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Friday, 22 May 2026

पीड़ा

हृदय की पीड़ा छुपाये
कांटो भारी राह पर
वह चलता रहा।

कुछ पल रुका अवश्य
पेड़ की छांव में सुस्ताने के लिए
पर फिर चल पड़ा।

रास्ता कठिन था
राह में कांटे थे
पर वो चलता रहा
अपने हृदय की पीड़ा छुपाये।

सब्र

कई बार जब हम कुछ खोते हैं
तब कुछ पाते हैं
खोया पाया का खेल है
जीवन सुख दुख का मेल है

कुछ पा के कुछ खोया है
सब्र का बीज बोया है
फल की उम्मीद नहीं
मिल जाये तो जीत वही

प्रेम के बीज भी बोये हैं
कुछ पंछी अभी भी सोये हैं
पेड़ों पर उनका रैन बसेरा है
अब कुछ देर है फिर सवेरा है

ज़रिया

अंधेरे को चीरती रौशनी की एक किरण
दिल में उठी उम्मीदों की लहर
देर हुई पर आए दुरुस्त हैं
दर्द का कर्ज चुका एक मुश्त है
लगता है जैसे रौशन हुई ये दुनिया
जैसे अधूरे कामों का था मैं ज़रिया

खुशनुमा

कभी कभी शब्द ढूंढना मुश्किल होता है
कभी कभी हम खो जाते हैं
गहराइयों में कोई तो हो
जो मिले हमसे तो हम बताएं दिल का हाल
डर से भरे सपने जो सच न हो तो अच्छा
खुशी से भरे सपने जो सच हो जाएं

कभी कभी गहराइयों में खुद को ढूंढना होता है
कभी कभी लफ्ज़ खो जाते हैं
गहराइयों में कोई तो हो
जो हमसे हमारा हाल पूछे
जो जाने कि हमने क्या नहीं सहा
इन सारे खुशनुमा सपनों को सच करने के लिए

कलरव

सुंदर फूल खिले बगिया में
नए प्रभात का है आगमन
बिखरी है छटा चहुंओर
ललित हुआ है सूरज का तन

कलरव करते पंछी
उड़ते चारो दिशाओं में
नया सवेरा लाया हर्ष
जो फैला है फ़िज़ाओं में

दिनकर

असंभव को संभव करने चला
द्वैत को अद्वैत करने चला
भीषण पथ पर अग्रसर
करने चला वह सबका भला

भय स्वयं का उसको अनंत
स्वयं विजय ही भय का अंत
अंत में हो सबको आनंद
सोचता वह जीवन पर्यंत

प्रेम का है दूत वह
अभागों का वह भाग्य
दीनों का वह दुख समझता
ऐश्वर्य में वह वैराग्य

पीड़ा का करने अंत
चला वह उस पथ पर
जीवन के अंधकार में
बना वह उज्ज्वल दिनकर

समीक्षा

सत्य की समीक्षा
ज्ञान की परीक्षा
आनंद की भेंट है
प्रेम की है इच्छा

संपर्क सूत्र में बुनें
स्नेह रूप में ढले
प्रेम ही वो तत्व है
जो दीप सा जले

धरा प्रकाशमान हो
ज्ञान का आह्वान हो
प्रेमरूपी सत्य से
दिशा गुंजायमान हो

Wednesday, 20 May 2026

लकड़हारा

लड़ता वह परिस्थितियों से
जूझता झंझावातों में
सारगर्भित हृदय ले कर
अहंकार से करता दो-दो हाथ

बोया गया एक पाप का बीज
जो उगता एक पेड़ स्वरूप
जैसे विषधर हों लगे चंदन पर
ऐसा लेता वह रूप

बन के लकड़हारा वह
काटे जाता पाप का पेड़
रात जैसी कालिमा छंटेगी
और खिलेगी हर्ष की धूप

दैत्य

पुरानी यादों की छाया में,
अब भी कई दैत्य घूमते हैं,
ग़लतियाँ जो ग़लतियाँ नहीं थी,
बनाई गई थी।

माचिस की तीलियों से जलते बुझते
ख्यालों में से,
चुन लेना विचारों के मोती।

नंगे पैर घास पर चल कर,
कभी देखना,
पैरो के तलवों से ओस को टटोलना।

कभी खुद को परखना,
प्यार के दरिया में डुबो कर,
या फिर कर्म के पथरीले
रास्तों पर चल कर।

