Thursday, 7 April 2022

कहानियाँ

कहानियां बहुत हैं। हर जगह देखो कहानियां ही कहानियां। बस कहने के लिए हिम्मत चाहिये जो सबके पास नहीं होती। दूसरे देशों की संस्कृतियां, वहां के किस्से, वहां की लोककथाएं। हमारे देश की लोककथाएं जिनको यूट्यूब पर घटिया एनीमेशन वीडिओज़ और 'नागिन गिन गिन गिन" जैसे म्यूजिक वीडिओज़ न सिर्फ लोगों के दिमाग से मिटा रहे हैं बल्कि उनकी जगह भी ले रहे हैं। काश कोई फ़िल्म स्टूडेंट, लोककथाओं और दादी नानी के किस्सों पर प्रोजेक्ट बनाता तो हर घर से कई कहानियां निकलतीं। दूसरे देशों के पास क्वालिटी है पर हमारे देशों के वीडिओज़ देख कर तो लगता है कि कम से कम सत्तर प्रतिशत वीडिओज़ में क्वालिटी भी नहीं। अपनी कहानियां हम सहेज रहे हैं या नहीं पता नहीं पर इंटरनेट पर भड़ास ज़रूर निकाल रहे हैं। 

पहाड़ों पर जाओ वहां पर अलग कहानियां हैं। इतनी सारी कहानियां, देवों की, गंधर्वों की, किन्नरों की। पूरी अलग दुनिया है। देवों और दानवों के बीच युद्ध की कहानियां। राजाओं की कहानियां, भीलों की कहानियां, राज्यों की कहानियां। सारी कहानियां अब कहाँ चली गईं जो हम अब इंटरनेट पर या तो राजनीतिक लड़ाइयां लड़ते रहते हैं, या फिर शिकायतें करते रहते हैं। मनोरंजन के नाम पर फिल्मों की क्लिप्स या फिल्मी गानों पर नाचते युवा लड़के लड़कियों की क्लिप्स देखते रहते हैं। सृजन करने वाले लोग खामोश हैं। कोई बोल नहीं रहा। 

आप नई दुनिया बनाना चाहते हैं। गंधर्वों की दुनिया जहां वो सुगंधित पुष्पों के बीच बैठ कर संगीत बजा रहे हैं और सुरा पी रहे हैं। आप दानवों की कहानियां लिखना चाहते हैं। आप चाहते हैं असुरों की कहानियां लिखें जहां असुरों के रीति रिवाजों के बारे में आप बताएं, ये बताएं कि सारे असुर बुरे लोग नहीं थे बस उनके रीति रिवाज अलग थे और देवों के साथ युद्ध के कारण सब असुर बदनाम हो गए। आप ये बताएं कि राक्षस कैसे होते थे, क्या राक्षस असुरों से अलग थे या उन्ही की एक प्रजाति थे। कितना कुछ है ना दिखाने और सुनाने के लिए। परन्तु हम शायद यही सुनना चाहते हैं 'इट्स बीन लांग तेरी बीन सुने परदेसी'। 

गनीमत

कितनी खूबसूरत थी न वो ज़िन्दगी, चाय के प्याले और लोगों का साथ। लोगों पर भरोसा और उनको बेहूदगी के दलदल में उतरते देखने के बजाय अच्छी बातें करते देखना। बात करने के टॉपिक कई हैं, आप ज़िद्दी हैं और आपको अपने अंदर कुछ चीज़ें पसंद नहीं और फिर मजबूरन आपको समाज को देखना पड़ता है और आपको लगता है कि आप उतने बुरे भी नहीं। आपके पास दिल की बातें करने के लिए कोई भी नहीं, कोई है भी तो आपको लगता है कि वो समझ नहीं पाएंगे इसलिए आप लिखते हैं। आप लिखते हैं पेड़ों के बारे में, उन दुनियाओं के बारे में जिनके बारे में लोग सोचते भी नहीं। ऐसी दुनिया जहाँ बर्फ से घिरी वादियों में एक कॉटेज में बैठ कर लोग चाय की चुस्कियां लेते हैं। ऐसी दुनिया जहाँ ठंडे पहाड़ो पर आग के इर्दगिर्द बैठ कर लोग हॉट चॉकलेट पीते हैं। अब ऐसा करते हैं इन दुनियाओं में राजनीति घुसेड़ कर देखते हैं। हो गयी न दुनिया खराब। आजकल इस देश का भी यही हाल है, लेकिन हम जैसे आम लोगों को क्या फर्क पड़ता है? जिनके हाथ में बागडोर है वो नहीं सोच रहे तो हम सोचने और बोलने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं? वैसे देखा जाए तो कर सकते हैं। हम अपनी दुनिया में खुश रह सकते हैं। 

ए०सी० में लेट कर ज्ञान देना आसान होता है जैसे कभी कभी आप अपने लेखों में देते हैं। आप फिर इस बारे में सोचते हैं और लिखने के लिए लिखते हैं। सौंदर्यबोध के लिए। पढ़ने वालों को ज्ञान देने की बजाय महसूस कराने के लिए। वो लेखन ही क्या जो महसूस न हो। बैटमैन की कॉमिक्स का वो अच्छा लगने वाला अंधेरा। पुरानी कॉमिक्स की चित्रकला, जब आप कल्पनालोक में ही जीते थे। कॉमिक्स की दुनिया अलग होती है, वहां उतना ही टैक्स देना होता है जितना उस कॉमिक का मूल्य होता है, और उसमें तमाम विपत्तियों के बाद भी अधिकतर आपका सुपरहीरो या नायक अंत में जीत ही जाता है। अपने जैसे लोगों का साथ बेहद ज़रूरी है और आप अपने जीवन में महसूस किया है कि अपने जैसे लोगों का साथ न हो तो अकेले रहना ही बेहतर है। चाय की चुस्कियां कभी अकेले भी मज़ा देती हैं, ये तो गनीमत है कि मौसम पर किसी का अधिकार नहीं है। बारिश के मौसम में आप आराम से बालकनी में बैठ कर चाय का मज़ा ले सकते हैं और अकेले वर्षा की बूंदों को आसमान से गिरता हुआ देख सकते हैं। 

