Wednesday, 16 March 2022

गौसेवा और दो पालतू कुत्ते

Oct 23/2020

आजकल की युवा पीढ़ी में बिल्ली पालने का चलन है। मुझे बिल्लियां कुछ खास पसंद नहीं लेकिन अगर कभी पाली तो नाम सोच कर रखा हुआ है, “नेफेरतीति”। मुझे कुत्तों से खास लगाव है। मेरे परिवार में कुत्ते पाले गए, लेकिन बड़े होने के बाद आपको लगता है कि आपके पर्सनल कुत्ते भी होने चाहिए। कुत्ते वफादार होते हैं, आपकी सुरक्षा करते हैं। अगर मैंने कुत्ते पाले तो उनका नाम होगा “Hitler” और “Babar”.

मुझे लगता है कि कुत्ते पालना इंसान पालने से ज़्यादा बेहतर है। मैं काफी दिनों से शाकाहार का पालन कर रहा हूँ, सामान्यतः मैं शाकाहारी ही हूँ लेकिन कभी कभी मांसाहार का मन करता है, खासकर poultry. मछली कभी कभी ही खाना पसंद है, freshwater या seawater ये बनाने वाले पर निर्भर करता है।

बिल्लियां वफादार नहीं होती, लेकिन वो आपसे वफादारी मांगती हैं। मेरे विचार से वफादारी two way street है, और one way street तब है जब आप किसी के नौकर या retainer हों। इसमें भी कई बातें आती हैं, और अच्छा मालिक अपने retainer का खयाल रखता है।

गौसेवा आवश्यक क्यों है? क्योंकि आप गाय के बच्चे का दूध पी लेते हैं। अगर पैसे से दूध खरीद रहे हैं तो कोई बात नहीं लेकिन अगर आप बीफ खाते हैं (जो कि सांस्कृतिक और culinary preference है) तो (अगर आप भारतीय हैं तो) कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि सोशल मीडिया पर चीख चीख कर ये ना बताएं कि बीफ कितनी अच्छी चीज़ है (western preferences अलग हैं, और उनके लिए नार्मल बात है, साथ ही (कइयों में) सालों का colonization का arrogance भी है), जो कि अज्ञानता या संयम की कमी से आता है। मैं संयम की कमी के लिए कभी किसी को दोष नहीं देता क्योंकि संयम या धैर्य की समस्या को मैंने स्वयं भुगता है)।

भारत में दो किस्म के ब्राह्मण पाए जाते हैं, सरकारी ब्राह्मण और जाति के ब्राह्मण। धार्मिक ब्राह्मण इन दोनों में होते हैं, जो अपने ब्राह्मण होने का कर्तव्य निभाते हैं आचार और विचार दोनों से।

कुछ सिर्फ जाति के ब्राह्मण होते हैं, जिनको आदर तो पूरा चाहिए लेकिन कार्य बस दूसरों का शोषण और entitlement रखना है। entitlement हर बार वैधानिक हो सकता है, जब विधि ही आपके हाथ में हो।

“अहिर, गड़रिया, कुनबी, चोर

धय सारे की टंगड़ी तोड़”

इनके कई सिद्धांतो में से एक है, जिसका सही interpretation ये स्वयं भी नहीं कर पाते।

अफसोस, येशु मसीह भी गड़रिये ही थे।

कभी कभी आप किसी से प्यार करते हैं तो आपको उनके भी कुत्ते पालने पड़ते हैं। और एक बात तो मैं बिल्कुल कह सकता हूँ कि dog handling आसान काम बिल्कुल नहीं है, especially तब जब आपको जानवरों से डर लगता हो, भले ही आपको कुत्तों की वफादारी कितनी ही पसंद हो।

खून, ज़मीन या मज़हब?

Oct 21/2020

भारत, विविधता का देश, धर्म का देश। विश्व में जेनेटिक समानता और विभिन्नता बहुत है। भारत और पाकिस्तान में जेनेटिक समानता है, पाकिस्तान और ईरान, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जेनेटिक समानता है, मंगोलिया और तुर्की में जेनेटिक समानता है, नेपाल और तिब्बत में जेनेटिक समानता है।

हम अपना प्रकार ढूंढते हैं, अपना प्रकार और अपने से थोड़ा सा भिन्न। कभी कभी कोई काफी कुछ अपने जैसा हो तो उससे चिढ़ भी होती है। कोई बहुत अलग हो तो विस्मय या कभी कभी घृणा भी हो सकती है।