सुकून

बारिशों में टपकती बूंदो से,
घरों में जलती हुई रोशनी,
बातें करती है।

कभी लगता है कि जाड़े की बारिश
और घरों की गर्माहट एक दूसरे से
प्यार करते हैं,
पर एक दूसरे के करीब नहीं आ सकते।

सड़क पर जलती स्ट्रीटलाइट्स,
रोशनी के साथ एक साया भी देती हैं,
जो साथ साथ चलता है।

भरी बारिश की ठंड से घर पहुंचने का सुकून,
अपने घर के जानी पहचानी गर्माहट
का एहसास तभी होता है
जब किसी ने देखा हो बाहर की बारिश
और घर के सुकून का रिश्ता।

पुल

दोस्ती के मायने,
पैसों से तोलते लोग।
पुल बनाने वालों को
पुल जलाने वाला कहते दोस्त।

कभी खुशमिज़ाज इंसानों में
शैतान ढूंढते हैं,
कभी अपने रसूख से 
तबाह करते हैं जिंदगियां।

असली शैतान पढ़ते हैं
खयालों को,
और करते हैं अपनी हरकतें।

आम को खास बना दिया जाता है,
लेकिन वो पुल कहाँ जलेगा
जो कभी था ही नहीं।

Monday, 18 May 2026

समय चक्र

झीलों में तैरते हंसो को देखा,
नीले पानी में देखी अपनी छाया,
काले कौवों का कर्कश स्वर,
आखिर किसने बनाई ये माया।

खेतों में फसल काटते किसान,
धूप से काली जर्जर काया,
ट्रैक्टर पर बैठे उनके सहोदर,
कुछ ने खोया कुछ ने पाया।

रात की चांदी करती चमचम,
चंदा देखो शीतलता लाया,
सजग हो उठे रात्रिचर,
श्वानों ने अपना गान गाया।

उगता सूर्य ललित हो उठा
दिन से रात फिर दिन आया
चक्र समय का चलता रहता,
चिड़ियों ने फिर दाना खाया।

Sunday, 10 May 2026

प्रेम विघटन

कोमल पुष्पों की शय्या पर विघटित
मानस का एक स्वरूप,
खंडित मानस, हृदय पुलकित,
दिवास्वप्न ये प्रेम।

योद्धा जीवन, प्रेम से सिंचित,
जीवन को मिलता एक अर्थ। 
समय बींधता कोमल यौवन,
प्रेम नहीं यौवन का दास।

अर्थहीन शब्दों से लगे कैसे इस हृदय का मोल,
होता संसार न एक कारगार, तो देता तुमको मैं बोल,
तुम्ही हो वो लक्ष्य, जिसको पाने मैं चलता था,
चरम से करता संघर्ष, तुमको ही मैं हृदय में रखता था।

विकट से लड़ा, अभी भी मैं खड़ा,
जानता हूं, अब योद्धा नहीं जी पाते,
विकृत संसार में, विकृतियों के मध्य,
प्रेम पुष्प अब नही खिल पाते।

आत्मा थकी, हृदय में है आशा,
कोई संसार ऐसा होगा,
जहां मैं तुम्हे वह सब बताता,
जो खंडित होने से पहले मैंने था सोचा।

एक, एकमात्र, एवं सदैव,
अगर होता तो ये ही होता,
पुष्प का भ्रमर, सूर्य का सूरजमुखी,
एक थका योद्धा तुम्हारी छांव में सोता। 






स्पंदन

हृदय स्पंदन, मधुर बंधन,
मिलते हैं जीवन में अनुभव,
जो रह जाते जैसे चंदन।

प्रेम की पीड़ा, अद्भुत क्रीड़ा,
हृदय धड़कता, मन अचंभित,
प्रेम समेटे कैसे ये मन।

तन सुगंधित, जैसे उपवन,
मन जैसे एक ताल हो शीतल,
प्रेम का बंधक करता हृदय को अर्पण। 

सोते इस मन को जगाया,
जीवन में भरे नवरंग,
प्रेम प्रतिज्ञा, हृदय की आज्ञा,
बेसुध मन करे समर्पण। 

चंद लम्हे

रोशनी से नहाई सड़कों पर
हम चलते ले कर हाथों में हाथ,
दुनिया सिमट सी जाती,
चंद लम्हों में।

