्वयं विक्षिप्तता फैलाने का एक कारण बन जाये। खैर, एक पुरानी कहावत है, जिसकी लाठी उसकी भैंस।
इरफान खान को एक कविता पढ़ते हुए इंटरनेट पर देखा, ठाकुर का कुआं। हम सब का कोई न कोई ठाकुर है, यहां तक की ठाकुर के भी ठाकुर हैं। जिसके ठाकुर नहीं हैं उसके ठाकुर जी हैं।
राक्षसों को दंड देना आवश्यक है, अगर राज करने वाले स्वयं राक्षस न हों तो। जो कि काफी कठिन है। मेरे विचार से भले दैत्यों को उनके प्रकार (समाज) के साथ रहने देना चाहिए। देवताओं और असुरों में रस्साकशी चलती है। असुर उपद्रवी अवश्य हैं पर जैसा कि हम लोगों ने पढ़ा और टी वी पर देखा है, देवताओं ने भी स्वर्ग के सिंहासन पर आधिपत्य जमाये रखने के लिए कम चतुराई और कभी कभी कुटिलता नहीं दिखाई। निकट दृष्टि दोष के लाभ हैं, और ये आवश्यक नहीं कि निकट दृष्टि दोष वाले से दूरदर्शन का भी कार्य लिया जाए।
नारीवाद और feminism में एक अंतर है, जहां नारीवाद मौलिक अधिकारों की लड़ाई है वहीं feminism एक power struggle. अनुवाद में बहुत कुछ खो जाता है, जैसे कि हिन्दू राष्ट्रवाद और Hindu Nationalism का अंतर। Individualism पाश्चात्य सोच है, और इसका जन्म मनुष्य की एक कमी के कारण हुआ है और वो है मतलबीपन या अहंकार। एक आम आदमी की दृष्टि से देखें तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। Individualism के कई फायदे हैं।
समाज की गुणवत्ता उसमें रहने वाले लोगों से बनती है। जैसे लोग वैसा समाज। अपना समाज हमेशा अच्छा लगता हैं। अपने लोग हमेशा अच्छे लगते हैं। कभी कभी नहीं भी लगते, और जब नहीं लगते तो फिर हम पलायन कर लेते हैं।
हमारे अनुभव अलग अलग हैं और इसलिए हमारे विचार भी। कुछ अहंकार है, कुछ संस्कार है, और कुछ आनुवंशिकी, आजकल काफी कुछ तकनीकी भी है।
मुझे ज्ञान बांटने का कोई शौक नहीं है क्योंकी मेरा हाल जैसे कि कहते हैं, “बड़ी बड़ी बातें, वडापाव खाते” वाला है। लेकिन कभी कभी लिखना पड़ता है क्योंकि जब कोई विचार समझने के बाद भी चम्मच से खाना चाहता हो जिसे अंग्रेज़ी में spoon-feed कहते हैं, तो लिखना आवश्यक हो जाता है।
बिना पिये कुछ नशा हो जाये तो व्यक्ति क्या करे। संस्कृतियों के इस तंत्र में हर कदम फूंक फूंक कर रखना थोड़ा तो कठिन है ही, खासकर तब जब दिव्यांग रहने की इतनी आदत लग जाये कि व्यक्ति आंखें ही न खोलना चाहता हो।
कभी कभी आंखें इतनी बंद हो जाती हैं कि व्यक्ति या तो स्वयं corporate मवाली बन जाता है, या किसी corporate मवाली को पहचान नहीं पाता। मुझे पूंजीवाद से कभी कोई दिक्कत नहीं रही। पूंजीवाद का विरोध करने वालों से एक बार कहिये की वो अपने घर में किसी को मुफ्त में रख लें। विरले ही होंगे जो ऐसा करेंगे। हां, मुश्किल तब होती है जब किसी की अधूरी कहानी या उपन्यास के पूरा होने से पहले ही वो विक्षिप्त हो जाये, या फिर स्वयं विक्षिप्तता फैलाने का एक कारण बन जाये। खैर, एक पुरानी कहावत है, जिसकी लाठी उसकी भैंस।
इरफान खान को एक कविता पढ़ते हुए इंटरनेट पर देखा, ठाकुर का कुआं। हम सब का कोई न कोई ठाकुर है, यहां तक की ठाकुर के भी ठाकुर हैं। जिसके ठाकुर नहीं हैं उसके ठाकुर जी हैं।
राक्षसों को दंड देना आवश्यक है, अगर राज करने वाले स्वयं राक्षस न हों तो। जो कि काफी कठिन है। मेरे विचार से भले दैत्यों को उनके प्रकार (समाज) के साथ रहने देना चाहिए। देवताओं और असुरों में रस्साकशी चलती है। असुर उपद्रवी अवश्य हैं पर जैसा कि हम लोगों ने पढ़ा और टी वी पर देखा है, देवताओं ने भी स्वर्ग के सिंहासन पर आधिपत्य जमाये रखने के लिए कम चतुराई और कभी कभी कुटिलता नहीं दिखाई। निकट दृष्टि दोष के लाभ हैं, और ये आवश्यक नहीं कि निकट दृष्टि दोष वाले से दूरदर्शन का भी कार्य लिया जाए।
तर्क, कुतर्क और चमत्कार
Oct 16/2020
भारतीयों को व्यंग्य बहुत अच्छे से समझ आता है पर यही बात मैं sarcasm के लिए नहीं कह सकता। आप जीवन में चमत्कार की आशा रखते हैं। लोगों के घर आने पर आप फिल्टर्ड पानी पिलाते हैं और दूसरों के घर जा कर गंदा पानी पीते हैं।
एक दिन अचानक आप अज़ान के समय उठ जाते हैं। क्यों? क्योंकि शायद आप का अपना देश आप को आपकी औकात दिखा रहा होता है। या शायद वो आपका देश न हो, कोई और मुल्क हो।
पाप पुण्य के नियम हैं, सख्त हैं, ठीक है। दंड भी बनता है। पर क्या ये नियम सबके लिए हैं?
