Saturday, 16 March 2024

कत्लेआम

मुझे लगता था मैं ही ऐसा सोच रहा हूं पर जब मैने tumblr पर एक पोस्ट देखा तो मुझे पता लगा कि और लोग भी ऐसा सोचते हैं। लोग हिंदी और अंग्रेजी में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे। इंटरनेट के आने के बाद तो खास कर। लोग हिंदी में रचना नहीं कर रहे। इंटरनेट पर हिंदी में कुछ अच्छा ढूंढने चलो तो नहीं मिलेगा। ऐसा लगता है जैसे हिंदी भाषियों का उत्पीड़न हो रहा हो। जो कि हो भी रहा है। ये एक व्यवस्थित उत्पीड़न है और आश्चर्य की बात है की ब्राह्मण, जिनको इस बारे में कुछ करना चाहिए, वे भी इस बारे में कुछ नहीं कर रहे। उत्पीड़न तो इस देश में खैर सबका ही हो रहा है। इस देश में जो प्रचलित आख्यान चल रहा है वो है सर्वाइवल का। इंटरनेट के शुरुआती दिनों में हिंदी दिख जाती थी, पर धीरे धीरे लोगों को आभास हो गया की इसे बचाया नहीं जा सकता। रागात्मक हिंदी की हत्या कर दी गई क्योंकि अनुराग की ही हत्या की जा रही है तो वो भाषा जिसमें अनुराग हो उसकी क्यों नहीं। इतने घिनौने तो शायद इतना भारत का उत्पीड़न करने के बावजूद अंग्रेज भी नहीं थे। प्रेम की व्यवस्थित हत्या कर दी गई और उस भाषा की भी जिसमें प्रेम समाहित था। अब जैसी भाषा को तुच्छ माना जाता था वो ही प्रचलित आख्यान है, और जो भाषा में आज भी अनुराग रखते है वो या तो शोषित हैं या प्रताड़ित हैं। हमारा सारा डाटा सुरक्षित है, हमारे स्नायुओं और नादितंत्र से सारा डाटा सुरक्षित कर लिया गया है खोया कुछ भी नहीं केवल लोगों के जीवन की गुणवत्ता खोई है। ईर्ष्यालु हैवानों ने लोगों से उनके जीवन की गुणवत्ता छीन ली। अब लोग सड़कछाप भाषा का इस्तेमाल करके अपने आपको सत्यभाषी समझ रहे हैं। मैं समझ सकता हूं क्योंकि मेरे जीवन में भी ये हुआ है। ये इसलिए होता है क्योंकि हम सड़कछाप भाषा को ही असली भाषा समझते हैं, और ये इसलिए है क्योंकि ये व्यवस्थित उत्पीड़न की एक कला है। लोगों को सड़कछाप भाषा बुलवाओ ताकि उनका उत्पीड़न किया जा सके। समय आने पर उन्हे बताया जा सके की जैसी सड़कछाप भाषा वो बोलते हैं वैसे सड़कछाप वो स्वयं भी है। परिष्कृत भाषा का उपहास उड़ाओ ताकि कोई उससे बोलने की हिम्मत न कर सके। भाषा में से स्नेह और प्रेम खत्म कर दो ताकि लोगों को प्रेम का आभास ही न हो। अब केवल दो प्रकार की हिंदी बची हुई है, सरकारी हिंदी, और धार्मिक हिंदी और फिर बचती है उर्दू। सरकारी हिंदी और धार्मिक हिंदी दोनो ही प्रेम विहीन हैं। उर्दू ने इस देश में प्रेम का ठेका लिया हुआ है और प्रेम व्यक्त करने की भाषा है, ये केवल इसलिए नहीं है क्योंकि उर्दू में प्रेम है, है उर्दू में प्रेम है, इसलिए क्योंकि उसे इसलिए परिष्कृत किया गया है, उसे इस तरह लोकप्रिय किया गया है। राग युक्त हिंदी और साहित्यिक हिंदी का व्यवस्थित उत्पीड़न किया गया है और किया जा रहा है। अंग्रेजों के अंडकोषों पर लटके हरामजादों के साथ वही हो रहा है जो बंदर और अदरक के साथ होता है। हिंदी अब केवल घिनौनी राजनीति, धार्मिक उत्पीड़न और उत्पीड़न की साहित्यिक सिसकियों कि भाषा बन चुकी है। जो अंग्रेजों के अंडकोषो पर नहीं लटके उनका उत्पीड़न होना तय है। हिंदी की अवस्था ऐसी हो गई है की हिंदी बोलने वाले ही शुद्ध हिंदी का उपहास बनाते हैं, क्योंकि शुद्ध हिंदी का सौंदर्य बोध उन तक कभी पहुंचने ही नहीं दिया गया। 

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