घिन और पुष्प

घिनौने और घटिया लोगों से भरी दुनिया जो दिमाग से दूसरों पर वार करते हैं। किसी से नफरत करने के लिए क्या चाहिए कुछ नहीं। शक्ल पसंद नहीं, कोई बात पसंद नहीं, लो जी बस हो गयी नफरत। कीड़े मकोड़ों की तरह बिलबिलाते लोग, कौन खयाल रखेगा उनका? कोई नहीं। पर किसी की ज़िंदगी तबाह करने के लिए दिन और रात दोनों एक कर देंगे। कॉमिक्स लिखने वाले शरीफ लोग बीमारी का शिकार हो कर बेमौत मारे जाते हैं, और घिनौने लोग बचे रहते हैं बाकी बचे शरीफ लोगों का जीवन नरक करने के लिए। जावेद अख्तर ने एक गाना लिखा था – "जग में सांप बसते हैं, सबको सांप डसते हैं, बैठे कुंडली मार के सांप फन काढ़े, सांप है फुंकारते, ज़हरीले ज़हरीले।" इंसानी रूप में ये रेंगते हुए कीड़े दूसरों को प्रताड़ित करके प्रसन्न होते हैं। साइकियाट्रिक रूप से इनकी पहचान मेगलोमेनियाक और साईकोपैथ के तौर पर हो सकती है, पर दुनिया का ये घिनौना रूप देखने की बजाय, इन रेंगने वाले निकृष्ट कीड़ों पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय हम सुंदर चीजों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जैसे कि फलदार वृक्ष, पुष्प, बेलें, लताएं, नदियां, झरने, पहाड़ इत्यादि।

झरने में नहाती सुंदर युवतियां जो झरने में आधी डूबी वृक्ष की लताओं को पकड़ कर अठखेलियां कर रही हैं। झरने का ठंडा पानी उनके शरीर पर फिसल रहा है और वो हंस रही हैं। जीवन खुशहाल है। रात में झरने का सफेद पानी चंद्रमा की किरणों से चमकता है। जीवन ऐसा भी होता है पर ये घिनौने सरीसृप जीवन में सौंदर्यबोध रहने ही नहीं देते, जिसके जीवन में भी जाते हैं रह जाता है तो बस भय, और बस भय। कॉमिक्स लिखने वाले, या बाकी शरीफ लोग क्या करें, यही कर सकते हैं कि वो इन निकृष्ट कीड़ों से भय खा कर अपना सौंदर्यबोध खत्म न करें। 
दूध जैसे झरने, रुई जैसी बर्फ से पटे हुए पहाड़, नदी का शांत किनारा जहां नावें चल रही हैं और छत पर बिछे गद्दों पर लेटे हुए चंद्रमा की रोशनी में शरीर को सहलाती हुई ठंडी हवा। ये भी जीवन है। एक ऐसी दुनिया भी है जहां अच्छे लोग बेमौत मारे नहीं जाते। सांपों से बच कर रहने में ही भलाई है, या फिर अगर फिर भी न मानें तो फिर उनका फन कुचल देने में। लेकिन इनके चक्कर में हम अपने जीवन की सुंदरता को क्यों खराब करें? आज भी सुबह की ठंडी ओस में घास पर चलने का मज़ा है, या फिर रेगिस्तान की ठंडी सुबह में हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए उगते हुए सूरज को देखने का। सुंदरता अभी भी बहुत है बस हमें अपनी दुनिया चुननी है।

वर्तमान

वर्तमान में जीने के लिए क्या चाहिये? सबसे पहले तो खुशी। अगर आप वर्तमान में खुश हैं तो आप पुरानी बातें नहीं सोचते। सच हमेशा कड़वा नहीं होता कभी कभी सच सिर्फ सच होता है। इसका मतलब ये नहीं कि सच का हमेशा मूल्य होता है। सच का उतना ही मूल्य होता है जितना व्यक्ति सत्यप्रिय होता है। दुनिया में फरेब सच से कहीं अधिक है और जो सच है कई बार वो मजबूरी के कारण होता है, लेकिन सत्य अंदर से सुख देता है। सत्य से परिचय होने पर भय से लड़ने की शक्ति मिलती है। जो लोग वर्तमान से डरते हैं वो या तो भूतकाल में जीते हैं या फिर भविष्य में। क्योंकि वर्तमान में उन्हें अपने सत्य से या तो भय लगता है या फिर वो उसे पसंद नहीं करते। प्रेम और सत्य, जीवन को सुंदर बनाने के लिए यही आवश्यक हैं परंतु इसका अर्थ ये नहीं कि जो मिले उसे प्रेम करते और सबको अपना सत्य बताते चलें। प्रेम का हकदार व्यक्ति स्वयं आपके अंदर से प्रेम निकाल लेगा और अपना सत्य उसी को बताना चाहिए जो स्वयं सच्चा हो या उस लायक हो।
उस समय की याद करिए जब आप का जीवन आज के मुकाबले काफी सामान्य था, आप अपनी बात का मूल्य रखने के लिए अपने आप को कष्ट देते थे। प्रेम किसी को नंगा नहीं करता, प्रेम ढकता है और बचाता है। अगर आप किसी को नंगा करने को प्रेम का नाम देते हैं तो आपको स्वयं पर विचार करना चाहिए। लेकिन हम जानते हैं कि दुनिया में फरेब है और स्वयं पर विचार करने वाले लोग कम ही हैं। क्या कोई एंड्राइड वाला किसी आई फ़ोन वाली लड़की से प्रेम कर सकता है, शायद, शायद नहीं। प्रेम को परिभाषित आजकल के ज़माने में वही कर सकता है जिसके पास ताकत है। आई फ़ोन वाली लड़की परिभाषित करेगी कि उस एंड्राइड वाले लड़के का प्रेम कितना सच्चा है। 

कभी कभी वर्तमान इतना बोझिल और दुखद हो जाता है कि आप सोचते हैं कि भूत में ऐसी क्या गलती हो गयी। आप बार बार भूत में जाते रहते हैं और सोचते हैं कि आखिर ग़लती कहाँ हुई। ये काम हम कर भी सकते हैं और नहीं भी कर सकते लेकिन अगर हम ये करें तो हमेशा याद रखें कि वर्तमान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है। कभी कभी सत्य सामने रहता है पर दिखता नहीं, क्योंकि हम सत्य मानने को तैयार ही नहीं होते। ये बात हमेशा याद रखिये की सत्यवादी होना और नीतिगत फैसले लेना अलग अलग चीज़ें होती हैं और आप को कोई अपने किस से सच्चा होने के लिए, यहां तक कि स्वयं से भी सच्चा होने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। दुष्टों की दुनिया में नीतिगत फैसले लेने पड़ते हैं और यकीन मानिए भ्रष्टाचार से भरी दुनिया में अच्छा आदमी सच्चा नहीं भी रहता तो कोई खास बात नहीं है अगर उसके फैसले नीतिगत हैं तो। वर्तमान में रहें और अपना भविष्य प्लान करते रहें। वर्तमान में रहने के अलावा अपने भूत से सीखना वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए अच्छा होता है।

खुशी

नदी की कलकल करती धारा के पास बैठ कर चाय की चुस्कियां लेना कितना अच्छा लगता है ना। जीवन में छोटी छोटी खुशियां बहुत मायने रखती हैं जैसे पहाड़ों पर मैगी खाना या फिर कोई सरप्राइज मिलना। हर समय बीते हुए कल की चीरफाड़ करने से क्या मिलेगा? कभी पहाड़ों पर जाइये, कभी नदी के किनारे बैठ कर चाय की चुस्कियां लीजिये। 

