Wednesday, 25 February 2015

वर्षा की सुरीली तान पर नाचते हैं मोर
झूमती है डालियाँ चमकते हरे पेड़ों की
सोंधी सुगंध मिट्टी की फैलती है हर ओर
और आती हैं आवाजें छुपे मेंढकों की

खुली खिड़कियों से आता है बूंदों का शोर
और सुनाई पड़ती है सरसराहट झुरमुटों की
बारिश की ठंडक से खिल उठा हर पोर
हवा आई हो जैसे पर्वतों की

रहस्यमयी रातें और बादल घनघोर
बातें कुछ पुरानी उन आदतों की
जिनसे बंधी है दिल की डोर
चंद यादें उन पुरानी सोहबतों की

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