Wednesday, 16 March 2022

चार्वाक, वैज्ञानिकों और तत्वज्ञानियों की आवश्यकता

Oct 27/2020

मुझे Netflix की सीरीज Leila बिल्कुल पसंद नहीं परंतु अगर हमने अपने यहां के चार्वाकों, वैज्ञानिकों और तत्वज्ञानियों पर ध्यान नहीं दिया तो वो दिन दूर नहीं जब सच में हर कोई गेरुए वस्त्रों में दिखाई देगा। अपने राष्ट्रीय परिचय की सुरक्षा करते करते हम सच में वो बन जाएंगे जिनसे हम अपनी संस्कृति की सुरक्षा करना चाहते हैं और शायद फिर हम स्वयं से स्वयं का पानी काटने लगें।

मज़हबी कट्टरपंथ की आवश्यकता नहीं होगी जब अपने धर्म का पालन सच्ची लगन से करें। एकम सत्य बहुधा वदन्ति, में वो लोग खासकर फंस जाते हैं जिनके उस सत्य को प्राप्त करने का रास्ता और नियम कठोर होता है। कट्टरपंथ, कट्टरपंथ को जन्म देता है, और ये सत्य है कि इंटरनेट के युग में भारत को अपनी राष्ट्रीय पहचान बचाने के लिए थोड़ा तो संघर्ष करना पड़ ही रहा है, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि हम वो चीज़ें ही भूल जाएं जो भारत को भारत बनाती हैं।

जिनका ईश्वर को प्राप्त करने का रास्ता कठिन है उनसे हमें सहानुभूति रखनी चाहिए, परंतु अपनी सारी अच्छाई को बचाते हुए अडिग रहना भी एक कठिन कार्य है, लेकिन मिल कर प्रयास करने पर असंभव कुछ भी नहीं। दूसरे की भावनाओं का सम्मान, और अपना सत्य उन पर थोपना नहीं, लेकिन कोई अपना सत्य आप पर थोपे तो उसे स्वीकार नहीं करना और अपनी सारी अच्छाइयों को बरकरार रखना कठिन तो है ही। हर कोई पूजा विधियों, और धार्मिक अनुष्ठानों का ज्ञाता नहीं होता, और हर किसी को validation भी नहीं चाहिए होता।

व्यक्ति को बहुत देर तक पानी न मिले तो वो बुद्धिजीवी से, असंसदीय शब्द के लिए माफ करियेगा, ‘फुद्दीजीवी’ बन जाता है, और जो नहीं बनता, वो बना दिया जाता है।

जो लोग अपने नामों को उर्दू में लिख कर विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आम आदमी को गेरुए गमछे पहनने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, और ये भी की Afrika में लोगों को वास्तविकता में खाना और पानी नहीं मिल रहा।

No comments:

Post a Comment

Competent Authority

You imagine a girl painting a picture of you as Tyler Durden from fight club. A pizza delivery boy goes to deliver a pizza at a whorehouse. ...