कभी कभी नदी का किनारा भी भारी भारी सा लगता है। शाम भी कभी कभी नारंगी की जगह धूसर प्रतीत होती है। नदी के किनारे एक भारीपन, मगर वो भारीपन नदी के किनारे नहीं आपके अंदर होता है। सुबह सुबह चाय की दुकान पर चाय के साथ फेन खाना और चाय की  दुकान पर आए लोगों की बातें सुनना। सरल जीवन अच्छा जीवन है पर कई लोगों को ये पसंद नहीं। 

कभी कभी हम भ्रम में होते हैं और उस भ्रम में या तो ग़लत सोच बना लेते हैं या फिर ग़लत निर्णय कर लेते हैं। दूसरों को पहले और अपने आपको बाद में रखने का कभी कभी ग़लत खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। कभी कभी किन्ही निर्णयों के कारण या भ्रम के कारण जीवन की खुशी जाती रहती है और तब यही उचित है कि हम उन निर्णयों पर विचार करें और छोटी छोटी खुशियों पर ध्यान दें। परिवार के साथ बैठ कर खाना खाना। सर्दियों में परिवार के साथ रजाई में बैठ कर गप्पे मारना, या फिर जिससे प्रेम करते हैं उसके साथ दिल की बातें करना, छोटी छोटी खुशियां मिल के ही व्यक्ति को खुशहाल बनाती हैं। आजकल हम जितना भी टीवी देख लें, या ओटीटी पर वेब सीरीज देख लें, मन फिर भी फीका फीका सा ही रहता है। सोशल मीडिया से जुड़े रहने के बाद भी लोगों के बीच अहम का खेल चलता रहता है। यहीं सोचिये आप मोटरसाइकिल से मनाली जा रहे हों, और वहां पर एक कॉटेज में रुक कर बर्फबारी के बीच आग सेंक रहे हों, या फिर बनारस में घाट पर बैठ कर निम्बू वाली चाय का लुत्फ उठा रहे हों। भ्रम हो या न हो, चाहे जीवन में बहुत अधिक खुशी न हो, छोटी खुशियों का मज़ा हमेशा उठाया जा सकता है। 

चुनाव

ट्रेन में चढ़ते ही वो एक अकेलेपन का एहसास, अपने लोगों के बीच न होना, एहसास होना की आपका परिवार न होता तो आप कैसे होते। ट्रेनों से अधिक शायद ही कोई समाज के बारे में सिखाता हो। ट्रेन में भविष्य के नेता यानी आज के छात्र नेताओं को अपने चमचों के साथ देखना। लोगों का प्रयोग करने का तरीका पहले से ही सीख लेना चाहिए। कितना जानते हैं पता नहीं लेकिन अगर सारा छात्र जीवन लोगों को मैनिपुलेट करने सीखने और करने में निकल जायेगा तो निपुण किस काम में होंगे ज़ाहिर है। 

आप को क्या चाहिए, साहित्य, दर्शन,करने के लिए कार्य और थोड़ा मनोरंजन। जब करने के लिए कार्य न हो तो मनोरंजन भाता नहीं है, और आज के समय में तो हर जगह मनोरंजन ही है। अपने कार्य में निपुणता आवश्यक है। अपने कार्य को हर समय बेहतर करने की कोशिश जारी रहनी चाहिए। प्रेम आवश्यक है, जीवन के लिए भी और कला के लिए भी। जिनको प्रेम नहीं मिलता वो जानवर बन जाते हैं। प्रेम के कई रूप होते हैं और हम उन रूपों के पीछे भागते हैं जो हमें नहीं मिलते। 

सबके इंटरेस्ट अलग अलग होते हैं। छोटे पर आप उंगली पकड़ के किताब की दुकान पर जाते हैं जहाँ नई किताबों की सुगंध आपको मोहित कर देती है। आप को किताब या पत्रिका लेते हैं और लौटते समय जल्दी जल्दी चलते हैं क्योंकि आपसे इंतज़ार नहीं हो रहा उस पत्रिका या किताब को पढ़ने का। ट्रेन में सफर करते समय आप किताबें लेते हैं, अपनी पसंद की किताबें कभी चित्रकथाएं कभी कुछ और। किताबों का शौक एक लत बन गया है, लेकिन ये शायद एक अच्छी लत है। 

आप पत्रिकाओं में असली लोगों की बातें पढ़ते हैं। असली लोग जो दूसरों को ये बताने में शर्माते नहीं कि कभी ट्रेन या बस में किसी ने उनकी मदद की थी। वो लिख के स्तंभों में ये भेजते हैं कि कैसे किसी अनजान मुसाफिर ने उनकी ज़रूरत के समय मदद की। खालिस असली लोग। आप उतने असली नहीं हैं, क्योंकि आप ने अधिक दुनिया देख ली है, आपने गृहशोभा में सुंदर टेबलक्लॉथ के ऊपर पकवान सजाने वाली गृहणियों से अधिक दुनिया देखी है इसलिए आप उतने असली नहीं हैं। आप नकली भी नहीं है लेकिन अपने अनुभवों के आधार पर आप पहाड़ पर एकांत में अपनी मोटरसाईकल के बगल में बैठ कर आलू भूनना चाहते हैं, या फिर किसी पहाड़ी कॉटेज में फायरप्लेस के सामने बैठ कर, एकांत में, कॉफ़ी पीना चाहते हैं, इसलिए क्योंकि आपने पत्रिकाओं के स्तंभों में लेख भेजने वालों से अधिक दुनिया देखी है। 

आप मैनिपुलेट नहीं करना चाहते, इस मामले में आप खालिस असली बनना चाहते हैं। ट्रेनें आज भी आपको सिखाती हैं, ट्रेनों की दुनिया लेकिन पत्रिकाओं की दुनिया से अलग होती हैं। ट्रेनें कभी कभी वीभत्स होती हैं। लेकिन हम सब जानते हैं कि ट्रेनें कभी कभी वीभत्स इसलिए होती हैं क्योंकि हम वीभत्स हैं, मानवता वीभत्स है। आपको नेता शब्द का मतलब मालूम है, नेता, जो चुना जाए और लोगों की भलाई के लिए काम करे, उन्हें मैनिपुलेट न करे। इसलिए आप मोटरसाइकिल चुनते हैं, और साथ में साहित्य और दर्शन। वीभत्सता के इस खेल में आप का कोई काम नहीं। 