यहां पर मज़हब कहाँ आता है? मज़हब तब आता है जब हम दूसरे का genocide करने पर उतर आते हैं।

याद है, पाकिस्तानियों ने क्या किया था बांग्लादेश में? Genocidal rape, न जाने कितनी महिलाओं का। जो लोग ये मान कर की अल्लाह को सिर्फ अरबी भाषा आती है, अल्लाह का अपमान कर सकते हैं, उनके लिए किसी की संस्कृति का अपमान करना कितना कठिन है? अल्लाह में मानो, ठीक है, अपने नियम भी मानो, ठीक है, पर दूसरों को तो उनके नियम मानने दो। कहते हैं ना, नया मुल्ला ज़्यादा बांग देता है। अरबी तसल्ली से रहते हैं, अपने वतन का विकास करते हैं, अपने नियम मानते हैं, वहीं पाकिस्तान अपना इतिहास भी झुठलाने पर तुला हुआ है।

बड़े लोगों में purity वाला हिसाब बहुत होता है। genetic makeup का फर्क बहुत होता है, विडम्बना की बात है ना कि मैंने पढ़ा था कि हिटलर में यहूदी खून भी था, ऐसा व्यक्ति जो आर्यन supremacy मानने वाला था। बहुत ज़्यादा आज़ादी ज़रूरी नहीं परन्तु इतनी तो होनी ही चाहिए की अपने प्रकार के लोगों से खुल कर मिलजुल सकें, लेकिन यहीं पर आ जाता है मज़हब, और उससे ज़्यादा मज़हब का ग़लत इस्तेमाल करने वाले लोग। बंगालियों का genocide कर के क्या मिला? पूरे विश्व को इस्लामिक कर के क्या मिलेगा? विविधता में क्या बुराई है? छोटे communes में क्या बुराई है? विकास के लिए ज़रूरी पूंजीवाद या capitalism में क्या बुराई है? समाज का खयाल रखने वाली socialist सरकार में क्या बुराई है? क्या balance सिर्फ Thanos के तरीके का होना आवश्यक है? सामंजस्य और सद्भावना में क्या बुराई है?

थकान से राहत, कुछ लघु शंकाएं

Oct 19/2020

कहानियां बहुत सारी हैं। बचपन में अगर हम भाग्यशाली रहे तो एक बहुत तो हमारा मन एक बहुत सुंदर दुनिया गढ़ता है। लेकिन मन को हमेशा कुछ बेहतर चाहिए होता है।

दुनिया को देखने के कई नज़रिये हैं, और मेरा दुनिया को देखने का खूबसूरत नज़रिया तब बदला जब मैंने वो मारामारी, वो आपाधापी देखी, उस ईर्ष्या को देखा जो संबंधों को खराब कर देती है।

मेरे मन ने भी भी एक सुंदर दुनिया को गढ़ा था। मेरे बचपन का समय ऐसा ही था। दूरदर्शन, सुपर मारियो, श्री कृष्णा, शक्तिमान, पुरानी फिल्में, स्कूल में दोस्त, कुछ गलतियां, कुछ मज़ेदार बातें।

और फिर नज़रिया धीरे धीरे बदलना शुरू हुआ। हैरी पॉटर जैसी किताबें पढ़ के आपको अच्छाई पर भरोसा होता है। रामायण और महाभारत आप को हमेशा यही सिखाते हैं कि बुराई पर अच्छाई की विजय होती है। आम भाषा में जो शब्द प्रयुक्त होते हैं वो शायद ही शुद्ध हिंदी या हिंदुस्तानी में प्रयुक्त होते हों। कभी किसी ने कहा है कि मुझे लघुशंका जाना है। इस्तेमाल करके देखिए, लघुशंका। ज़मीनी तौर पर जो शब्द प्रयुक्त होते हैं, मेरा मतलब है एकदम ज़मीनी तौर पर, या कहें रसातल पर, वो सभ्य समाज में नहीं होते। जानता हर कोई है, या ज़्यादातर लोग, लेकिन सब को सज्जन बनना है।

