मनु की डायरी के कुछ अंश (२०१०)
१३/१/१०
आज का दिन बहुत अच्छा गुजरा. कॉलेज में बहुत मज़े आये पर शाम को जब मैं घर वापस लौट रहा था तब एक अजीब बात हुई. मैंने एक काली साड़ी पहने हुई औरत को देखा पता नहीं उसको देख कर मुझे इतना अजीब क्यों लगा. उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जो मैं बयान नहीं कर सकता. उसने माथे पर लाल रंग की बिंदी लगा रखी थी जो उसके सफ़ेद चेहरे की वजह से और चमक रही थी. उसकी चमड़ी पीलापन लिए हुई सफ़ेद थी जो उसकी काली साड़ी और काले बालों और काजल की वजह से और सफ़ेद दिख रही थी. मुझे देख कर वो मुस्कुराई पर पता नहीं क्यों उसकी मुस्कराहट से मुझे डर लगा. शाम से ही मैं उसके अलावा कुछ और नहीं सोच पाया हूँ. शायद यहाँ लिख देने से कुछ राहत मिले.
१३/२/२०१०
आज एक महीने बाद मैंने फिर उसी काली साडी वाली औरत को देखा. उसी काली साड़ी वाली औरत को. आज जब में कालेज में लेक्चर सुन रहा था. वो खिड़की के बाहर खड़ी थी. मुझे पता नहीं वो कालेज क्यों आई थी. जब तक लेक्चर चला वो खड़ी हो कर मुझे देखती रही. लेक्चर के बाद जब मैं बहार निकला तब वो वहां नहीं थी. उस समय के बाद से ही मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा. मेरे दिमाग में उसी का चेहरा घूम रहा है. ध्यान बटाने के लिए मुझे कुछ करना पड़ेगा.
२६/२/१०
आज ठीक तेरह दिन बाद फिर से वही औरत मेरे क्लास की खिड़की के बाहर खड़ी हो कर मुझे देख रही थी. मैं बार बार उसे देख रहा था इसकी वजह से प्रोफ़ेसर ने मुझे क्लास से बहार निकाल दिया. बाहर निकलने पर फिर से वहां कोई नहीं था. शाम को घर लौटते हुए वो फिर मुझे रोड पर दिखी. मुझे समझ नहीं आ रहा की उसे देखने पर मुझे इतना अजीब क्यों लगता है.
१३/३/१०
आज मैंने उसे फिर देखा. वो मेरे घर के बाहर खड़ी थी. मुझे पता नहीं उसे मेरा घर कैसे पता चला. आज मुझे पक्का हो गया की वो मेरा ही पीछा कर रही है. पता नहीं उससे मेरे से क्या चाहिए. जब मैं उससे पूछना चाहता हूँ तो वो मुझे कभी मिलती ही नहीं.
२६/३/२०१०
आज जैसी मुझे उम्मीद थी वो मुझे फिर दिखी. वो फिर कालेज में खिड़की के बाहर खड़ी थी. फिर वो मुझे घर के बाहर भी दिखी. जब में घर पहुंचा तो वो मेरे घर के बाहर खड़ी थी. मैंने माँ को भी उसके बारे में बताया पर माँ ने किसी वैसी औरत को नहीं देखा था.
२७/३/१०
कल रात मैंने एक सपना देखा. मैंने देखा की वो औरत मेरे घर का दरवाज़ा खटखटा रही थी, जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, वो अचानक अन्दर घुस के जोर जोर से हंसने लगी. उसको हँसते हुए देख कर मेरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन उठी. आज सुबह से ही मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा था. पता नहीं क्या हो रहा है मुझे.
१४/४/१०
आज मैं डाक्टर के पास गया था. डाक्टर ने कहा है की पढाई का ज्यादा तनाव लेने से कभी कभी ऐसा होता है. उसने मुझे दवाइयां दे दी हैं. शायद अब मुझे इस बीमारी से छुटकारा मिल जाए.
