An archive of my writings and a place for my writing experiments and projects.
Sunday, 11 February 2024
अंतर्द्वंद
एक लेखक को लिखने के लिए क्या चाहिए? मैंने पहले भी हिंदी में लिखने का बहुत प्रयत्न किया परंतु असफल रहा क्योंकि हिंदी की परिस्थिति इस देश में बहुत अच्छी नहीं है। मैंने काफी चीज़ें देखी और समझी हैं और मुझे इस देश में उत्पीड़न की व्यवस्था पूरी तरह से समझ में आ चुकी है। हिंदी साहित्य का पतन कर दिया गया है ताकि लोगों में से मानवता खत्म हो जाए। अभी हाल में जब हिंदी मासिक हंस पढ़ी तो उसमें एक लेखक की बोजैक हॉर्समैन आधारित कहानी देख कर चौंक उठा। हिंदी साहित्य के पतन का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हैं। हिंदी साहित्य अब आसानी से नहीं मिलता। इंस्टाग्राम से जुड़े लोगों में अब साहित्य पढ़ने की आकांक्षा नहीं रही, और बाकी लोगों को जीविका से ही फुर्सत नहीं जो वो साहित्य पर ध्यान दें। ढंग का साहित्य अब मिलना ही कठिन है। मेरा हिंदी में लिखने का एक कारण ये भी है। अंग्रेजी बोलने एवं लिखने के कारण मिली प्रताड़ना की वजह से मैंने हिंदी में लिखने का कदम उठाया है। यह जानते हुए भी की अंग्रेजी की वजह से मिली हुई प्रताड़ना दरअसल बलात्कारियों द्वारा किया गया उत्पीड़न है जो अंग्रेजी भाषा को व्यक्ति की हैसियत से जोड़ते हैं। मेरा लिखने का वास्तविक लक्ष्य कलात्मकता और कैथार्सिस है। वो तो मुझे हिंदी लिखने से भी मिल।जायेगा। इन घिनौने हरामजादों ने लोगों का उत्पीड़न और बलात्कार करने की सारी हदें पार कर दी हैं पर इसके बारे में अब कुछ नहीं किया जा सकता। जो है सो है। मुझे आज भी याद है की 2004 में मैंने भय के कारण स्वयं से वार्तालाप करना बंद कर दिया था। उस समय मैं एक बालक था, परंतु कमी मेरी ही थी, मैं व्यवस्था और आदर में विश्वास रखता था और बड़ो के आदर की वजह से उनका विरोध नहीं करता था, न ही उनके बारे में गलत सोचता था। परंतु सब लोग अपने नहीं होते और न ही सारी जातियां एक समान होती हैं। कुछ लोगों को आदर रास नहीं आता। खैर मैं जैसा हूं वैसा तो हूं ही। अब मेरे में काफी परिवर्तन आया है, मैं अपने मन में आदर उसी व्यक्ति के लिए रखता हूं जो आदर के लायक हो। भारतीय समाज इतना घिनौना होगा इसकी मुझे कोई आशा न थी परंतु पिछले एक दशक में मैं इस समाज को अंदर से ले कर बाहर तक जान चुका हूं जिस प्रांत और देश में बलात्कारियों और अपराधियों के हाथो में लोगों के मस्तिष्क और शरीरों और उनके विचारों और भावों का नियंत्रण हो वो आदर के लायक नहीं। मैंने काफी कुछ खोया है। इस घिनौने प्रांत ने मुझे पीड़ा के अलावा कुछ नहीं दिया। वास्तविकता घिनौनी है और इस बारे में कुछ किया भी नहीं जा सकता। मुझे अभी भी समझ नहीं आया कि मैं अपनी पहचान को स्वीकार क्यों नही कर पाया। पहचान को ले कर मेरा अंतर्द्वंद काफी पुराना है और वह मेरे स्कूल के एक मित्र के घर जाने पर और गाजियाबाद में हुए एक क्विज में हुए आभास के बाद से शुरू हुआ। मेरे पास अगर सही मार्गदर्शन होता तो चीज़ें इतनी बुरी नहीं होती परंतु ऐसा होना असम्भव था। मेरा सैबोटेज काफी कम उम्र से ही शुरू हुआ था जिसका आभास मुझे पिछले कुछ सालों में ही हुआ। मैं अपने आपको इतनी गंभीरता से नहीं लेता, न ही मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी है। दिक्कत सिर्फ एक ही है और उसकी जड़ का मुझे पता नहीं चल पा रहा। ऐसा क्या कारण है जिसकी वजह से मैं इतना भयभीत हो गया। मेरी उम्मीद है की लिखते रहने के कारण मैं उस कारण तक पहुंच पाऊंगा जिसकी वजह से मुझे स्वयं से मुंह मोड़ना पड़ा। मेरे पास अब काफी कारण है जिनकी वजह से मैं अपने आप से मुंह न मोडू। मुझे बातों की गहराई में जाना पड़ेगा जिसके लिए मैं पहले से तैयार हूं।
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