रुकावट

लोग अलग अलग तरीके से सोचते हैं। सबके अलग अलग विचार होते हैं और सब लोग अलग अलग तरीके से विचारों पर अमल करते हैं। आपने एक विचार को इतनी जोर से पकड़ लिया कि उसने आपको ही रोक लिया। उस रुकावट से उबरने के लिए आपने हर जद्दोजहद की, हर तरीका अपनाया पर आप उबर नहीं पाए। क्योंकि तरीके सही नहीं थे और आपके अंदर भी एक छोटी से ज़िद थी। कुछ सालों पहले तक विचार खुशनुमा थे। आपको पहाड़ पर बैठ कर आलू भूनते हुए, धुंध के बीच मोटरसायकिल चलाते हुए जीना पसंद था। आपके जीवन ने और कोई मोड़ नहीं लिया होता तो आप शायद यही करते। कितनी सहज ज़िन्दगी थी।
हर विचार की अपनी एक फ्रीक्वेंसी होती है, हर भाव की अपनी एक फ्रीक्वेंसी होती है। आप के साथ ग़लत होता है तो आप उसे अपने किये की सज़ा मानते हैं, अच्छे लोग यही सोचते हैं। लेकिन कभी कभी जो गलत आपके साथ होता है वो सज़ा नहीं यातना होती है, जो क्रूर लोग आपको दे रहे होते हैं। सोच के देखिये क्रूर लोगों को यातना देने के लिए क्या कारण चाहिए होगा? इतना ही काफी है कि वो क्रूर हैं। आप ऐसे काम करना चाहते हैं जो आपको खुशी दें। आप चाहते हैं कि आप पहाड़ों पर बैठ कर आलू भूनते हुए लोगों से बातें करें। वो फीलिंग स्टेट पाएं जो आप पाना चाहते हैं। पहाड़ों पर मोटरसाइकिल से जाने वाले किस्म के लोगों से कौन जलता होगा, या तो वो जो घटिया है या फिर वो जो वो सच कभी पा नहीं सकते। आपको जैसे आप सच में हैं वैसे कौन समझ सकता है? अगर आप सोचते हैं कि कोई नहीं तो फिर से सोचिये क्योंकि दुनिया बहुत बड़ी है। 

बेवकूफाना हरकतें करने वालों के बारे में क्या कहा जा सकता है, अगर उनके पास साधन हैं और आपके पास नहीं। आपने तो पहले ही सोच लिया था कि आपको क्या करना है। कभी कभी आपको निराशा हुई, आपको लगा आप कभी नहीं उबर पाएंगे लेकिन आप उबर गए। बेशर्म लोगों के बीच शर्मीला होना दुख दे सकता है। कई बार आप बहुत कुछ सहने के बाद भी चुप रह गए क्योंकि परेशानी आपकी थी। शांति से रहने की सोच, अपने अनुभवों से कला बनाने की सोच, अच्छे आदमी ऐसे ही सोचते हैं। 
रिश्तों के बारे में सोचना और रिश्ते न मिल पाने के बाद अवसाद होना। रिश्ते तो फिर भी मिले, फिर अवसाद किस बात का। शायद ठंडे मौसम की बारिश में कार में न घूम पाने का, लेकिन वो सब भी तो किया बस अपने पसंद के किसी खास इंसान के साथ नहीं। जो मिला उसमें गुज़ारा कर लिया, जितना मिला उसमें गुज़ारा कर लिया। अपने आप को साधने के लिए आपने कम से कम में गुज़ारा किया पर वो रुकावटों का क्या वो तो आती रहेंगी और उनसे निबटने के किये नई नई युक्तियाँ निकालनी ही पड़ेंगी। 

गुमनामी

 समाज बेहद ज़रूरी होता है। आप हमेशा से समाज का हिस्सा बनना चाहते थे। जिस समाज में जाएं वहां का हिस्सा बनने की कोशिश। इंसानों के तौर पर हमारी सुरक्षा सामाजिक होने पर ही है इसके नुकसान भी हैं पर ये नुकसान तब कम हो जाते हैं जब आप सामाजिक नियमों का पालन करें। समाज का हिस्सा न बन पाने के कारण जो दुख होता है उसको शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है। असामाजिक और सामाजिक न होने में अंतर है। कभी कभी सामाजिक होने के बावजूद आप बहुत सामाजिक नहीं रह पाते क्योंकि आप स्वयं को समाज से दूर कर लेते हैं लेकिन अगर उस खाली समय का आपने अपना कौशल बढ़ाने में प्रयोग किया है तो वो समय बेकार नहीं जाता। आप हमेशा उनको धन्यवाद देते हैं जिन्होंने आपका मुश्किल वक्त में जाने अनजाने साथ दिया। भय के कारण अवेयरनेस आ जाती है। कभी कभी भय के कारण व्यक्ति उग्र भी हो जाता है और कभी कभी उस उग्रता का प्रयोग कला के लिए होता है। कुछ कलाएं असामाजिक होती हैं, या फिर कुछ कलाएं समाज की ऐसी चीजों का उपहास करती हैं जो उपहास उड़ाने के योग्य हैं। आपको ये सब नहीं करना था, आपके लिए कला बस अपनी उग्रता व्यक्त करने का माध्यम था। जब अधिक अवेयर हो जाते हैं तो समाज की त्रुटियां देख कर क्रोध आना लाज़िमी है। 

अकेलापन बहुत कुछ सिखाता है। लोगों से मिलने जुलने की बजाय आप दुनिया के बारे में और जानने में समय लगाते हैं, ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। अलग अलग समाजों के नियमों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। वो भी एक तरीका है अपना जीवन जीने का। एडिसन ने बल्ब बना कर ख्याति और सफलता अर्जित कर ली और टेस्ला ने इतने आविष्कार कर के भी अकेले रहे और अंत में अकेले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। कारण सामाजिकता ही है। आज के समय की खास बात ये है कि आज हम इतने अधिक जुड़े हुए हैं कि कहीं न कहीं समाज मिल ही जाता है। कहीं नहीं तो इंटरनेट पर अपने जैसे लोग दिख ही जाते हैं और दिल को दिलासा मिलती है कि हम अकेले नहीं हैं। 

जो लोग अपनी अच्छाई का फायदा नहीं उठवाना चाहते वो अकेलापन चुनते हैं। उन्हें घटिया लोगों द्वारा परेशान किया जाना पसंद नहीं। कभी कभी लोग आपसे बातें चुरा कर आपको ही बताते हैं। परेशान करने वाली बात है खासकर कलाकारों के लिए। असली कलाकार प्रभावित होते हैं, चुराते नहीं। लेकिन आजकल चुराने का चलन काफी हो गया है। असली कलाकारों से चोरी कर के लोग अमीर होते जाते हैं और असली कलाकार गुमनामी की मौत मर जाते हैं। ये चेहरा भी समाज का है। ये सब होते हुए भी समाज के खुशनुमा चेहरे भी हैं, जैसे लोगों के इकट्ठा होने और जश्न मनाने के समय की खुशी। आग के इर्दगिर्द बैठ कर गिटार पर गाने सुनते हुए, कुछ खाते हुए पर्वत की ठंडी हवा का आनंद लेना। ये समाज के खुशनुमा चेहरे हैं। समाज के बदनुमा चेहरे को देख कर हतोत्साहित होने की जगह खुशनुमा चेहरे पर फोकस किया जा सकता है। पहाड़ों की यात्रा की जा सकती है, अपने जैसे लोगों को देख कर खुश हुआ जा सकता है और लोगों की मदद की जा सकती है। आज के ज़माने की खास बात ये है कि आज के ज़माने में टेस्ला गुमनामी की मौत नहीं मरा करते, उनके नाम की महंगी इलेक्ट्रिक कार्स होती हैं।  