ठंडी हवाओं के झोंको से
तुम्हारी लटें करती अठखेलियां
और मैं डूबता तुम्हारी आंखों
की गहराइयों में। 

चंद लम्हे और लम्बे फासले,
कुछ यादें और दिल में उबारता एक गुबार,
दुनिया खा जाती है मोहब्बत को,
और बच जाता है एक भागता इंसान।

दीवारों को धक्का देता,
अपने खयालों में डूबा, 
बारिशों को याद करता एक इंसान,
आज भी उन सड़कों पर घूमता है। 


Saturday, 16 March 2024

कत्लेआम

मुझे लगता था मैं ही ऐसा सोच रहा हूं पर जब मैने tumblr पर एक पोस्ट देखा तो मुझे पता लगा कि और लोग भी ऐसा सोचते हैं। लोग हिंदी और अंग्रेजी में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे। इंटरनेट के आने के बाद तो खास कर। लोग हिंदी में रचना नहीं कर रहे। इंटरनेट पर हिंदी में कुछ अच्छा ढूंढने चलो तो नहीं मिलेगा। ऐसा लगता है जैसे हिंदी भाषियों का उत्पीड़न हो रहा हो। जो कि हो भी रहा है। ये एक व्यवस्थित उत्पीड़न है और आश्चर्य की बात है की ब्राह्मण, जिनको इस बारे में कुछ करना चाहिए, वे भी इस बारे में कुछ नहीं कर रहे। उत्पीड़न तो इस देश में खैर सबका ही हो रहा है। इस देश में जो प्रचलित आख्यान चल रहा है वो है सर्वाइवल का। इंटरनेट के शुरुआती दिनों में हिंदी दिख जाती थी, पर धीरे धीरे लोगों को आभास हो गया की इसे बचाया नहीं जा सकता। रागात्मक हिंदी की हत्या कर दी गई क्योंकि अनुराग की ही हत्या की जा रही है तो वो भाषा जिसमें अनुराग हो उसकी क्यों नहीं। इतने घिनौने तो शायद इतना भारत का उत्पीड़न करने के बावजूद अंग्रेज भी नहीं थे। प्रेम की व्यवस्थित हत्या कर दी गई और उस भाषा की भी जिसमें प्रेम समाहित था। अब जैसी भाषा को तुच्छ माना जाता था वो ही प्रचलित आख्यान है, और जो भाषा में आज भी अनुराग रखते है वो या तो शोषित हैं या प्रताड़ित हैं। हमारा सारा डाटा सुरक्षित है, हमारे स्नायुओं और नादितंत्र से सारा डाटा सुरक्षित कर लिया गया है खोया कुछ भी नहीं केवल लोगों के जीवन की गुणवत्ता खोई है। ईर्ष्यालु हैवानों ने लोगों से उनके जीवन की गुणवत्ता छीन ली। अब लोग सड़कछाप भाषा का इस्तेमाल करके अपने आपको सत्यभाषी समझ रहे हैं। मैं समझ सकता हूं क्योंकि मेरे जीवन में भी ये हुआ है। ये इसलिए होता है क्योंकि हम सड़कछाप भाषा को ही असली भाषा समझते हैं, और ये इसलिए है क्योंकि ये व्यवस्थित उत्पीड़न की एक कला है। लोगों को सड़कछाप भाषा बुलवाओ ताकि उनका उत्पीड़न किया जा सके। समय आने पर उन्हे बताया जा सके की जैसी सड़कछाप भाषा वो बोलते हैं वैसे सड़कछाप वो स्वयं भी है। परिष्कृत भाषा का उपहास उड़ाओ ताकि कोई उससे बोलने की हिम्मत न कर सके। भाषा में से स्नेह और प्रेम खत्म कर दो ताकि लोगों को प्रेम का आभास ही न हो। अब केवल दो प्रकार की हिंदी बची हुई है, सरकारी हिंदी, और धार्मिक हिंदी और फिर बचती है उर्दू। सरकारी हिंदी और धार्मिक हिंदी दोनो ही प्रेम विहीन हैं। उर्दू ने इस देश में प्रेम का ठेका लिया हुआ है और प्रेम व्यक्त करने की भाषा है, ये केवल इसलिए नहीं है क्योंकि उर्दू में प्रेम है, है उर्दू में प्रेम है, इसलिए क्योंकि उसे इसलिए परिष्कृत किया गया है, उसे इस तरह लोकप्रिय किया गया है। राग युक्त हिंदी और साहित्यिक हिंदी का व्यवस्थित उत्पीड़न किया गया है और किया जा रहा है। अंग्रेजों के अंडकोषों पर लटके हरामजादों के साथ वही हो रहा है जो बंदर और अदरक के साथ होता है। हिंदी अब केवल घिनौनी राजनीति, धार्मिक उत्पीड़न और उत्पीड़न की साहित्यिक सिसकियों कि भाषा बन चुकी है। जो अंग्रेजों के अंडकोषो पर नहीं लटके उनका उत्पीड़न होना तय है। हिंदी की अवस्था ऐसी हो गई है की हिंदी बोलने वाले ही शुद्ध हिंदी का उपहास बनाते हैं, क्योंकि शुद्ध हिंदी का सौंदर्य बोध उन तक कभी पहुंचने ही नहीं दिया गया। 