कभी अपने कॉलेज के दोस्त से कह कर देखिये, “यार मैं, लघुशंका जा रहा हूँ”, ना मज़ाक उड़ाया तो कहना। फिर व्यक्ति किन शब्दों का प्रयोग करे? यहां पर अंग्रेज़ी मदद के लिए आती है, “यार मैं ‘लू’ जा रहा हूँ”। ये सारी बातें बिल्कुल कहें तो “बेसिक” हैं, लेकिन हमारे हिंदी प्रेमी और हिंदी “एनफोरसिंग” विद्वानों को इन बातों पर इसलिए ध्यान नहीं देना है क्योंकि, न तो उन्हें लघुशंका होती है, और “दीर्घशंका” तो छोड़ ही दो।

सबका अपना स्वभाव होता है। मेरा स्वभाव ये है कि अगर मैं अपने घर में आलसी हो कर भले ही साफ सफाई न करूं, परंतु अगर मैं अगर बाहर जाता हूँ तो कोशिश करता हूँ कि अगर साफ सफाई न कर सकूं तो कम से कम कचरा तो न ही फैलाऊँ। लेकिन ये मैं अपनी प्रवृत्ति के बारे में बता रहा हूँ। जब आप उन लोगों को देखते हैं, जो धड़ल्ले से कचरा फैलाते हैं, तो आपको लगता है कि भारत की सरकार आलसी है। इसी सरकार का आलस उसी समय तुरंत दूर हो जाता है जब आपकी कल्पनाशीलता थोड़ी ज़्यादा हो जाती है, या आपके विचार थोड़ी “एक्सप्लोरेशन” करने लगते हैं। मेरे बचपन में एक और प्रोग्राम आता था, “छुपा रुस्तम”। भारत में कई छुपे रुस्तम हैं, और हमारा भारत जो इन रुस्तमों को रुस्तम-ए-हिन्द बना सकता है, ऐसी शंकाओं में घिरा है, जो लघु शंकाओं पर बहुत समय तक ध्यान न देने से ही पैदा होती हैं। “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, संविधान अवश्य देता है, लेकिन क्या भारत में संविधान का कोई महत्व है?

जब लिखने की कोशिश करने, या फिर कुछ उससे भी ज़्यादा “बेसिक” बातों पर, “ऊपर दी गुड़ गुड़ दी एनेक्सी दे बेधियाना…..” हो सकता है।

“ठाकुर, बाभन” तो जात ही है, लेकिन “काला, सफेद” तो वर्ण हैं। गेंहुआ, वो रंग है जो अक्सर ‘गुमशुदा की तलाश’ में प्रयुक्त होता है। कभी कभी अपने आपको ठाकुर या जाट या यादव जी समझने वाले लोगों को भी “भारी मिश्टेक हो गया सर, एकदम बलंडर हो गया” कह के दांत निपोरने पड़ते हैं।

“आज़ादी”, “आज़ादी” के रैप सुनकर खून में जोश ले कर सड़कों पर उतरने पर, पृष्ठभूमि पर लट्ठ, रैप बनाने वाला नहीं खाता, वो तो यूट्यूब पर हिट्स और लाइक्स खाता है।

आप ने भले ही कभी “डार्क वेब”, नहीं चलाया हो, पर कोई ज़रूरी नहीं कि इससे आप किसी “कांस्पीरेसी” का हिस्सा न बनें। बस शौकिया तौर पर लगाया हुआ एक “गाए फॉक्स” मास्क भी आपको एक गाय बना सकता है। खेल गहरा है, और कांटेक्ट ट्रेसिंग कौन करे इसलिए ट्रेन में बकरा ढूंढो? इसी बात से एक गाना याद आ गया।

“देखो देखो, क्या वो पेड़ है, चादर ओढ़े या खड़ा कोई”

एक और,

“देखो इन्हें ये हैं, ओस की बूंदे”

और एक आखिर में,

“भगवान, कहाँ है रे तू?”

सबका कोई न कोई ठाकुर है

Oct 16/2020

नारीवाद और feminism में एक अंतर है, जहां नारीवाद मौलिक अधिकारों की लड़ाई है वहीं feminism एक power struggle. अनुवाद में बहुत कुछ खो जाता है, जैसे कि हिन्दू राष्ट्रवाद और Hindu Nationalism का अंतर। Individualism पाश्चात्य सोच है, और इसका जन्म मनुष्य की एक कमी के कारण हुआ है और वो है मतलबीपन या अहंकार। एक आम आदमी की दृष्टि से देखें तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। Individualism के कई फायदे हैं।

समाज की गुणवत्ता उसमें रहने वाले लोगों से बनती है। जैसे लोग वैसा समाज। अपना समाज हमेशा अच्छा लगता हैं। अपने लोग हमेशा अच्छे लगते हैं। कभी कभी नहीं भी लगते, और जब नहीं लगते तो फिर हम पलायन कर लेते हैं।