छुपा

कितना डर लगता है ना अगर आपने कोई बात छुपा के रखी हो और कोई और उसे जान ले। कोई बात छुपाने का कारण क्या है? आप सोचते हैं समय बीतेगा और सब ठीक हो जाएगा। आप सोचते हैं कि जब सबकुछ ठीक हो जाएगा तब आप अपनी परफॉरमेंस देंगे। आप को अपनी पीक परफॉरमेंस देने के लिए अच्छा माहौल चाहिए। हर चीज़ में आप यही सोचते हैं। आप समाज के लिए भी यही सोचते हैं। आखिर विज्ञान में मनुष्य को सामाजिक जानवर ही तो मानते हैं। आपको अवेयरनेस है। क्या वो व्यक्ति जिसे दूसरों से ज़्यादा अवेयरनेस है वो उनसे मेल मिलाप रख के उनको धोखा दे रहा है? क्या उसे खुश रहने का भी अधिकार नहीं है? क्या वो मस्ती और मज़ा भी नहीं कर सकता खासकर तब जब उसे जीवन में वो सब अधिक न मिला हो या फिर मिलने के बाद भी वो उसका आनंद न ले पाया हो। बहुत अधिक सेलेक्टिव होना घातक है पर रिजेक्ट करना और भी घातक है। अच्छा इंसान दूसरों को दुख नहीं देता, खुद को देता है। बिना कुछ किए कोई पचड़े में पड़ जाए तो वो क्या करे? अगर कोई आपके सारे राज़ जान जाए, वो राज़ जो सिर्फ आपके लिए बड़ी बात हैं, वो भी अब नहीं, अब तो ये लगता है कि क्या वो आप ही थे जिसने इस बात को राज़ ही रहने दिया। कॉमेडी करने वाले को बंदर समझने वाले लोग, कवियों को बेवकूफ समझने वाले लोग, क्या इनको शासन करने का अधिकार है? 

क्या कोई पृथ्वीराज के समय में चंदवरदाई का उपहास कर सकता था। 'जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि' में अधिकतर व्यंग्य छिपा होता है। सबके जीवन में कोई न कोई दुख है। कला दो प्रकार की होती है, एक होता है कौशल, और एक कला ऐसी होती है जिसमें व्यक्ति के पास कला के अलावा और कोई चारा नहीं होता। अपनी राज़ की बातें वो कला के माध्यम से बताता है क्योंकि सामाजिक बंदिशों की वजह से वो दूसरों से वो बात नहीं बता सकता। 
आपके जीवन में संघर्ष काफी रहा है। आपके लिए दूसरों के ओपीनियंस मायने रखते हैं क्योंकि आप जन्म से ही डेमोक्रेटिक हैं। आप खाने का बराबर बंटवारा करते हैं और अगर कोई अधिक खाता है तो उसे अपना हिस्सा दे देते हैं। अगर जो निर्णय करते हैं वो धन के इतने भूखे हो जाएं कि उनमें निर्णय करने की क्षमता भी न बचे, और वो सीधे हिंसा पर उतर जाएं तो भगवान ही समाज का मालिक है। 

बस छोटा सा ही डर था और कोई डर नहीं। अच्छे व्यक्ति को नीति से अपने आपकी सुरक्षा करने का कभी पश्चाताप नहीं होना चाहिए खासकर जानवरों से। जानवरों में नीति नहीं होती, नीति मानवों का का ट्रेट है। जब तक मानव सोशल एनिमल्स से घिरा रहेगा नीति और युक्ति का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा। बातें छुपाना नीति का ही एक अंग है, अगर वो दूसरों को पता चल जाएं, ऐसी कोई खास बात जिससे आपकी सामाजिक बेइस्ती हो जाये तो ये बात याद रखियेगा की स्वयं की नज़र की इज़्ज़त सबसे अधिक मायने रखती है, और सिगरेट पीने से बेइस्ती हर जगह नहीं हुआ करती।

डर

आपकी यादें कहीं किन्हीं कोनों में सहेजी हुई हैं। जो हुआ वो समय के पन्नों में कहीं सहेज कर रखा हुआ है। सब के पास अच्छी यादें नहीं होतीं और अगर आपके पास है तो आप शुक्र मनाइये। आप देवी देवताओं को बस एनर्जी स्टेट्स मानते हैं। हर देवी देवता एक पर्टिकुलर स्टेट की वाइब्रेशन है। आपको लगता है मूर्तिपूजा आवश्यक नहीं है परंतु कभी कभी आवश्यक हो जाती है। आपको पहाड़ों के चर्च पसंद हैं वो आपको रस्किन बांड की कहानियों की याद दिलाते हैं। आपको स्तूप भी पसंद हैं वो आपको शांति की अनुभूति कराते हैं। आपके कॉन्सेप्ट्स इवोल्वड हैं ऐसा आप मानते हैं और अगले ही दिन कोई केसरिया गमछे वाला या जालीदार टोपी वाला आप को गोली मार के चला जाता है। जीवन ऐसा ही है और ये समझने में और अपनाने में आपको समय लगता है।

आपको स्टीफेन किंग और काफ्का पसंद है। आपके जीवन के काफकेश होने के बाद भी। आपको ऐसा लगता है कि आप स्टीफेन किंग के किसी नावेल में कैद हैं लेकिन फिर भी आपको कोई शिकायत नहीं, क्योंकि अब तक आप समझ चुके हैं कि दुनिया ऐसी ही है। आप दूसरों को खुश देख कर खुश होते हैं। आप दूसरों को प्यार में पड़े देख कर खुश होते हैं और उस प्यार में गहराई हो तो और खुश होते हैं। आपके जीवन के काफकेश मोड़ लेने के पहले भी तो आपका कोई जीवन था। आप अच्छे थे आपने सारी सावधानियां भी बरती लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है, वही टाल सकता है जो विधि लिखता है। विधि कौन लिखता है, अब आपको लगता है वो भगवान नहीं है, शायद यमराज का कोई चेला है। 