Thursday, 29 June 2023

दैव शोषण

अकलेपन और एकाकीपन में अंतर होता है। जब आप अपने अकेलेपन के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं तो आप एकाकीपन के साथ जीने लगते हैं। जीवन में चौकाने वाली घटनाओं के साथ सामना होता है, पर उन घटनाओं का सत्य जानने के बाद आपको आश्चर्य होना बंद हो जाता है। दुख के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। अधीनता, गुलामी, दासता दुख ही देती है खासकर तब जब वो मर्जी के विरुद्ध हो। आपको धोखे से दास बना कर आपका शोषण किया जाता हो और कहीं आप को अपनी अधीनता का आभास हो जाए तो आपको यातनाएं दी जाती हों और आपके जीवन को कुटिल मनोवैज्ञानिक खेलों का मैदान बना दिया जाता हो। इस देश में ये हो सकता है आप सपने में भी नहीं सोच सकते थे, जीवन पर्यंत इस देश का सत्य देखने के बाद भी। आप इस देश और इसकी संस्कृति के दर्शन को मानते थे और अभी भी मानते हैं, इसलिए शायद जीवन भर इसकी वास्तविकता देखने के बाद भी आप मानने से इंकार करते रहे और सोचते रहे की ये बस छुटपुट घटनाएं या उदाहरण है, पूरा देश ऐसा नहीं है। पर एक दशक के भयानक अनुभव के बाद आपको पता चलता है कि ये देश ही ऐसा है, और इस देश को ऐसा जानबूझ कर बनाया जा रहा है। हर तरह की भ्रष्ट्ता कानूनी रूप से मान्य है तब तक जब तक आप पकड़े न जाएं। और असली भ्रष्ट व्यक्तियों के पकड़े जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि वो जिस स्तर पर हैं कानून की वहां पहुंच ही नहीं है। कानून उसके नीचे शुरू होता है। पकड़े वो जाते हैं जो संयमविहीन होने के साथ साथ गरीब भी होते हैं। गरीब और मध्यमवर्ग के लोग रसूख वाले लोगों के लिए चमड़ी का खोल हैं जिनकी चमड़ी के अंदर, जिनके मस्तिष्कों के अंदर घुस के ये लोग वीडियोगेम खेलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस वीडियोगेम में दांव पर वास्तविक जानें लगी होती हैं। राजनीति कभी भी सुंदर नहीं थी, पर राजनीति का ये रूप जानने के बाद दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। सेना, खुफिया विभाग, ये सब, जो मेरे जैसे लोगों का स्वप्न होते है, अपने मायने खो देते हैं। पर ये व्यवस्था वैश्विक है, और मुझ जैसे व्यक्ति का इसके बारे में जानने का कोई मतलब नहीं था। सब से मजे की बात है कि सबसे निकृष्ट प्रजाति के लोग वो लोग निकले जो मेरी दृष्टि में सबसे अधिक सम्मानित लोगों में से एक थे। कलाकार, कहानीकार और लोगों को खबरें और ज्ञान देने वाले। खबरें देने वालों से, खास कर आजकल के खबरें देने वालों से में ऐसी निकृष्टता की उम्मीद कर भी सकता था, पर कलाकारों और कहानिकारों से नहीं। वो व्यक्ति किस बात के कलाकार और कहानीकार जो दूसरों के मस्तिष्कों से चुरा कर कला या कहानी बनाते हों। पर ये सब 2010 से ही शुरू हो चुका था। प्रजातंत्र या गणतंत्र का जो ढोंग इस देश में चल रहा है वो काबिलेतारीफ है, जब कि असलियत में लोगों की यादें और विचार, उनके कौशल और उनका ज्ञान युद्धस्तर पर चुराए जा रहे हैं, वो भी सीधे उनके मस्तिष्कों से। 

