मैं हिंदी भाषा पर थोडा काम करना चाहता हूँ। हिंदी हमारी बोलचाल की भाषा है पर ढंग की हिंदी का प्रयोग शायद ही कभी होता हो। हर विचार को हिंदी में व्यक्त करना आज कल मुश्किल हो गया है क्योंकि अंग्रेजी का इस्तेमाल इतना हो गया है की विचार भी अंग्रेजी में आते है।
मैं लेखनी में बोलचाल की भाषा का प्रयोग करना चाहता हूँ पर उस पर मुझे अभी काम करना है।
निःस्वार्थ भाव से काम करने वालों को ठेंगा ही मिलता है। मैंने काफी मेहनत से काम किया था और जो दुनिया मैं जानता था वो छलावा निकली। काफी दर्दनाक एहसास है। धोखा काफी बुरा लगता है।
जब मैं इस तरीके से सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि ज़िन्दगी काफी उबाऊ है। हम ऊब से भागते हैं। बेवक़ूफ़ लोग, अपने स्वार्थ के पीछे भागते हुए। इन सारे विभिन्न नज़रियों को मिलाना और एक सत्यपरक नजरिया तय करना काफी कठिन काम है।
लोगों की नज़रें गलतियां और कमज़ोरियाँ ढूंढती हैं। सोच और विचार काफी ज़रूरी हिस्से हैं। बिना गलती के डरना, क्यों। दुनिया डर सूंघ लेती है। और चाहे आप कैसे भी इंसान हों, अच्छे या बुरे, अगर आप डर गए तो इलज़ाम भी आप को ही लेना पड़ेगा।
अनुवाद बहुत ज़रूरी है। और लोग काफी घटिया हैं। मैं इन बातों पर यकीन नहीं करता।