ट्रेन में चढ़ते ही वो एक अकेलेपन का एहसास, अपने लोगों के बीच न होना, एहसास होना की आपका परिवार न होता तो आप कैसे होते। ट्रेनों से अधिक शायद ही कोई समाज के बारे में सिखाता हो। ट्रेन में भविष्य के नेता यानी आज के छात्र नेताओं को अपने चमचों के साथ देखना। लोगों का प्रयोग करने का तरीका पहले से ही सीख लेना चाहिए। कितना जानते हैं पता नहीं लेकिन अगर सारा छात्र जीवन लोगों को मैनिपुलेट करने सीखने और करने में निकल जायेगा तो निपुण किस काम में होंगे ज़ाहिर है।
आप को क्या चाहिए, साहित्य, दर्शन,करने के लिए कार्य और थोड़ा मनोरंजन। जब करने के लिए कार्य न हो तो मनोरंजन भाता नहीं है, और आज के समय में तो हर जगह मनोरंजन ही है। अपने कार्य में निपुणता आवश्यक है। अपने कार्य को हर समय बेहतर करने की कोशिश जारी रहनी चाहिए। प्रेम आवश्यक है, जीवन के लिए भी और कला के लिए भी। जिनको प्रेम नहीं मिलता वो जानवर बन जाते हैं। प्रेम के कई रूप होते हैं और हम उन रूपों के पीछे भागते हैं जो हमें नहीं मिलते।
सबके इंटरेस्ट अलग अलग होते हैं। छोटे पर आप उंगली पकड़ के किताब की दुकान पर जाते हैं जहाँ नई किताबों की सुगंध आपको मोहित कर देती है। आप को किताब या पत्रिका लेते हैं और लौटते समय जल्दी जल्दी चलते हैं क्योंकि आपसे इंतज़ार नहीं हो रहा उस पत्रिका या किताब को पढ़ने का। ट्रेन में सफर करते समय आप किताबें लेते हैं, अपनी पसंद की किताबें कभी चित्रकथाएं कभी कुछ और। किताबों का शौक एक लत बन गया है, लेकिन ये शायद एक अच्छी लत है।
आप पत्रिकाओं में असली लोगों की बातें पढ़ते हैं। असली लोग जो दूसरों को ये बताने में शर्माते नहीं कि कभी ट्रेन या बस में किसी ने उनकी मदद की थी। वो लिख के स्तंभों में ये भेजते हैं कि कैसे किसी अनजान मुसाफिर ने उनकी ज़रूरत के समय मदद की। खालिस असली लोग। आप उतने असली नहीं हैं, क्योंकि आप ने अधिक दुनिया देख ली है, आपने गृहशोभा में सुंदर टेबलक्लॉथ के ऊपर पकवान सजाने वाली गृहणियों से अधिक दुनिया देखी है इसलिए आप उतने असली नहीं हैं। आप नकली भी नहीं है लेकिन अपने अनुभवों के आधार पर आप पहाड़ पर एकांत में अपनी मोटरसाईकल के बगल में बैठ कर आलू भूनना चाहते हैं, या फिर किसी पहाड़ी कॉटेज में फायरप्लेस के सामने बैठ कर, एकांत में, कॉफ़ी पीना चाहते हैं, इसलिए क्योंकि आपने पत्रिकाओं के स्तंभों में लेख भेजने वालों से अधिक दुनिया देखी है।
आप मैनिपुलेट नहीं करना चाहते, इस मामले में आप खालिस असली बनना चाहते हैं। ट्रेनें आज भी आपको सिखाती हैं, ट्रेनों की दुनिया लेकिन पत्रिकाओं की दुनिया से अलग होती हैं। ट्रेनें कभी कभी वीभत्स होती हैं। लेकिन हम सब जानते हैं कि ट्रेनें कभी कभी वीभत्स इसलिए होती हैं क्योंकि हम वीभत्स हैं, मानवता वीभत्स है। आपको नेता शब्द का मतलब मालूम है, नेता, जो चुना जाए और लोगों की भलाई के लिए काम करे, उन्हें मैनिपुलेट न करे। इसलिए आप मोटरसाइकिल चुनते हैं, और साथ में साहित्य और दर्शन। वीभत्सता के इस खेल में आप का कोई काम नहीं।
No comments:
Post a Comment