जीवन अब ऐसा है जैसे आपके फ़ोन की लाइन कोई और सुन रहा हो और जब आप चुप हों तो आपकी आवाज में दूसरों से बात कर रहा हो। भारतीय धार्मिक साहित्य काफी विनम्र है, उसमें राक्षसों के बारे में पढ़ कर ऐसा नहीं लगता कि वो सच में राक्षस हैं। इसलिए आप राक्षसों की जगह डीमन शब्द का इस्तेमाल करते हैं। पुरातन भारत की विनम्रता का फायदा आजतक उठाया जा रहा है लेकिन समय का चक्र तो चलता ही रहता है, जैसे भी चले। अंग्रेज़ और मुग़ल चले गए और अपने बच्चे छोड़ गए। कभी कभी रॉक म्यूजिक सुनने की वजह से आपको भी अंग्रेज़ का बच्चा समझ लिया जाता है, या फिर वैदिक निरंकार परमेश्वर में मानने के कारण और शायरी लिखने के कारण मुग़ल का। आप बुरा नहीं मानते। आपके पास यादें कम है पर आपको पता है कि वो जहां भी हैं सुरक्षित हैं। जैसा होना था वैसा तो होना ही था इसके बारे में कोई क्या कर सकता है, कभी कभी विधि लिखने वालों के हाथ से विधि निकल जाती है तो विधि के विधान को सच करने के लिए भौतिक उपकरणों का सहारा लेना पड़ता है। 

आपको अपने ईश्वर में मानने के लिए रुद्राक्ष पहनने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए पर ये सब तो काफी दिनों से होता चला आ रहा है। आप यग्योपवीत करवाना चाहते थे लेकिन आप पुणेकर बन गए। रुद्राक्ष में आप अब भी विश्वास करते हैं पर वैसे नहीं जैसे रुद्राक्ष बेचने वाली दुकानें करवाती हैं। सुबह की अज़ान उस समय अधिक अच्छी लगती थी जब भारत और पाकिस्तान एक थे। एक अलग संस्कृति को अपनाना आप जानते हैं लेकिन अपनी संस्कृति से समझौता किये बिना। आपको लगता है तरीका यही होना चाहिए। अपने आपको खुश रखने के लिए आपके पास यादें हैं, ढेर सारी यादें जो हमेशा आपके पास भले ही न रहें पर आपको पता है कि आपके पास हैं। आप लवक्राफ्ट पढ़ते हैं, वो आपको पसंद है लेकिन लवक्राफ्टियन हॉरर सबके बस का खेल नहीं। एक व्यक्ति को पहाड़ी कॉटेज और लवक्राफ्टियन हॉरर दोनों कैसे पसंद हो सकता है, आपको पसंद है। आपको डरना पसंद है, बशर्ते डराने वाले कि नीयत सही हो, और आपको पता है काफ्का, स्टीफेन किंग और लवक्राफ्ट इन तीनों में नीयत की कोई दिक्कत नहीं। और कभी कभी लगता है देवी देवताओं की तरह डीमन्स भी एक एनर्जी स्टेट हैं।

रोशनी

हर मुश्किल से निकलने का रास्ता अवश्य होता है, कभी कभी वो रास्ता कठिन अवश्य हो सकता है पर होता अवश्य है। शौक बड़ी चीज है, और आदत कभी कभी मजबूरी होती है। खाने के बाद सिगरेट पीना शौक है या आदत इसका पता नहीं लेकिन जितना आनंद आता है, लगता तो शौक ही है। हर समय सिगरेट पीना आदत है, और सामाजिक और स्वास्थ्य के लिहाज से बुरी आदत है। अकेले होना कोई दुर्भाग्य नहीं कभी कभी ये अपने में ही एक वरदान साबित हो सकता है। आपको किसी की झूठी प्रशंसा नहीं करनी होती, जो काम आपको ग़लत लगता है उसमें साथ नही देना होता। अकेलेपन के नुकसान हैं तो फायदे भी हैं। कोई व्यक्ति ग़लत रास्ते पर जा रहा हो तो उस चेता देना ही उचित होता है, खासकर जब वो आपका मित्र हो। कभी कभी ज़िन्दगी का तमाशा बन जाता है और कभी कभी ज़िन्दगी का तमाशा बना दिया जाता है। किसी की ज़िंदगी का तमाशा बनाना एक क्रूरता है पर ऐसा करने वाले लोग कम नहीं हैं। सुरक्षित जगहों पर बैठ कर जाने वाली रेलगाड़ियों पर पत्थर मारना बिगड़े हुए भारतीय बच्चों को बखूबी आता है। इसमें गलती किसकी है कि उन्हें शिष्टाचार नहीं सिखाया गया। 

कभी कभी आपको कोई रास्ता नहीं दिखता। इसलिए नहीं कि कोई रास्ता नहीं है बल्कि इसलिए कि आपको नही दिख रहा। आपको किस चीज़ से डर लग रहा है? इससे की लोगों को आपके दिल में गहरी छुपी बातें पता चल जाएंगी या आपकी हीनभावना के बारे में पता चल जाएगा? क्या आपमें हीनभावना है और अगर है तो किस बारे में है। क्या आपकी हीनभावना का जन्म इस विचार से होता है कि आप दूसरों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाएंगे? ये तो हीनभावना नहीं। फिर ये क्या है, अपनी शान की चिंता या फिर समाज को वापस न दे पाने दुख, या फिर शायद दोनों। आप डरते हैं कि लोग आपको गलत न समझें और आप हर काम एक आदर्श बालक या बालिका की तरह करते हैं या फिर करना चाहते हैं। आप ये भूल जाते हैं कि हर जगह सामाजिक नियम अलग अलग होते हैं और फिर आपको एहसास होता है कि चाहे आप खाने के बाद सिगरेट पियें, आपको एक बार देखने वाले आपको जैसे कि आप सच में है, उस तरह से देखने की बजाय एक सिगरेट पीने वाले के तौर पर देखेंगे। 

आपको अच्छाई पर भरोसा है, आप चाहते हैं दुनिया अच्छी रहे दुनिया में लोग अच्छे रहें। अगर बुरे भी बने तब भी रोबिनहुड की तरह बुरे बनें। आपने काफी दिनों से बारिश महसूस नहीं की, आपको बारिश अच्छी लगती है, जब आकाश में बादल आतें है और आप अपने आंगन में लगे करोंदे के पेड़ के रंग देखते हैं। किसी गठिया रोग से पीड़ित व्यक्ति से बारिश का हाल पूछिये जब उसके अंग अंग में दर्द होता है। क्या पता दर्द के बावजूद उसे बारिश अच्छी लगती हो। गुड़गांव में मज़े के लिए गांजा पीते युवक और अपने दर्द को कम करने के लिए आयुर्वेदिक रूप से गांजा पीते युवक में कितना फर्क है और क्या कोई ये फर्क समझना चाहता है? 