सर्वसत्तात्मक अराजकता

मैंने ऐसा समय तक देखा है जहां संगीत की व्यक्तिगत पसंद का भी नियंत्रण किया जाता है, ये बात और है कि इस वक्त समय के जिस दौर में मैं हूं वहां संगीत की मेरी व्यक्तिगत पसंद के कोई मायने नहीं रह गए। मैं बहुत धार्मिक नहीं हूं पर  अगर मुझे कोई सच्ची धार्मिक अनुभूति हुई है तो वो विलियम जेम्स की किताब, द वैराइटीज ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियंस पढ़ने के बाद हुई। जैसा जीवन मैंने गुजारा है, जगहों के मेरे लिए कोई मायने नहीं है, सिवाय उन परिवर्तनों के जो अलग अलग जगहों पर जाने पर विचारों, मस्तिष्क और मानस में आते हैं। लोगों के व्यक्तिगत पसंद का नियंत्रण किया जा सकता है; ये बात मुझे तब पता चली जब मेरी संगीत की पसंद और साहित्य की पसंद का नियंत्रण किया गया। जहां तक मेरा विचार है, और जैसा मुझे लगा, महसूस हुआ, ये मेरे छोटे शहर के होने और सामाजिक वर्ग की वजह से किया गया। अब पीछे जीवन में देखता हूं तो अपने प्रति काफी पक्षपात और भेदभाव नजर आता है पर मैंने कभी उसपर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब पक्षपात और भेदभाव इस स्तर तक पहुंच गया कि उसे नकार पाना असम्भव हो गया तब मुझे इस देश में लोगों की परिस्थिति का अनुभव हुआ, खासकर उनकी जो मेरे से भी नीचे के सामाजिक तबके और जाति या संप्रदाय से वास्ता रखते हैं। इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है पर इन सब बातों, जातिगत भेदभाव, तबके या वर्ग आधारित भेदभाव का प्रवर्तन उस स्तर पर किया जाता है जिसके ऊपर कोई स्तर, कम से कम भौतिक स्तर पर अस्तित्व नहीं रखता, और इस भेदभाव का प्रवर्तन भौतिक रूप से भी कहीं ऊपर होता है, बस इसके परिणाम भौतिक संसार में दिखते हैं। मुझ पर इस भेदभाव से भरी यातना का कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि जिन चीजों को मद्देनजर रख कर मुझे यातनाएं दी गई उन चीजों के मेरे जीवन में कोई मायने नहीं थे। इस यातना से मुझे इस देश में स्तरों और तबकों की योजनाबद्ध बनावट का पता चला, और इस बात का भी कि लोगों के मस्तिष्कों से ज्ञान चुरा कर ज्ञान का अथाह भंडार रखने वाले व्यक्ति अक्षम और भ्रष्ट होने के साथ साथ हैवान भी हैं। अगर न्यायसंगत तरीके से सोचूं तो मेरी कोई गलती नहीं थी, मैं उतना ही स्तर चाहता था जितना पाने का मेरा माद्दा था। अपना स्तर बढ़ाने का मुझे कोई शौक नहीं था, और स्तरों पर, खास कर स्तर की वो परिभाषा जिसका परिचय मुझे बाद में हुआ, मेरा कोई खास विश्वास नहीं था। अभी भी आम आदमी मेरे जैसी ही सोच रखता है, और मानता है की व्यक्ति का असली स्तर उसका पुरुषार्थ है। जब की इस देश का, और इस दुनिया का सत्य ये नहीं है। असल सत्य ये है की आप जिस स्तर पर हैं वहीं पर मरेंगे, तब तक जब तक आप का चयन नहीं होता। स्तर या तबका बढ़ने का कारण पुरुषार्थ नहीं बल्कि चयन है। इस बात का पता मुझे कभी नहीं चलता अगर मेरे पास एक ऐसा वैरिएबल नहीं होता जिसने मुझे इस देश के समाज की, इस देश की भाषा की और इस देश के योजनाबद्ध तरीके से नियंत्रित तबकों की सीमा को नहीं दिखा दिया होता। अगर मेरे पास ये वेरिएबल नहीं होता तो मैं भी आम आदमी की तरह गलतफहमी में ही मारा जाता। अब कम से कम मैं गलतफहमी में तो नहीं मरूंगा। मैंने जीवन में कुछ फैसले किए जो घातक थे पर न मरने के कारण वही फैसले बाद में लाभप्रद साबित हुए, असल में लाभप्रद नहीं, बस सत्य से परिचय कराने के संदर्भ में। 

