Wednesday, 16 March 2022

प्रत्याशित रोड़ों को पुणेकर बनाने की कला

March 1/2021

प्रत्याशित रोड़े अगर अफगानी, ईरानी नहीं बने तो कम से कम पुणेकर तो बन ही जायेंगे, ये सोच क्यों है, इसका तो पता नहीं, परन्तु है अवश्य। अज़ान अच्छी लग सकती है परंतु दबाव में नहीं, खासकर उन लोगों को जिनको कथक से अधिक भरतनाट्यम पसंद है। कथक भी एक अच्छी कला है, कोई भी सांस्कृतिक कला बुरी कैसे हो सकती है?

चंदामामा और बालहंस जैसी पत्रिकाएं या तो समाप्त हो गयी हैं या उनका स्वरूप बदलते ज़माने के साथ परिवर्तित हो गया है।

छोटा पंडित अगर पंडित है तो उसको पंडित होने का बहुत घमंड होता है। बड़े पंडित के साथ ऐसा नहीं होता क्योंकि उसका सत्य से परिचय होता है, और जिसका सत्य से परिचय होता है उसमें घमंड नहीं होता, तब तक जब तक उस घमंड का स्रोत बाहरी न हो।

कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण होती हैं, जैसे कि नेहरू जी का एक आदिवासी महिला को सम्मान स्वरूप माला पहनाया जाने को उसके आदिवासी समाज के नियमों के हिसाब से उस समाज के द्वारा उन्हें विवाहित मान लिया जाना और उसे समाज से निष्काषित कर दिया जाना। लेकिन कुछ घटनाएं द्वेष और घृणा से प्रेरित होती हैं, जो कि आम आदमी के लिए कभी कभी एक सामान्य भावना हो सकती है लेकिन ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के लिए नहीं। अमरीकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने कहा था कि “एक हथौड़े वाले व्यक्ति को हर वस्तु एक कील के समान लगती है”, ये वाक्य खासकर उन लोगों के लिए है जो अपनी ताकत का इस्तेमाल लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए करते हैं, ताकत का ग़लत इस्तेमाल किसी का भला करने के लिए हो तो क्षम्य है, अन्यथा नहीं, लेकिन ऐसे लोगों को क्षमा की आवश्यता भी नहीं होती।

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