आप जिसे प्रेम करते हैं उसे आपसे अच्छा कोई मिल जाये तो ये खुश होने की बात है या दुखी होने की? आप अपने अंधेरे के साथ ही खुश हैं आपको रात पसंद हैं बस चमकीले पीली रोशनी वाले बल्ब होने चाहिएं। इसका मतलब है आपको अंधेरे में भी रोशनी पसंद है, दिन तो रोज़ होता ही है। आपको रोशनी करने के पुराने तरीके पसंद हैं, जैसे कि मोमबत्तियां, कैंडललाइट डिनर का अपना मज़ा होता है, बस वो लोग मज़ा बिगाड़ देते हैं जो सोचते हैं कि आप कैंडललाइट डिनर करने के लायक नहीं हैं, आप तब भी बुरा नहीं मानते और आप एक लालटेन या फिर वो नहीं तो एक ढिबरी जला लेते हैं क्योंकि आप को वो भी पसंद है।  

तमन्ना

पुरानी यादें खुश कर देती हैं। ये बड़े हो कर पता चला कि सबके पास खुशनुमा यादें नहीं होतीं। कला एक खिड़की या झरोखा है जो हमें दूसरों की दिल और दिमाग या किसी समय के बारे झलक देता है जैसे मेरा ये लेख आपको मेरे बारे में बता रहा है। कभी कभी यादों की भी ज़रूरत महसूस नहीं होती कल्पनाशीलता ही काफी होती है। बारिश के समय हरे भरे बागीचे में नाचते मोर या फिर बारिश के दिनों में ठंडी हवाओं के बीच घर के बरामदे में रेडियो पर गाने सुनते हुए पकौड़े खाना, ये सब छोटी खुशियां है पर बड़े शहरों की भीड़भाड़ में ये छोटी खुशियां तमन्नाएं बन कर ही रह जाती हैं। 

पुराने बड़े महलों को देख कर खयाल आते हैं कि आप के राजसी ठाठ होते तो क्या होता। आप ये भूल जाते हैं हैं कि राजसी ठाठ के साथ राजसी खतरे भी आते हैं, ज़िम्मेदारियाँ भी आती हैं। लेकिन महलों में आप घूमने आए हैं, अपनी ज़िम्मेदारियों से कुछ दिन की छुट्टी ले कर। राजस्थान में महल हैं, हिमाचल में पहाड़ और आप वहां जा कर कुछ भी सोच सकते हैं, अपनी जिम्मेदारियों से थोड़े दिनों की फुरसत ले कर आप कुछ भी बन सकते हैं। केरल के फाइव स्टार होटल में छुट्टियों में आप वो बन सकते हैं जो आप घर पर नहीं है। केरल की हाउसबोट में किनारे से दूर आप को अपने अंदर ही किसी और को पाते हैं जिससे आप पहले कभी नहीं मिले। कल्पनाएं ऐसी ही चीज़ हैं, ये आपको वो बनाने में सक्षम हैं जो आप कभी सोच भी नहीं सकते। 

किसी के फटे में टांग अड़ाने वालों की संख्या मदद करने वालों से कहीं ज़्यादा लगती है। आप कल्पनालोक में रह सकते हैं बशर्ते आपको रहने दिया जाए। वास्तविकता का आभास कभी कभी एक तूफान की तरह आता है और आपके सारे विश्वास की धज्जियां उड़ा देता है। विश्वास एक मुद्रा की तरह है, कभी कभी विश्वास के लिए कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती और वो विश्वास घातक भी साबित हो सकता है, आपके लिए नहीं तो फिर किसी और के लिए। आप चुपचाप अपने घर में लेटे हैं और आपके आसपास सब कुछ हो रहा है। किसी को घर बैठे शैतान बनाया जा सकता है। आप अपनी समझ से सबसे अच्छा निर्णय लेते हैं और वो निर्णय एक महामारी की तरह फैलता दिखता है, वो भी उस व्यक्ति द्वारा जो एक छोटा निर्णय भी बिना सोचे नहीं लेता, या जो अपनी आत्मरक्षा भी नहीं कर सकता। आप ऐसा नहीं कर सकते, सोच अवश्य सकते हैं और सोचने से चीज़ें होती तो अभी तक आप पता नहीं कहां होते। आपकी बेइज़्ज़ती नहीं होती, इसलिए नहीं कि आप बेशर्म हैं, इसलिए क्योंकि आप बेशर्मी और दबंगई की सीमाएं देख चुके हैं। इसलिए भी की किस्मत से आपने ऐसा कोई ग़लत काम भी नहीं किया जिससे आपको शर्मिंदा होना पड़े। जिससे प्रेम किया उसका भला करने की कोशिश की, जिससे प्रेम किया उससे सच्चा प्रेम किया। 

आपने बस अपने जैसे लोग ढूंढने की कोशिश की। कुछ गलतियां हुईं पर जब विपरीत परिस्थितियां हों तो अपने आप को माफ कर देना ही उचित है। एक समाज ढूंढने की कोशिश, आप समाज के लायक न हों तो आप उस समाज में नहीं जाएंगे लेकिन तब क्या जब वो समाज ही आपके लायक न हो?

सही फैसले लेना बहुत ज़रूरी है, और साथ ही ज़रूरी है तमन्नाएं पूरी करना, जो तमन्नाएं पूरी नहीं होतीं वो आपको सताती हैं। कभी कभी पहाड़ों या रेगिस्तानों का सफर कर लेना चाहिए। कभी कभी वो बन के देखना चाहिए जो आप नहीं हैं। कभी कभी अपनी सच्चाई भूल के देखना चाहिए। कभी कभी बारिशों में रेडियो पर गाने सुनते हुये पकौड़े खाने चाहिए। अपने आपको खुश रखना ज़रूरी है, दूसरों को खुश तो आप खुद दुखी रह के भी रख सकते हैं पर कभी कभी जब परिस्थितियां विपरीत हों तो अपनी खुशी के मायने बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं।

कोशिश

छत पर ठंडी हवाओं के बीच आसमान में तारों को देखना। तारे कितनी दूर हैं ना। ये सोचना की तारे तो बस जलती हुई गैस हैं, हमसे मीलों दूर और हमारा सूरज भी तो एक तारा है। ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में सोचना या फिर सोचना समुन्दर की गहराइयों के बारे में। पिछले ज़माने मे लोग कितने किस्मतवाले थे। उस समय आज के मुकाबले रहस्य कितने अधिक थे, नए द्वीप खोजे जा सकते थे, और उन नए द्वीपों पर नए पौधे, नए जानवर, अब तो पृथ्वी के बारे में अधिकतर चीज़ें पता हैं। आधुनिकता ने अलग थलग लोगों को भी आपस में मिला दिया है। 