Wednesday, 28 June 2023

आशियाना कॉर्प

बीता हुआ समय वापिस नहीं आता, और आपके जीवन के हिसाब से ये एक अच्छी बात भी हो सकती है और बुरी बात भी। मोहल्ले खत्म होते जा रहे हैं, और उनकी जगह ले रही हैं सोसायटीज। पहले मैं इस बात का शोक मनाता, पर अब मैं कुछ अधिक ही जान चुका हूं तो ये मानता हूं की सोसायटीज ही ठीक हैं मोहल्लों से जहां बेफिजूल की ताक झांक से मुक्ति मिलती है। मोहल्ले हमेशा से ऐसे नहीं थे, पहले मोहल्लों में ताक झांक थी तो प्रेम भी था, लोग मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते थे और उनको भी पता था कि उनको मदद चाहिए होगी तो ये मोहल्ले वासी ही उनके काम आयेंगे। अब अधिकतर जगहों पर मोहल्ले एक वीभत्स रूप धारण कर चुके हैं, प्रेम से भरे पुराने मोहल्ले लगभग खत्म हो चुके हैं, नई सोसायटीज हैं, पर उनमें से ज्यादातर ऐसी हैं जो मोहल्लों का ही एक विकृत स्वरूप हैं। उनमें मोहल्लों की तरह मदद की भावना तो नहीं है पर ताक झांक बराबर चालू रहती है। थोड़ा और ऊपर जाने पर ये ताक झांक खत्म हो जाती है और कोई मतलब नहीं रह जाता। आधुनिकता से सबसे पहले विकृत हुए गांव। गांव छोटे होते हैं और उनकी अपनी राजनीति और अपना प्रजातंत्र होता है। गांव की अपनी एक दुनिया होती है। समाज की विकृतियां बाहर से आकर गांवों में ऐसे फैलती हैं जैसे कोई महामारी। रीतियों के मामले में गांव सबसे ज्यादा नियंत्रित होते हैं, और इस नियंत्रण, आकार के कारण मानव व्यवहार की जानकारी, बाहरी विकृतियों के बारे में जानकारी और स्वयं की अंदर की विकृतियों के कारण गांव शहरों से भी वीभत्स होते जा रहे हैं। गांव सदा से ही वीभत्स रहे हैं, परंतु बाहरी और आधुनिक ज्ञान से इनकी वीभत्सता एक ऐसा आकार ले चुकी है, जिससे वो अपनी सारी अच्छाइयों का भी परित्याग कर चुके हैं। गांवों में अच्छाइयां भी थीं, अभी भी इस देश के कई गांवों में हैं। गांवों में रीतियों का पालन होता है, और कई रीतियां जिन्हे आधुनिकता के मारे रूढ़िवादिता का नाम देते हैं आज भी संस्कृति को बचाए रखने का काम कर रही हैं। इस देश में गांव दो प्रकार से विभाजित किए जा सकते हैं, अच्छे गांव और वीभत्स गांव, और अच्छे गांव वो ही हैं जिन्हे नियंत्रित करने वाले उदार और न्यायसंगत थे। वर्तमान राजनीति गांव के लोगों को गंवार और कैनन फॉडर समझती है, और इस वजह से बचे खुचे अच्छे गांव भी तेजी से वीभत्स रूप ग्रहण करते जा रहे हैं। मैं विचारधाराओं में नहीं पड़ता पर इस देश में समाजवाद के नकाब के पीछे पूंजीवाद का एक ऐसा घिनौना खेल चल रहा है, और शायद आजादी के बाद से ही चलता आ रहा है, कि सोशल मीडिया के आगमन के बाद आम लोगों ने अपने दुखों को भी सोशल मीडिया पर बेचना शुरू कर दिया है। और बेचे भी क्यों न, आम लोगों के पास दुख के अलावा और पूंजी भी क्या है। सुंदर लड़कियां अपने रूप, वक्षों और नितम्बों को सोशल मीडिया पर बेच रही हैं और बाकी लोग अपने दुखों और अनुभवों को। और इस पूरे व्यवसाय में इस बात का खयाल रखा जाता है की नैरेटिव ऊंचे दर्जे का या हाई क्वालिटी का न हो। क्योंकि हाई क्वालिटी का नैरेटिव सिर्फ उन्ही के लिए आरक्षित है जिन्होंने अंग्रेजों के अंडकोषों के नीचे अपने आशियाने ऐसे बनाए कि आजतक उनकी पुश्तें बादलों पर बने महलों में ही रह रही हैं।

