Wednesday, 16 March 2022

रंगभेद, नस्लभेद और साम, दाम, दंड, भेद

Nov 13/2020

एक बात मैं कह सकता हूँ कि मैंने जानबूझ कर कभी नस्लभेद या रंग भेद नहीं किया। अगर किसी प्रकार का भेद किया है तो वो सांस्कृतिक या फिर geographical था, वो भी बस इसलिए क्योंकि अगर कोई आपकी संस्कृति से है या आपकी जगह से है तो निस्संदेह common traits होते हैं।

भारत में जगह के हिसाब से inferiority या superiority काम्प्लेक्स होते हैं। कहीं मेरठ में चीनी मिल होती हैं और कहीं राजस्थान में मसालेदार खाना और दक्षिण भारत में फ़िल्टर कॉफ़ी।

साम, _____, दंड और भेद का शिकार व्यक्ति जीते जी zombie बन जाता है। अपनी मृत्यु का इंतज़ार करते करते, श्री राम और रावण के बीच झूलेलाल बनते बनते थकता तो है पर पृथ्वी पर अपने “फ़र्ज़” और अपने उद्देश्य निभाने के लिए किसी तरह अपनी miserable existence को suitable तरीके से ढालने का प्रयत्न करता है।

दक्षिण भारत में अगर अपने सहपाठी को उसने कहा कि वो फलां व्यक्ति के निकट इसलिए है क्योंकि वो व्यक्ति उसके शहर से है तो वो रंगभेदी/नस्लभेदी बन जाता है, जबकि सत्य यही है कि निकटता का कारण कई common विषय होना है।

यदि कोई मसखरा जो सबका मज़ाक बनाता है अगर कोई मज़ाक बना दे तो वो नस्लभेदी बन जाता है, क्योंकि दिक्कत उसमें नहीं बल्कि सुनने वाले के inferiority complex में है। कभी कभी inferiority complex दूर करने में वर्षों लग जाते हैं, पर आसान तरीका ये है कि आप कोई positive ढूंढे। South की फ़िल्टर कॉफ़ी का मुकाबला north की कॉफ़ी नहीं कर सकती क्योंकि north में कॉफ़ी उगती ही नहीं।

Quentin Tarantino, Uma Thurman को ले कर मूवी बनाता है तो उस समय आपके दिमाग में ये नहीं आता कि feminism नाम की भी कोई चीज़ होती है। आप बस “The Bride” का दुश्मनों से बदला लेने का इंतज़ार करते हैं क्योंकि उन्होंने उसके साथ ग़लत किया था। वहीं आजकल की फिल्मों में काले को गोरा बनाया जा रहा है, और लड़कियां बॉयकट बाल काट के feminism वाली फिल्मों में आ रही हैं। थोपा हुआ feminism किसी काम नहीं आता, क्योंकि glass ceiling बहुत मजबूत है। नारीवाद को तरसती महिलाएं एक अदद sanitary pad को तरस रही हैं और यहां आधे मन से feminist फिल्में बनाई जा रही हैं जिसमें कई बार दारू और सिगरेट पीना feminism को परिभाषित करता है। खैर, जनतंत्र है। काश कम से कम भारत में feminism को import करने से पहले, feminism और नारीवाद का अंतर समझ लिया होता तो आज ये हालात नहीं होते। अच्छे मर्द रंडी बजाज बन गए और बाकियों का कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि वो glass ceiling के ऊपर हैं।

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