रहस्य अभी भी हैं पर अब उतना मज़ा नहीं आता क्योंकि सारी जानकारी उंगलियों पर है। किताबों में रहस्यमयी जंगलों के बारे में कहानी पढ़ना, रहस्यमयी द्वीप के खोजकर्ताओं के बारे में पढ़ना, कितना मज़ा आता था पहले। रहस्य खत्म तो मज़ा खत्म, ऐसा लगता है। अभी भी काफी रहस्य बाकी हैं पर पहले के मुकाबले कम हैं। पृथ्वी लोगों से और उनके लालच से दूषित हो गयी है। शुरू में ज्ञान बांटने के लिए हुआ और फिर उसे बेचा जाने लगा। कमज़ोर अन्तःकरण वाले ज्ञान से दूषित हो गए और ज्ञान का इस्तेमाल ताकत और धन कमाने में करने लगे जो कि गलत नहीं है पर तब हो जाता है जब उससे दूसरों का जीवन बर्बाद होने लगे। ज्ञान विवेक बढ़ाने के लिए होता है, लेकिन आजकल जब ज्ञान उँगलियों पर है तो अधिकतर वो लोगों को भ्रष्ट बना रहा है। गिनेचुने लोग जो भ्रष्ट नहीं हुए हैं वो कोशिश कर रहे हैं, अपने ज्ञान से पृथ्वी को और सुंदर बनाने में पर अभी तो भ्रष्ट लोगों का पलड़ा भारी नज़र आ रहा है। 

जानने की उत्सुकता ज़रूरी है। किसी भी चीज़ के बारे में मन बना लेने से हमारी उत्सुकता पर फर्क पड़ता है। सुंदरता खोजने की जगह, शांति खोजने की जगह लोग ताकत पाने के लिए लड़ रहे हैं, और जहां तक इतिहास बताता है ताकत मिलने के बाद बहुत कम ही लोग हैं जो उसका सही इस्तेमाल करते हैं। 
पृथ्वी उन चुनिंदा लोगों पर निर्भर है जो अभी भी सुंदरता और शांति के लिए लड़ रहे हैं। प्रदूषण से मुक्ति के लिए, पेड़ लगाने के लिए और ऐसे कई काम करने के लिए। कुछ को इको-टेररिस्ट का दर्जा मिला हुआ है क्योंकि शुरुआत तो उन्होंने सही की थी लेकिन दुनिया में फैले प्रदूषण और भ्रष्टाचार को देख कर उन्होंने उग्र रूप धारण कर लिया। सबके हाथों में यंत्र है जो उन्हें दुनिया से जोड़ता है और सबके पास व्यक्त करने के लिए कुछ न कुछ है। तकनीक का सही उपयोग होता तो दुनिया आज पहले से कहीं सुंदर हो सकती थी, आज पृथ्वी के बारे में रहस्य कम हैं पर आज के जितनी जुड़ी हुई दुनिया कभी नहीं रही, लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, इसलिए पहाड़ों पर आपको पॉलिथीन की थैलियां बिखरी मिलती है। उम्मीद है वो कुछ लोग हमेशा रहेंगे जिनकी वजह से दुनिया सुंदर रहती है। वो कुछ लोग जिन्हें उगता और डूबता सूरज पसंद है, वो लोग जिन्हें जंगलों के रहस्य पसंद हैं, वो लोग जिन्हें पता है कि दुनिया और सुंदर हो सकती है, और ये भी उम्मीद है कि वो लोग कोशिश करना कभी नहीं छोड़ेंगे।

एक आसमानी रंग की वैन

खुद को समझाना कितना मुश्किल होता है ना। कई लोग खुद को समझाने की जगह दूसरों को समझाने या फिर क्रांति लाने चल पड़ते हैं। काली स्याह रातों में बैठ कर दूसरों के अनुभवों के बारे में सोचना। ये सोचना की अगर आपके जीवन ने कोई और मोड़ लिया होता तो फिर क्या होता। आपके सपने पूरे हो गए होते। फिर कुछ घटनाएं होती हैं और आपको पता चलता है कि अगर जीवन ने कोई और मोड़ भी लिया होता तो आपके सपने पूरे नहीं होते, और ये जान कर एक सुकून सा मिलता है।

जब घबराहट होती है तो मन भगवान की तरफ भागता है। लेकिन आप आसपास की दुनिया तो देखिए। अखबार ही पढ़ लीजिये। क्या अखबार पढ़ कर आपको लगता है कि भगवान है? फिर आपको लगता है कि भगवान का आविष्कार व्याकुल मन को दिलासा देने के लिए हुआ है। फिर भी जब आप रोज सूरज को उगता और डूबता देखते हैं, बारिश की ठंडी फुहारों को याद करते हैं, रात की शीतल चांदनी को महसूस करते हैं, अनगिनत तारों को देखते हैं तो खयाल आता है हो न हो भगवान अवश्य है। उनकी सृष्टि को शैतानों ने खराब कर रखा है और कई बार वो शैतान इंसानी रूप में होते हैं।

प्रकृति भी अजीब है, कभी आपने शेर को हिरण का शिकार करते देखा है? या फिर किसी मगरमच्छ को किसी शिकार को पानी में खींच कर दम घोंट कर मारते। टीवी पर ये सब अक्सर दिख जाता है और आप सोचते हैं कि भोले भाले घास फूस खाने वाले हिरण ने किसी का क्या बिगाड़ा था, जो शेर या मगरमच्छ का निवाला बन गया। प्रकृति भगवान ने बनाई, सुंदर सुगंधित फूल भगवान ने बनाये और फिर उन्होंने छिपकलियां, सांप और मच्छर बनाये। कितना अजीब है ना ये सब, और आपको इंसानी मामलों से ही फुरसत नहीं मिलती।  

आपको छिपकलियां पसंद नहीं, सांप भी नहीं। आप बस सुगंधित फूलों के बीच रहना चाहते हैं। घने देवदार के पेड़ों के बीच एक कॉटेज चाहते हैं जहां आप एक फायरप्लेस के सामने बैठ कर कॉफी पीते हुए अपने मन का कुछ करना चाहते हैं। फिर आपको याद आता है कि दुनिया में किसी के सपनों में टाँग अड़ाने वाले लोग बहुत है। जब सपनों में टाँग अड़ जाती है तो फिर भगवान याद आते हैं। हर जगह जहां खूबसूरत कॉटेजेस बन सकते थे वहां मंदिर हैं क्योंकि सपनों में अड़ती हुई टाँग ऊपर से आ रही है या नीचे से ये पता नहीं। अब आप कॉटेजेस के सपने नहीं देखते, आप के लिए अब नीले आसमानी रंग की वैन बहुत है जिससे आप भगवान की बनाई दुनिया घूम सकते हैं। मंदिरों मे मानें या न मानें बादलों, वर्षा और घास पर गिरी हुई ओस की बूंदों को देख कर भगवान, या भगवान न सही, दुनिया को चलाती एक अदृश्य शक्ति पर विश्वास ज़रूर होता है।

उफान

सपने टूटते हैं  तो दिल टूट जाता है, दर्द का दरिया उमड़ता है कभी, कभी गुस्से का उफान, खालीपन सा घर कर लेता है  सीने में और फिर हम फिर उस खालीप...