Wednesday, 30 September 2015

Thoughtspill

At that time, the idea was far fetched. Earth and the world are two different places. Earth is where i belong, word is where i am trying to belong. The idea of me is confusing, knowing oneself and still not is a troublesome thing. A sudden awakening, awareness of things beyond human realm. It makes me feel like Neo in the matrix. I can predict the future, i can see through people, i can sense their emotions.

But to survive, belonging to the earth isn't enough, one will have to belong to the world too.

Comfort is not good for survival. Comfort should be avoided. I have seen my muscles failing and the theories of disease collapsing in front of me. I have decoded health, and i have decoded disease. A personal idea about self need not to be matched by others, but your self should be in sync with others as well as nature.  

Judgement is done in a particular way. And people are judgemental regardless of what troubles an individual faces. Caring humans are bound to suffer. The educated ones are bound to be either enlightened or to going to the dark side.

Tuesday, 29 September 2015

Journal

I am feeling not very good, as mu health is not much better and i couldn't study well for my exams. I haven't had much study lately and it is going to take me some time to get used to studying. My biophysics paper sucked and i am totally judging myself for not studying and completing my notes. Over this my health has been too awesome to really work, but this has happened because i fell upon the earlier pattern of doing it all in the end. Well, the day has been shit and i am feeling unwell with each muscle of my body in pain and there is this bad taste in my mouth since a few days.

Anyway tomorrow is biochemistry and i gotta study.

Friday, 18 September 2015

भागते रहो

नुकसान की भरपाई आप कैसे करते हैं? शेर हिरन को दौड़ा दौड़ा कर उनका शिकार करता है। दुनिया शिकारियों से भरी हुई है। लोग दूसरों के दर्द में मज़े लेते हैं। दोगले, मक्कार और काइयां लोगों से दुनिया भरी हुई है। मेरी दिक्कते कम होने का नाम ही नहीं लेतीं क्योंकि मैं ये ज़रूरी चीज़ें सीख ही नहीं पा रहा। दोगलापन मक्कारी जैसी ज़रूरी चीज़ें सीखे बिना मैं पता नहीं आगे कैसे बढूंगा। अगर दुनिया एक जंगल है तो मैं एक भालू हूँ। मैं मस्ती में अकेले रहता हूँ और मछलियाँ खाता हूँ। मैं अपने उलटे तरीके से पेड़ों की ऊंचाइयों पर चढ़ता हूँ और शहद खाता हूँ। न तो में किसी को परेशान करता हूँ न ही होना चाहता हूँ। लेकिन मुझे नहीं पता कि दुनिया के इतने गीदड़ो, लकड़बग्घों और भेड़ियों का क्या इलाज है। ये तब है जब इस जंगल में बिना शिकार किये जीने के सीधे रास्ते हैं। कमज़ोरों के लिए एक ही रास्ता लगता है। भागते रहो।

Thursday, 17 September 2015

गोल चश्मे, दाढ़ियाँ, और जानवर

जॉन लेनन का चश्मा कैसा था? गोल? उसकी बुद्धि भी गोल थी। सारे गोल चश्मे वाले एक जैसे होते हैं। सारे दाढ़ी वाले अंदर से ठरकी होते हैं। अगर पहचान पाओ तो। सारे गोल चश्मे वाले गोल चश्मे नहीं पहनते और सारे दाढ़ी वालों की दाढ़ी नहीं होती।

मैं पहाड़ पर रहना चाहता हूँ। पहाड़ की ज़िन्दगी। वो मेहनत भरी धीमी ज़िन्दगी। खतरे से भरी ज़िन्दगी। पर हर इच्छा पूरी नहीं होती। मैंने अपनी बीमारी से काफी लड़ाई की है, वो भी अकेले। अपनी दिक्कतों से लड़ना और साथ में आगे भी बढ़ते रहना मुश्किल काम है। भीड़ भाड़ में रहने से ये काम और भी मुश्किल हो जाता है।

