हृदय की पीड़ा छुपाये
कांटो भरी राह पर
वह चलता रहा।
कुछ पल रुका अवश्य
पेड़ की छांव में सुस्ताने के लिए
पर फिर चल पड़ा।
रास्ता कठिन था,
राह में कांटे थे
पर वो चलता रहा
अपने हृदय की पीड़ा छुपाये।
An archive of my writings and a place for my writing experiments and projects.
Friday, 20 April 2018
Friday, 19 May 2017
सूरज जब सोता है
सूरज जब सोता है
शाम जब ढलती है रात में
आता है जब अँधेरा
लेकर चाँद और तारे साथ में
तब होती है इक उम्मीद
फिर एक नया सवेरा आएगा
जगमग धरा को कर जाएगा
फिर से रोशन होगी ये धरती
चहचहाएंगीं फिर वो चिड़िया उड़ती
सूरज जब सोता है
देता है वह उम्मीद
होगा फिर से प्रफुल्लित ये मन
होगा उज्जवल फिर से ये उपवन।
Saturday, 6 May 2017
सवेरा
कई बार जब हम कुछ खोते हैं
तब कुछ पाते हैं
खोया पाया का खेल है
जीवन सुख दुःख का मेल है
कुछ पा के कुछ खोया है
सब्र का बीज बोया है
फल की उम्मीद नहीं
मिल जाए तो जीत वही
प्रेम के बीज भी बोये हैं
कुछ पंछी अभी भी सोये हैं
पेड़ों पर उनका रैन बसेरा है
अब कुछ देर है फिर सवेरा है
Friday, 28 April 2017
जरिया
अँधेरे को चीरती रौशनी की एक किरण
दिल में उठी उम्मीदों की लहर
देर हुई पर आये दुरुस्त हैं
दर्द का क़र्ज़ चुका एक मुश्त है
लगता है जैसे रोशन हुई ये दुनिया
जैसे अधूरे कामों का मैं था एक जरिया
Monday, 24 April 2017
हाल
कभी कभी शब्द ढूंढना मुश्किल होता है
कभी कभी हम खो जाते हैं
गहराइयों में कोई तो हो
जो मिले हमसे तो हम बताएं दिल का हाल
डर से भरे सपने जो सच न हो तो अच्छा
ख़ुशी से भरे सपने जो सच हो जाएँ
कभी कभी गहराइयों में खुद को ढूंढना होता है
कभी कभी लफ्ज़ खो जाते हैं
गहराइयों में कोई तो हो
जो हमसे हमारा हाल पूछे
जो जाने कि हमने क्या क्या नहीं सहा
इन सारे खुशनुमा सपनों को सच करने के लिए
नया प्रभात
सुन्दर फूल खिले बगिया में
नए प्रभात का है आगमन
बिखरी है छटा चहुओर
ललित हुआ है सूरज का तन
कलरव करते पंछी
उड़ते चारों दिशाओं में
नया सवेरा लाया हर्ष
जो फैला है फ़िज़ाओं में
Saturday, 15 April 2017
दिनकर
असंभव को संभव करने चला
द्वैत को अद्वैत करने चला
भीषण पथ पर अग्रसर
करने चला वह सबका भला
भय स्वयं का उसको अनंत
स्वयं विजय ही भय का अंत
अंत में हो सबको आनंद
सोचता चला वह जीवन पर्यन्त
प्रेम का है दूत वह
अभागों का वह भाग्य
दीनों का वह दुःख समझता
ऐश्वर्य में वह वैराग्य
पीड़ा का करने वह अंत
चला वह उस पथ पर
जीवन के अंधकार में
बना वह उज्जवल दिनकर
Wednesday, 12 April 2017
समीक्षा
सत्य की समीक्षा
ज्ञान की परीक्षा
आनंद की भेंट है
प्रेम की है इच्छा
संपर्क सूत्र में बुने
स्नेह रूप में ढले
प्रेम ही वो तत्व है
जो दीप सा जले
धरा प्रकाशमान हो
ज्ञान का आह्वान हो
प्रेम रूपी सत्य से
दिशा गुंजायमान हो
अहंकार के विरुद्ध
लड़ता वह परिस्थितियों से,
जूझता झंझावातों में;
सारगर्भित ह्रदय ले कर,
अहंकार से करता दो-दो हाथ।
बोया गया एक पाप का बीज,
जो उगता एक पेड़ स्वरूप;
जैसे विषधर हो लगें चन्दन पर,
ऐसा लेता वह रूप।
बन के लकड़हारा वह,
काटता वह पाप का पेड़;
रात जैसी कालिमा छंटेगी,
और खिलेगी हर्ष की धूप।
Saturday, 28 May 2016
यथार्थ
यथार्थ का महत्त्व
कहानियों में घुला
अनंत से शुरू
अनंत में चला
सत्य की परख
मिथ्या का तत्व
धैर्य की महत्ता
सामन्जस्य की अशांति
प्रेम की सत्ता
घृणा की भ्रान्ति
यथार्थ का अंत
मिथ्या का सन्दर्भ
अनंत का जन्म
शून्य का गर्भ
