Wednesday, 16 March 2022

जहाज़ पर सफेदी की चमकार और निरमा शुद्ध नमक

Nov28/2020

आप जहाज़ पर जाते हैं, आपका मन नहीं है पर फिर भी आप जहाज़ पर जाते हैं। वहां एक गोरा व्यक्ति आपको देख कर मुंह बनाता है। आप notice करते हैं। अब अगर आप सोचें कि आप उसकी जगह होते तो क्या करते। मेरे अंदर जितना भी रंगभेद है वो बाहरी है, लेकिन हां aesthetic के मामले में मैं ज़रा पक्षपाती हूँ। मतलब है कि शारीरिक रूप से जो लोग सुंदरता के सामाजिक मानक पर खरे नहीं उतरते उन्हें academics या research में जाना चाहिए जैसे विचार मेरे मन में आते रहते हैं। फिल्मों में hero और heroine सुंदरता के सामाजिक मानकों पर खरे उतरने चाहिए जैसे खयाल मेरे मष्तिष्क में आते रहते हैं। फिल्मों में ऐसे कई लोग हैं जो पर्दे पर उतने आकर्षक नहीं दिखते पर पर्दे के पीछे उनका कार्य जैसे कि direction etc. कमाल का होता है। आज कल representation का ज़माना है। सबको representation चाहिए। चाहने और ज़बरदस्ती करने में अंतर होता है, और आजकल ज़बरदस्ती भी चल पड़ी है। इसलिए आजकल हम लोगों को ऐसी फिल्में देखने को मिलती हैं जिसमें किरदार तो अलग अलग नस्लों और समाजों से होते हैं पर महसूस हो जाता है कि ये forced है। जो forced नहीं होता वो भी पता लग जाता है। लोग The Little Mermaid में काली Ariel चाहते हैं लेकिन जिनका मकसद हंगामा खड़ा करना नहीं होता वो Ariel को वैसे ही रहने देते और नया किरदार लिखते, श्याम वर्ण की जलपरी या फिर गेहुएं रंग की।

कभी कभी निरमा नमक का वो प्रचार याद आ जाता है जिसमें एक बालक कहता है “सारे काम मैं करूँ, सफाई भी, shopping भी”। आलस्य मेरी कमज़ोरी है, और मुझे ज़्यादातर थकान रहती है पर जो काम आवश्यक है, और जितना शरीर साथ देता है मैं करता हूँ।

वैसे मुंह बनाने वाले भारत में भी कम नहीं, कुछ तो पहले आपके व्यक्तिगत मामलों में झांकेंगे और उसके बाद मुंह बनाएंगे। कभी कभार मैं भी इस मुंह बनाने वाली बात का दोषी रहा हूँ। कभी कभी बात मुंह बनाने वाली होती भी है।

कभी कभी जिन “नवीन” या “पाश्चात्य” चीजों को हम for granted ले लेते हैं, या फिर “peer pressure” में आ कर हम जिन चीजों को सच मान लेते हैं वो हमारे चरित्र के लिए सही साबित नहीं होतीं। वैसे भी कई बार दिखने वाले चरित्र और वास्तविक चरित्र में अंतर होता है। विज्ञान पर विश्वास इसलिए होता है क्योंकि वो तथ्य पर based होता है लेकिन विज्ञान को भी सत्य परखने या उसको मापने के लिए एक standard चाहिए होता है। कभी कभी Darwin पर बहुत अधिक विश्वास कर लेने पर आपको Darwin अवार्ड मिल सकता है, जो अगर आप आज कल के meme culture से परिचित हैं तो आपको पता होगा कि ये बहुत अच्छी बात नहीं है।

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