भारत की मुझे ये दिक्कत लगती है की यहाँ  के लोगों को औकात से ज़्यादा आज़ादी मिल गयी है। मुझे लगता है की आज़ादी का निर्धारण मेहनत, ज्ञान या शिक्षा के आधार पर होना चाहिए। इन तीनों में से एक भी किसी इंसान में ज़्यादा मात्रा में है, उसको पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। और इनको जांचने के लिए तरीके विकसित किये जाने चाहिए। खाली और बद्तमीज लोगों के लिए आज़ादी का कोई अर्थ नहीं।

लोग ऐसे ही होते रहे तो गोल चश्मे वाले कहीं खो जाएंगे। गोल चशमे वाले गोल बुध्दि वाले पागल लोग ही बदलाव् लाते हैं। और दाढ़ी वाले उन बदलावों को इतिहास के पन्नों में अंकित करते हैं। और फिर उन की सारी मेहनत खाली बैठे इन बेवकूफ और निर्दयी जानवरों द्वारा बर्बाद कर दी जाती है।

Tuesday, 15 September 2015

दिल ए गुलज़ार

मैं कभी कभी सोचता हूँ कि गुलज़ार की कविताओं में ऐसा क्या है जो दिल को छू जाता है? गुलज़ार के लफ़्ज़ों में सादगी है। ऐसे लफ्ज़ जो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के हैं पर गहरे एहसास छोड़ जाते हैं। गुलज़ार के शब्द निराला जैसे नहीं हैं, न ही सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे, पर इन सादे शब्दों की गहराई भी उतनी ही है।

मैं अपनी कविताओं में उतनी सादगी का मेल नहीं कर पाता। शायद कभी कर पाऊं। आज कल तो मैं कवितायेँ लिख भी नहीं पाता। ज़्यादा सोचने का भी समय नहीं मिलता। अभी मन हो रहा है तो कुछ पंक्तिया लिखूंगा।

मेरे तकिये के नीचे रखी पुरानी डायरी में
मेरे प्यार के कुछ लम्हे सहेजे है,
जब मैं था, तुम थी, और वो गुलमोहर था।

तुम्हारी खुशबू को आज भी हवा में सूंघता हूँ
जैसे तुम कहीं आस पास हो,
शुक्र है सहेजना मैंने कभी सीखा था।

ज़िन्दगी की धूप में आगे बढ़ गया हूँ
पर आज भी रुकता हूँ उस गुलमोहर की ठंडी छाँव में,
सुस्ताने के लिए।

हिंदी दिवस के एक दिन बाद

कल हिंदी दिवस था तो आज मैंने हिंदी में लिखने का निर्णय किया। हिंदी मेरी पसंदीदा भाषा है। संस्कृत वाली हिंदी हो या उर्दू वाली, या फिर बोलचाल की हिंदी, या दोस्तों के बीच की गन्दी हिंदी। मुझे हिंदी पसंद है। मैं अंग्रेजी में बात करना पसंद करता हूँ क्योंकि अंग्रेजी को आप तेज़ बोल सकते हैं पर हिंदी में बात करने का आनंद ही कुछ और है।

हम लोग रोज़ हिंदी में  बात करते हैं। हर एक शब्द मन में एक भाव जगाता है। मैं अंग्रेजी में लिखता हूँ और मुझे लगता है अंग्रेजी में लिखने के कारण मेरे मन के कई भाव अनुवाद में खो जाते हैं। आज मैंने एक फैसला किया है की अंग्रेजी के साथ साथ अब मैं जितना हो सकेगा हिंदी में भी लिखूंगा। वैसे भी मैं नीयत से अंग्रेज़ नहीं हूँ। वैसे हिंदी भाषियों की मुझे अंग्रेजी बोलने वालों का मज़ाक उड़ाने की बात समझ नहीं आती। अंग्रेजी हिंदी की तरह ही एक भाषा है और कोई बोलना चाहे तो ये उसका फैसला होना चाहिए। अंग्रेजी बोलने से कोई अँग्रेज़ नहीं बन जाता और इसी तरह हिंदी बोलने से कोई छोटा नहीं हो जाता। हैप्पी हिंदी डे!

Competent Authority

You imagine a girl painting a picture of you as Tyler Durden from fight club. A pizza delivery boy goes to deliver a pizza at a whorehouse. ...