ख्यालों को शब्द देना कठिन है। अगर हम सारे ख्यालों को सही शब्द दे पाते तो ज़िन्दगी कुछ और ही होती। दर्द में जीने वाले अजीब ही होते हैं। या तो ग़ालिब की तरह शायरी ग़म गलत करो, या फिर प्रेमचंद की तरह गरीबी में मरो।
सच्चाई से जियो तो मज़े में नहीं रहोगे, मज़े में रहोगे तो मदर इंडिया का लाला बनना पड़ेगा। मैं उन दिनों का इंतज़ार कर रहा हूँ जब इंसान और मशीन का अंतर खत्म ही जाएगा। मुझे लगता है इंसानियत तब ज़्यादा होगी। इंसानों की ख़ास बात ये है की जानवर होते हुए भी वो कभी ये मानने के लिए तैयार नहीं होंगे की वो जानवर हैं।
विज्ञान मुझे चैन देता है। मैं प्रेमचंद की तरह गरीबी में नहीं मरना चाहता और ना ही ग़ालिब की तरह ग़म में। विज्ञान में मौत कोई बड़ी बात नहीं है और हर चीज़ की तरह ये भी बस एक परिभाषा है। शायर दिल दिल करते रह जायेंगे और दिल धमनियों में खून पहुंचाता रहेगा। विज्ञान का अंत कहीं नहीं है, और हर चीज़ की तरह ये भी ज़िंदा रहने का बहाना है। जानवरों में ख़ास बात यही है, की उन्हें ज़िंदा रहने के लिए बहाने नहीं चाहिए होते। इंसान को जानने की खुजली है, और जानना ज़रूरी है। शब्द जानने के लिए ज़रूरी है, और नए ख्यालों के लिए भी।