जीवन और मनुष्य क्या इतना छिछला है कि उसे समोसे और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ नहीं दिखता? बिनोद राम के पीठ पर कूबड़ निकल आता है, और जब वो विरोध करता है तो मार्क्सिस्ट बन जाता है।
जूलियस असांज बलात्कार के केस में जेल जाता है और कहीं किसी सामान्य आदमी को इतना डराया जाता है कि वो उग्र हो जाता है। ध्यान रखिये भाइयों और बहनों, बस कुछ समय के लिए उग्र, उग्रवादी नहीं।
हिन्दू राष्ट्रवाद ज़मीन पर धमाल मचाता है वहीं कला जगत में संस्कृति का अल तक्किया होता है। मनोरंजन मनोरंजन नहीं रहा, आपको जांचने का बस एक साधन मात्र हो गया है।
शिव बाथरूम से निकल कर भागते हैं, क्योंकि कोई आपकी आस्था का वो ही मोल लगाता है। कोई आस्था को परे रख कर प्रमाण और विज्ञान की राह पर चलता है तो क्या वो ईशनिंदा है?
भेड़ बकरियों की तरह जीवन व्यतीत न करने की इच्छा रखना क्या एक स्वप्न है? बेहूदे लोगों से अनुशासन की इच्छा रखना क्या ग़लत है? यहां पर चमत्कार की बात आती है। और यहीं पर बात आती है विधि के विधान की।
भारतीयों को व्यंग्य बहुत अच्छे से समझ आता है पर यही बात मैं sarcasm के लिए नहीं कह सकता। आप जीवन में चमत्कार की आशा रखते हैं। लोगों के घर आने पर आप फिल्टर्ड पानी पिलाते हैं और दूसरों के घर जा कर गंदा पानी पीते हैं।
एक दिन अचानक आप अज़ान के समय उठ जाते हैं। क्यों? क्योंकि शायद आप का अपना देश आप को आपकी औकात दिखा रहा होता है। या शायद वो आपका देश न हो, कोई और मुल्क हो।
पाप पुण्य के नियम हैं, सख्त हैं, ठीक है। दंड भी बनता है। पर क्या ये नियम सबके लिए हैं?
जीवन और मनुष्य क्या इतना छिछला है कि उसे समोसे और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ नहीं दिखता? बिनोद राम के पीठ पर कूबड़ निकल आता है, और जब वो विरोध करता है तो मार्क्सिस्ट बन जाता है।
जूलियस असांज बलात्कार के केस में जेल जाता है और कहीं किसी सामान्य आदमी को इतना डराया जाता है कि वो उग्र हो जाता है। ध्यान रखिये भाइयों और बहनों, बस कुछ समय के लिए उग्र, उग्रवादी नहीं।
हिन्दू राष्ट्रवाद ज़मीन पर धमाल मचाता है वहीं कला जगत में संस्कृति का अल तक्किया होता है। मनोरंजन मनोरंजन नहीं रहा, आपको जांचने का बस एक साधन मात्र हो गया है।
शिव बाथरूम से निकल कर भागते हैं, क्योंकि कोई आपकी आस्था का वो ही मोल लगाता है। कोई आस्था को परे रख कर प्रमाण और विज्ञान की राह पर चलता है तो क्या वो ईशनिंदा है?
भेड़ बकरियों की तरह जीवन व्यतीत न करने की इच्छा रखना क्या एक स्वप्न है? बेहूदे लोगों से अनुशासन की इच्छा रखना क्या ग़लत है? यहां पर चमत्कार की बात आती है। और यहीं पर बात आती है विधि के विधान की।
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