जॉन लेनन का चश्मा कैसा था? गोल? उसकी बुद्धि भी गोल थी। सारे गोल चश्मे वाले एक जैसे होते हैं। सारे दाढ़ी वाले अंदर से ठरकी होते हैं। अगर पहचान पाओ तो। सारे गोल चश्मे वाले गोल चश्मे नहीं पहनते और सारे दाढ़ी वालों की दाढ़ी नहीं होती।
मैं पहाड़ पर रहना चाहता हूँ। पहाड़ की ज़िन्दगी। वो मेहनत भरी धीमी ज़िन्दगी। खतरे से भरी ज़िन्दगी। पर हर इच्छा पूरी नहीं होती। मैंने अपनी बीमारी से काफी लड़ाई की है, वो भी अकेले। अपनी दिक्कतों से लड़ना और साथ में आगे भी बढ़ते रहना मुश्किल काम है। भीड़ भाड़ में रहने से ये काम और भी मुश्किल हो जाता है।
भारत की मुझे ये दिक्कत लगती है की यहाँ के लोगों को औकात से ज़्यादा आज़ादी मिल गयी है। मुझे लगता है की आज़ादी का निर्धारण मेहनत, ज्ञान या शिक्षा के आधार पर होना चाहिए। इन तीनों में से एक भी किसी इंसान में ज़्यादा मात्रा में है, उसको पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। और इनको जांचने के लिए तरीके विकसित किये जाने चाहिए। खाली और बद्तमीज लोगों के लिए आज़ादी का कोई अर्थ नहीं।
लोग ऐसे ही होते रहे तो गोल चश्मे वाले कहीं खो जाएंगे। गोल चशमे वाले गोल बुध्दि वाले पागल लोग ही बदलाव् लाते हैं। और दाढ़ी वाले उन बदलावों को इतिहास के पन्नों में अंकित करते हैं। और फिर उन की सारी मेहनत खाली बैठे इन बेवकूफ और निर्दयी जानवरों द्वारा बर्बाद कर दी जाती है।
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