रंगदारी व्याकरण

अजीब बात है न, लोगों को विक्षिप्त बनाने के लिए सस्ती फिल्मों का सहारा लेना। प्रोग्रामिंग का हिंदी शब्द शायद प्रोग्रामिंग ही है। तंत्रिका विज्ञान को एक नए निचले स्तर पर ले जाने वाला ये देश ही है। तंत्रिका विज्ञान की प्रोग्रामिंग को हिंदी में कैसे व्यक्त करेंगे? राष्ट्रभाषा के पास शब्द ही नहीं हैं जो इस हैवानियत को व्यक्त कर सकें। न्यूरोलॉजी को गूगल स्नायुविज्ञान बताता है, और स्नायु का अर्थ मसल बताता है। अजीब है न, राष्ट्रभाषा की ये हालत। अपने देश में ही तीसरा दर्जा। तीसरा इस लिए क्योंकि राष्ट्रभाषा का मज़ाक अंग्रेजी बोलने वाले भी उड़ाते हैं और चालू अथवा बोलचाल की भाषा बोलने वाले भी, पर अंग्रेजी का मज़ाक कोई नहीं उड़ाता, सिवाय उनके जिन्हे अंग्रेजी बोलने नहीं आती। भाषा विज्ञान के तीरंदाजों ने हिंदी को कवियों के अलावा किसी तक पहुंचने ही नहीं दिया। पर ये सब मायने ही नहीं रखता जब आप उस दर्जे की सड़न देख लें, जिस दर्जे की सड़न मैंने देखी है। हिंदी घिनौनी राजनीति का शिकार हो गई। जब मेरा सैबोटेज शुरू हुआ था तो सबसे पहले अंग्रेजी ग्रामर का इस्तेमाल किया गया। मुझे ऐसा दिखाया गया की सब मुझे मॉक कर रहे हैं मेरा अंग्रेजी लिखने का तरीका कॉपी कर के, साथ ही साथ मेरे अंग्रेजी व्याकरण का भी मखौल बनाया गया, जो कि मैं मानता हूं की बहुत अच्छा नहीं है पर इतना बुरा भी नहीं है। हिंदी की हालत ऐसी हो गई है की या तो उससे सरकारी सड़न की गंध आती है या फिर धार्मिक व्यवसाय की। या फिर उससे भी बुरा, व्यंग्य की। एक पूरी भाषा व्यंग्य बन के रह गई है, उस देश में जहां वो राष्ट्रभाषा है। वहीं उर्दू, हिंदी की भगिनी, तंबुओं की भाषा, सबको खूबसूरत लगती है, और कोई उसका मज़ाक नहीं बनाता। यहां पर तंत्रिका विज्ञान वाली बात दोबारा बोलने की आवश्यकता है, और तंत्रिका तंत्र की प्रोग्रामिंग की भी; भाषा की हालत को आपको इस नजरिए से जोड़ के देखने की आवश्यकता है, इस देश की वास्तविकता जानने के लिए। अभी की ये हालत है कि अभी तो कम से कम समकालीन संस्कृति से श्रृंगार रस को खत्म कर दिया गया है, श्रृंगार रस की जगह या तो उर्दू ने ली हुई है, या फिर भौंडेपन ने। और मजे की बात ये है की ये सब या तो सौ प्रतिशत प्लान किया हुआ है, या फिर अक्षमता और भ्रष्टता का एक अभूतपूर्व उदाहरण है। ये देश रंगदारी पर चल रहा है, और एक ऐसे स्तर पर जिसके न तो ऊपर कुछ है, न नीचे। 

उफान

सपने टूटते हैं  तो दिल टूट जाता है, दर्द का दरिया उमड़ता है कभी, कभी गुस्से का उफान, खालीपन सा घर कर लेता है  सीने में और फिर हम फिर उस खालीप...