Nov 10, 2020
जिसकी लाठी उसकी भैंस पुरानी कहावत है, ग्रामीण परिवेश के आधार पर ये बात कुछ हद तक सही है पर इसके उदाहरण सभ्य समाज में भी कम नहीं हैं।सहायता और शक्ति प्रदर्शन में से एक चुनना पड़े तो कई सारे लोग शक्ति प्रदर्शन चुनेंगे। ताक़त के मद में लोग इतने चूर हैं कि youtube पर दारू के commercials दिखाते समय भी लोग लंगड़े दोस्त को मदद पाता हुआ दिखाते हैं। ऐसा भी तो हो सकता है कि वो लंगड़ा दोस्त बाकी दोस्तों को पढ़ाता हो। खैर commercial तो दारू का ही था न।
प्रेम बहुत दुख देता है, लेकिन प्रेम का क्षणिक आनंद भी ऐसा होता है कि व्यक्ति अपने आप तक को ही भूल जाता है और क्षणिक प्रेम के बदले दुख ले बैठता है।
अब आते हैं लोगों के जुड़ाव पर। श्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं “सब मिले हुए हैं जी”। Individualistic लोगों को ये पसंद नहीं आएगा। आपके पेशाब करते समय कोई आ कर झांके या आपकी निजता का उल्लंघन करे तो आपको कैसा लगेगा ये आप पर निर्भर करता है लेकिन privacy पसंद करने वाले लोगों को तो दिक्कत होगी ही।
पूजा करने वाले लोगों को भी खांसी आती है, मैं तो फिर भी एक चार्वाक हूँ, जो पूजा कम ही करता है।
भारत का आम आदमी भी क्या करे, भारत में रहो तो खांसी या गठिया और बाहर जाओ तो दूसरों की दबंगई झेलो।
दबंगई के विषय से याद आता है पाकिस्तान और याद आती है खालिस्तानियों की। मैं उनको उतना दोष नहीं दूंगा जितना देना चाहिए क्योंकि मैं स्वयं कभी कभी खांसी का शिकार हो जाता हूँ। सलमान खान और शाहरुख खान कैसे झेलते हैं, भगवान ही जानते हैं।
कश्मीरी पंडित, भाग के कैम्पों में रहते हैं, और कई सालों बाद उनपर फ़िल्म बनाई जाती है तो खांसी के बदले के स्वरूप में कश्मीरी पंडित मुस्लिम बन जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन अगर कोई दबंगई का शिकार हो कर या बदले स्वरूप मुस्लिम बने तो बुराई अवश्य है। मुझे religious बातें या religion के बारेमें बातें करना पसंद नहीं लेकिन जब देशों की politics ही religion पर based हो तो ये सब बातें करते हुए शर्म आने पर भी करनी पड़ती हैं।
अगर आप धनी नहीं हैं तो Islam एक one-way street है। आप छोड़ना चाहें तो सीधे ex-muslim ही बनते हैं। चावल ले कर convert होने वालों को कभी अपने आप को ex-hindu बोलते सुना है? हिंदुत्व में काफी बुराइयां है लेकिन उसमें समय के साथ विकसित होने की भी क्षमता है। यहां हिंदुत्व का अर्थ वैसा ही है जैसा मैं समझता हूं, भौगोलिक, और ना कि किसी प्रार्थना एवं विधि पद्धति पर आधारित। धर्म कि प्रार्थना और विधि पद्धतियां indigenous हैं लेकिन हिंदुत्व का सार ही सबको अपनाना है भले ही थोड़ी खांसी क्यों न आये। खैर जो लोग फिर से “हिन्दू” हिन्दू बनना चाहें उन्हें क्या करना चाहिए, ये तो विद्वान ही बता सकते हैं, लेकिन थोड़ी खांसी आ जाये तो Vicks कि गोली तो ले ही सकते हैं।
अंत में, एक बात समझ नहीं आती कि जब ननकाना साहिब पाकिस्तान में है तो खालिस्तानी भारतीय पंजाब के चक्कर में क्यों पड़े हैं, और, जब एक आज़ाद कश्मीर पहले से है तो जिनको कश्मीर आज़ाद चाहिए वो वहीं क्यों नहीं चले जाते?
An archive of my writings and a place for my writing experiments and projects.
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