Nov 19/2020
आज भारत जैसा है, और जिस तरह तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, अपना इतिहास जानना और भी आवश्यक हो गया है। मुझे इतिहास कोई खास लगाव नहीं था लेकिन आजकल जिस तरह से इतिहास को तोड़ मरोड़ कर दिखाया जाता है, इतिहास के ज्ञान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक हो गयी है।
इतिहास का सबसे बड़ा basis सत्य और तथ्य होने चाहिए, लेकिन आजकल की information warfare की दुनिया में इन्ही दो चीजों की कमी है। सच्चा justice achieve करने के लिए और भी कई चीजों के अलावा सत्य और तथ्य दोनों आवश्यक हैं।
भारत के इतिहास के दो प्रमुख प्रमाण नालंदा और तक्षशिला के खंडहर अभी भी हैं। Archeological Survey of India भले ही पुराणों के समय के प्रमाण सिद्ध नहीं कर पाया हो लेकिन नालंदा और तक्षशिला के खंडहर प्रमाण स्वरूप अभी भी उपस्थित हैं।
आक्रांताओं ने सबसे पहले विश्वविद्यालयों पर आक्रमण करके यह सिद्ध कर दिया कि उनका मकसद क्या था। दक्षिण भारत में प्रमाण प्रचुर मात्रा में हैं, वहीं उत्तर भारत अभी भी अधिकांशतः मुग़ल संस्कृति के प्रभाव में जान पड़ता है।
बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को टैंकों द्वारा ध्वस्त किया जाना इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार के लोग ऐसी चीजों को अंजाम देते हैं। सिख गुरु स्वर्ण मंदिर की आधारशिला रखने के दौरान goodwill gesture के तहत ईंट रखवाते हैं वहीं बर्बर आक्रांता दूसरी संस्कृतियों के प्रमाण भी नेस्तोनाबूद कर देते हैं।
हर धर्म के अपने नियम होते हैं, लेकिन ये जानने में बहुत अधिक बुद्धि नहीं लगती की भले ही आपका मुखिया अलग हो लेकिन अगर आप मानते हैं कि ईश्वर एक है तो फिर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि जिनको आप प्रताड़ित करते हैं उनका भी ईश्वर वही है।
अगर बामियान बुद्ध की प्रतिमा होती तो अफ़ग़ानिस्तान भी मिस्र की भांति अपनी पुरातन संस्कृति विश्व को दिखा सकता था, और शायद थोड़ी शांति बहाल होने पर पर्यटन से कमाई भी कर सकता था।
मैंने वीर सावरकर को कभी नहीं पढ़ा लेकिन उनका एक quote अवश्य पढ़ा है, exact quote याद नहीं, इसलिए शायद paraphrase हो जाए – “तुम मुसलमान हो इसलिए मैं हिन्दू हूँ, अन्यथा मैं तो विश्वमानव हूँ।” ये बात केवल एक धर्म पर लागू नहीं होती। ये बात उन सब पर लागू होती है जो अपनी कट्टरता से दूसरों को झुकाने और कष्ट देने पर विश्वास रखते हैं।
An archive of my writings and a place for my writing experiments and projects.
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