हमारे अनुभव अलग अलग हैं और इसलिए हमारे विचार भी। कुछ अहंकार है, कुछ संस्कार है, और कुछ आनुवंशिकी, आजकल काफी कुछ तकनीकी भी है।

मुझे ज्ञान बांटने का कोई शौक नहीं है क्योंकी मेरा हाल जैसे कि कहते हैं, “बड़ी बड़ी बातें, वडापाव खाते” वाला है। लेकिन कभी कभी लिखना पड़ता है क्योंकि जब कोई विचार समझने के बाद भी चम्मच से खाना चाहता हो जिसे अंग्रेज़ी में spoon-feed कहते हैं, तो लिखना आवश्यक हो जाता है।

बिना पिये कुछ नशा हो जाये तो व्यक्ति क्या करे। संस्कृतियों के इस तंत्र में हर कदम फूंक फूंक कर रखना थोड़ा तो कठिन है ही, खासकर तब जब दिव्यांग रहने की इतनी आदत लग जाये कि व्यक्ति आंखें ही न खोलना चाहता हो।

कभी कभी आंखें इतनी बंद हो जाती हैं कि व्यक्ति या तो स्वयं corporate मवाली बन जाता है, या किसी corporate मवाली को पहचान नहीं पाता। मुझे पूंजीवाद से कभी कोई दिक्कत नहीं रही। पूंजीवाद का विरोध करने वालों से एक बार कहिये की वो अपने घर में किसी को मुफ्त में रख लें। विरले ही होंगे जो ऐसा करेंगे। हां, मुश्किल तब होती है जब किसी की अधूरी कहानी या उपन्यास के पूरा होने से पहले ही वो विक्षिप्त हो जाये, या फिर स्वयं विक्षिप्तता फैलाने का एक कारण बन जाये। खैर, एक पुरानी कहावत है, जिसकी लाठी उसकी भैंस।

इरफान खान को एक कविता पढ़ते हुए इंटरनेट पर देखा, ठाकुर का कुआं। हम सब का कोई न कोई ठाकुर है, यहां तक की ठाकुर के भी ठाकुर हैं। जिसके ठाकुर नहीं हैं उसके ठाकुर जी हैं।

राक्षसों को दंड देना आवश्यक है, अगर राज करने वाले स्वयं राक्षस न हों तो। जो कि काफी कठिन है। मेरे विचार से भले दैत्यों को उनके प्रकार (समाज) के साथ रहने देना चाहिए। देवताओं और असुरों में रस्साकशी चलती है। असुर उपद्रवी अवश्य हैं पर जैसा कि हम लोगों ने पढ़ा और टी वी पर देखा है, देवताओं ने भी स्वर्ग के सिंहासन पर आधिपत्य जमाये रखने के लिए कम चतुराई और कभी कभी कुटिलता नहीं दिखाई। निकट दृष्टि दोष के लाभ हैं, और ये आवश्यक नहीं कि निकट दृष्टि दोष वाले से दूरदर्शन का भी कार्य लिया जाए।

तर्क, कुतर्क और चमत्कार

Oct 16/2020

भारतीयों को व्यंग्य बहुत अच्छे से समझ आता है पर यही बात मैं sarcasm के लिए नहीं कह सकता। आप जीवन में चमत्कार की आशा रखते हैं। लोगों के घर आने पर आप फिल्टर्ड पानी पिलाते हैं और दूसरों के घर जा कर गंदा पानी पीते हैं।

एक दिन अचानक आप अज़ान के समय उठ जाते हैं। क्यों? क्योंकि शायद आप का अपना देश आप को आपकी औकात दिखा रहा होता है। या शायद वो आपका देश न हो, कोई और मुल्क हो।

पाप पुण्य के नियम हैं, सख्त हैं, ठीक है। दंड भी बनता है। पर क्या ये नियम सबके लिए हैं?