२२/४/१०
कल रात में सोते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी छाती पर कोई भारी वज़न रखा हो. ऐसा जैसे कोई इंसान चढ़ के मेरी छाती पर बैठा हो. मुझे बिलकुल सांस नहीं आ रही थी. जैसे ही मैंने आने आँखें खोली वो ठीक मेरे पलंग के सामने खड़ी थी. मैं डर के मारे कापने लगा था. फिर मैं चीख के उठा और मुझे पता चला की वो भी सपने का ही एक हिस्सा था.
२६/४/१०
अब वो औरत मुझे मेरे कमरे की खिड़की के बाहर भी दिखाई देने लगी है. रात में जब में सोता हूँ तो वो खिड़की के बाहर से खड़ी हो कर घूरती रहती है. उसकी लाल बिंदी और पीला चेहरा चांदनी में चमकता है. कभी कभी वो मुझे देख कर मुस्कुराती है और तब मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता.
२९/४/१०
आज मुझे अपने कालेज के चौकीदार से उस औरत के बारे में पूछा. उसने किसी ऐसी औरत को क्लास की खिड़की के बाहर नहीं देखा था. उसी से मुझे पता चला की मेरे कालेज के बगल में एक घर में एक बंगाली परिवार रहता था. पति, पत्नी और एक बच्चा. पति पत्नी की एक कार दुर्घटना में मौत हो गयी थी और बच्चे को उसके चाचा ने गोद ले लिया. चौकीदार ने ये बात इसलिए बताई क्यों की उस बंगाली औरत का हुलिया मेरे बताये हुलिए से बहुत मिलता है. साला अन्धविश्वासी.
३/५/१०
कल रात फिर मैंने उस औरत को सपने में देखा. आज उसके साथ एक बच्चा भी था. उसके चेहरे पर अजीब भाव थे जो मैं समझ नहीं पाया. फिर से मुझे सांस लेने में दिक्कत होने लगी. मैंने आँखे खोली तो सामने खिड़की के बाहर वो मुझे देख कर हंस रही थी.
५/५/१०
आजकल मेरी तबियत बहुत ख़राब रहती है. मैं शरीर से भी बहुत कमज़ोर होता जा रहा हूँ, थोडा सा काम करने पर ही मुझे चक्कर आ जाते हैं. आज मैं कालेज में चकरा के गिर पड़ा. आज फिर वो औरत मुझे नहीं दिखी. आजकल वो मुझे नहीं दिखती, पर मेरी तबियत ख़राब रहती है. पता नहीं मुझे क्या हो गया है जब देखो कोई न कोई दिक्कत.
७/५/१०
आज मैं अस्पताल में भर्ती हो गया. मेरी तबियत बिगडती ही जा रही है. डॉक्टर का कहना है की मेरे अन्दर खून की कमी हो रही है. पता नहीं मुझे क्या हो गया है.
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डायरी बंद कर के मनु ने बगल की मेज पर रख दी. मनु के डॉक्टर आ चुके थे. आ कर डॉक्टर ने मनु की आँखें देखि.
"मनु, हमने तुम्हारी साड़ी जाचें करवा ली हैं, उनमें कोई गड़बड़ नहीं है, पता नहीं क्या दिक्कत है, तुम्हारी हालत में ज्यादा सुधार नहीं है, हमें कुछ दिन तुम्हे यही रकना पड़ेगा.', डॉक्टर साहब ये कह बगल के मरीज़ के पास चले गए.
मनु लेट गया. उसने अपने बगल के बेड पर देखा. उस बेड पर वही छोटा बच्चा लेटा था जिसे उसने उस औरत के साथ सपने में देखा था.
"मिस्टर. साहा मैंने आज तक ऐसा केस नहीं देखा. आप के भतीजे को तीसरी डिग्री का ब्लड कैंसर है, मुझे इसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, पर पिछले कुछ दिनों में इसने ऐसी प्रोग्रेस दिखाई है जिसने मुझे हैरत में डाल दिया", डॉक्टर साहब अपनी हैरत दिखा रहे थे.
मनु का दिमाग घूमने लगा. उसने आँखें बंद कर ली. जब उसने आँखें खोली तो कमरे में अँधेरा था. उसने उस बच्चे के बेड की तरफ देखा. वो काली साडी वाली औरत बच्चे के सिरहाने बैठे हुए मनु को घूरते हुए मुस्कुरा रही थी. वो एक माँ थी, एक डायन माँ.

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