Tuesday, 15 September 2015
दिल ए गुलज़ार
मैं कभी कभी सोचता हूँ कि गुलज़ार की कविताओं में ऐसा क्या है जो दिल को छू जाता है? गुलज़ार के लफ़्ज़ों में सादगी है। ऐसे लफ्ज़ जो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के हैं पर गहरे एहसास छोड़ जाते हैं। गुलज़ार के शब्द निराला जैसे नहीं हैं, न ही सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे, पर इन सादे शब्दों की गहराई भी उतनी ही है।
मैं अपनी कविताओं में उतनी सादगी का मेल नहीं कर पाता। शायद कभी कर पाऊं। आज कल तो मैं कवितायेँ लिख भी नहीं पाता। ज़्यादा सोचने का भी समय नहीं मिलता। अभी मन हो रहा है तो कुछ पंक्तिया लिखूंगा।
मेरे तकिये के नीचे रखी पुरानी डायरी में
मेरे प्यार के कुछ लम्हे सहेजे है,
जब मैं था, तुम थी, और वो गुलमोहर था।
तुम्हारी खुशबू को आज भी हवा में सूंघता हूँ
जैसे तुम कहीं आस पास हो,
शुक्र है सहेजना मैंने कभी सीखा था।
ज़िन्दगी की धूप में आगे बढ़ गया हूँ
पर आज भी रुकता हूँ उस गुलमोहर की ठंडी छाँव में,
सुस्ताने के लिए।
Wednesday, 25 February 2015
वर्षा की सुरीली तान पर नाचते हैं मोर
झूमती है डालियाँ चमकते हरे पेड़ों की
सोंधी सुगंध मिट्टी की फैलती है हर ओर
और आती हैं आवाजें छुपे मेंढकों की
खुली खिड़कियों से आता है बूंदों का शोर
और सुनाई पड़ती है सरसराहट झुरमुटों की
बारिश की ठंडक से खिल उठा हर पोर
हवा आई हो जैसे पर्वतों की
रहस्यमयी रातें और बादल घनघोर
बातें कुछ पुरानी उन आदतों की
जिनसे बंधी है दिल की डोर
चंद यादें उन पुरानी सोहबतों की
Friday, 20 February 2015
Wednesday, 18 December 2013
लफ़्ज़ों के मोती..
कुछ बातें मैं कहना चाहता हूँ
पर जैसे मेरे होठ सिले हों
उस धागे से
जो है रिश्तों की डोर
मैं कहता हूँ कुछ
और कहना चाहता कुछ और
लफ़्ज़ों को चाहता हूँ पिरोंना
उस रिश्तों की डोर में
लफ्ज़ जैसे मोती काले या सफ़ेद
मोती जो निकलें हैं दिल की सीपी से
जिनकी कीमत वैसे तो कुछ नहीं
पर तुम चाहो तो हैं वो अनमोल
Monday, 16 December 2013
रोग
कभी कभी सोचता हूँ
है क्या कोई इलाज
इस रोग का
जिसका नाम है ज़िंदगी
दर्द की अब तो है ऐसी आदत
हो गया है अब उसका भी नशा
घुटन भी अब ऐसी है
जैसे हो खुला आसमाँ
कभी कभी लगता है ऐसा
जैसे सांस लेना भूल गया
जिंदा हूँ अब भी मैं पर
खुद ही खुद से दूर गया
मौत ही लगती है इलाज
इस नामुराद रोग का
जिसका नाम है ज़िन्दगी
पर मैं रहना चाहता हूँ जिंदा
बीमारों के बीच एक बीमार
जब तक ज़िन्दगी खुद न कर दे रिहा
ठंडी घाटी
ठंडी सी उस घाटी में
रुका हुआ सा कारवाँ
मर्दों का एक झुण्ड
बर्फीली ज़मीन पर
ठण्ड की ठिठुरन
और हवाओ की चुभन
भेदता कानों को
वो गहरा सन्नाटा
हैं कुछ जांबाज़
जो लड़ते हैं कुदरत से
और कभी कभी खुद से
उस ठंडी सी घाटी में
उफान
सपने टूटते हैं तो दिल टूट जाता है, दर्द का दरिया उमड़ता है कभी, कभी गुस्से का उफान, खालीपन सा घर कर लेता है सीने में और फिर हम फिर उस खालीप...
-
Jay thrashed his fingers across the strings of his bass guitar, the basis notes reverberating through the dimly lit club. The cr...
-
The yellow submarine silently explores the vast green sea. The captain looks through the periscope for the slightest hint of the island of s...
-
I got to have my creative milestones for inspiration. Of course I have to depend on the 90s Indian comics book narratives for getting inspir...