जीवन और मनुष्य क्या इतना छिछला है कि उसे समोसे और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ नहीं दिखता? बिनोद राम के पीठ पर कूबड़ निकल आता है, और जब वो विरोध करता है तो मार्क्सिस्ट बन जाता है।

जूलियस असांज बलात्कार के केस में जेल जाता है और कहीं किसी सामान्य आदमी को इतना डराया जाता है कि वो उग्र हो जाता है। ध्यान रखिये भाइयों और बहनों, बस कुछ समय के लिए उग्र, उग्रवादी नहीं।

हिन्दू राष्ट्रवाद ज़मीन पर धमाल मचाता है वहीं कला जगत में संस्कृति का अल तक्किया होता है। मनोरंजन मनोरंजन नहीं रहा, आपको जांचने का बस एक साधन मात्र हो गया है।

शिव बाथरूम से निकल कर भागते हैं, क्योंकि कोई आपकी आस्था का वो ही मोल लगाता है। कोई आस्था को परे रख कर प्रमाण और विज्ञान की राह पर चलता है तो क्या वो ईशनिंदा है?

भेड़ बकरियों की तरह जीवन व्यतीत न करने की इच्छा रखना क्या एक स्वप्न है? बेहूदे लोगों से अनुशासन की इच्छा रखना क्या ग़लत है? यहां पर चमत्कार की बात आती है। और यहीं पर बात आती है विधि के विधान की।

Wednesday, 3 November 2021

Pining

The cigarette was still burning in the ashtray. He was standing near the window looking out at the stars. It was a lonely mansion at the top of the mountain, surrounded by a forest and at present covered with snow. He missed her. They used to come to this place every winter the the four years they had been together. Now, she was outside the country and he was alone, it didn't work out from her side. He had never trusted women in his life except his mother and then came her and it was like a dream, at least the four years they were together, and now he was alone at the family mansion his grandfather had bought when he was just a kid. He was alone in the mansion and trapped for at least a fortnight because of the snow, but since he had gotten all the supplies when he came, there was not much to worry. In the day he would drink coffee and read books, and at night he would gaze at the stars, sometimes missing her. There was this intense longing for her. The way she would snatch the cigarette from his mouth and smoke it her self. The way she would force him to get out of bed and make her coffee. The snow laden trees which would look bright and dull in the day would shine like radium in the moonlight at night. And here was he looking at the stars alone. He went inside, picked another cigarette from the pack and lit it. The electric fireplace had kept the room warm and filled with a yellowish glow. He was pining for her, but he was not feeling alone. He had no reason to feel alone, he liked it alone. Out here at the lonely mansion at the mountain top, under the countless stars it felt like he was alone in the universe. For some this thought might be frightening, not for him. He had entertained the idea of being alone in the universe before, at the same place. He just needed coffee and cigarettes, and her, but since she was not here anymore, just coffee and cigarettes. He wondered how people got cabin fever, he actually liked being trapped for days together in this house. He took a puff of his cigarette and looked at the a bright star in the sky. He played again with the idea of being all alone in the universe. This time not even thinking about her. Very narcissistic he thought, but then she had sailed away for better prospects, better prospects than being with him in the sheets and smoking cigarettes in a room yellowed and warmed by a fireplace in a quaint mansion atop a mountain. It's nobody's fault, and he knew that, and it's not his fault that his heart still pines for her. He went back to the idea of being all alone the universe. A scientific Adam, without an Eve. He never knew that an existential horror could be such a comforting idea. But at present, in the lonely mansion atop a snow covered mountain top surrounded by a forest, it was. 

Wednesday, 8 September 2021

Ardhanarishwar

 


Anandi couldn't understand why Bhaskar was avoiding her ever since she met him when he came to Pune. He had completely stopped taking her calls ever since he returned from Pune. They had met online in a chatroom and then they graduated to phone calls. They made love when Bhaskar had come to Pune. But after he returned back to Lucknow he kept ignoring her calls. She finally found Bhaskar's mother on facebook after much effort and connected to her. His mother called her to Lucknow without telling her about Bhaskar.

Here she was, standing outside a mental hospital. His mother has told that he was admitted here, soon after he had returned from Pune. She went in to meet him. The orderly took her to his room. Here was Bhaskar making drawings of the combined for of Shiva and Parvati muttering ardhanarishwar, ardhanarishwar under his breath. She went close to him, and he got startled. "Take IT away from me!" he bellowed, and the orderly politely asked her to remove herself from the room. The doctor of the facility was standing outside the room. He looked at her and calmly said, "See this? He thinks that he had sex with a transgender when he went to Pune. Has been obsessed with Ardhanarishvar form of Shiva and Shakti ever since." Anandi knew that was her and wondered what made him think of her as a transgender.

Competent Authority

You imagine a girl painting a picture of you as Tyler Durden from fight club. A pizza delivery boy goes to deliver a pizza at a whorehouse. ...