वृहद् से भी वृहद्, चरम से भी चरम,
जीवन की पराकाष्ठाओं से क्रीडा करता मैं,
सत्य से विरक्त हो कर भी सत्य के अधीन,
सम्मान से विरक्त हो कर भी सम्मान के अधीन,
हस्तरेखाओं का विन्यास, घटनाओ का अट्टहास,
प्रचंड परिस्थितियों का संसर्ग,
नेत्रों के पटल में विध्वंस का चित्र,
जघन्य से भी जघन्यता का दृष्टा,
आरम्भ से अंत तक स्वयं को ढूंढ़ता,
विभिन्न रूपों का एक योग मैं,
आकाश के मस्तक पर, धरती के वक्षस्थल पर,
प्रेम के अधीन परन्तु वैराग्य से सम्पूर्ण,
कर्म में लीन, पाप पुण्य से विहीन,
जीवन के पराकाष्ठाओं से क्रीडा करता मैं.


