चीड के वृक्षों के बीच बैठा आग जला के सोचता कुछ वह,
सामान से लदी थी उसकी मोटरसाईकिल और बगल में लगा उसका तम्बू,
थोड़े आराम के बाद फिर वह स्वीकारेगा पहाड़ो का न्यौता.
तब तक आग पर भूनते हुए आलू और गरम करते दलिया सोचता,
यूँ न होता तो क्या होता.
उसकी आग से उठता धुआं बढ़ा पहाड़ों की तरफ,
उनकी धुंध में फिर जा के मिलेगा ये धुआं,
इस सोच में वह खुद को डुबोता,
कैसे मिल जाता है धुंए को अपना रास्ता,
यूँ न होता तो क्या होता.
तापता आग विचारता फिर वह कुछ स्वयं पर,
भूत की धुंध में मिलता वर्तमान का धुआं,
धुंए ने धुंध को काटा और बैठा वह रोता,
याद करता भूत और बडबडाता,
यूँ न होता तो क्या होता.
भूत की छटती धुंध के साथ उजला होता भविष्य,
आँखों से गिरते अश्रु धुलते भविष्य की कालिख.
देखा उसने तम्बू की ओर पर अब वह कैसे सोता,
उठ खड़ा हुआ वह वह सामान बांधता मुस्कराता सोचता,
यूँ न होता तो ये न होता.

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