Saturday, 22 July 2023

A Strange Time In The World

World is a strange place. You start reading public domain classics which you had already read in some form or other and your world starts changing. This is what happens when you live in India, a democracy on the outlook. But then you realise that the setup is global, and you stumble across The Memory Police written by Yoko Ogawa. George Orwell and Aldous Huxley had already written enough, but you couldn't expect this kind of Big Brother setup in India where people do not even have the basic necessities to survive. Orwell had said

    If you want a picture of the future, imagine a boot stamping on a human face—for ever.

The difference between India and other countries is that though people in other countries also have boots stamping on their faces, they at least know how to flush a toilet. The more you know about this country, the more it disappoints you. But then in the outlook things are so ethically perfect that no one can question it, and just suffer on the inside. Orwell had the right idea even back then, during the World War 2 era. Is it safe to assume that technology of mind control was present even back then? How did Huxley get the idea of Brave New World? He had said

    Technological progress has merely provided us with more efficient means for going backwards.

We know that in 21st century nothing can be more true than this. In 21st century everyone is a slave, and the narrative is controlled and contributed to by paid propagandists and idealistic idiots. Idealistic idiots however are just cannon fodder and who would be done away with when time comes. Who would have thought that movies are not made for providing entertainment? I hadn't. Still, they provide entertainment and people watch them for entertainment. To an enlightened mind, movies are useless. Movies play a multifold role, they entertain the cattle class, they gaslight the enlightened and they delude the young, not to mention that they earn money for people who make them. India is becoming progressively worse and the internet is contributing to it. People's online activity is recorded and would be used as a ledger of things to blackmail them or their progeny with. There is not much hope, but then being incurably hopeful is the only way to survive in this country and world. 

Thursday, 29 June 2023

दैव शोषण

अकलेपन और एकाकीपन में अंतर होता है। जब आप अपने अकेलेपन के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं तो आप एकाकीपन के साथ जीने लगते हैं। जीवन में चौकाने वाली घटनाओं के साथ सामना होता है, पर उन घटनाओं का सत्य जानने के बाद आपको आश्चर्य होना बंद हो जाता है। दुख के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। अधीनता, गुलामी, दासता दुख ही देती है खासकर तब जब वो मर्जी के विरुद्ध हो। आपको धोखे से दास बना कर आपका शोषण किया जाता हो और कहीं आप को अपनी अधीनता का आभास हो जाए तो आपको यातनाएं दी जाती हों और आपके जीवन को कुटिल मनोवैज्ञानिक खेलों का मैदान बना दिया जाता हो। इस देश में ये हो सकता है आप सपने में भी नहीं सोच सकते थे, जीवन पर्यंत इस देश का सत्य देखने के बाद भी। आप इस देश और इसकी संस्कृति के दर्शन को मानते थे और अभी भी मानते हैं, इसलिए शायद जीवन भर इसकी वास्तविकता देखने के बाद भी आप मानने से इंकार करते रहे और सोचते रहे की ये बस छुटपुट घटनाएं या उदाहरण है, पूरा देश ऐसा नहीं है। पर एक दशक के भयानक अनुभव के बाद आपको पता चलता है कि ये देश ही ऐसा है, और इस देश को ऐसा जानबूझ कर बनाया जा रहा है। हर तरह की भ्रष्ट्ता कानूनी रूप से मान्य है तब तक जब तक आप पकड़े न जाएं। और असली भ्रष्ट व्यक्तियों के पकड़े जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि वो जिस स्तर पर हैं कानून की वहां पहुंच ही नहीं है। कानून उसके नीचे शुरू होता है। पकड़े वो जाते हैं जो संयमविहीन होने के साथ साथ गरीब भी होते हैं। गरीब और मध्यमवर्ग के लोग रसूख वाले लोगों के लिए चमड़ी का खोल हैं जिनकी चमड़ी के अंदर, जिनके मस्तिष्कों के अंदर घुस के ये लोग वीडियोगेम खेलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस वीडियोगेम में दांव पर वास्तविक जानें लगी होती हैं। राजनीति कभी भी सुंदर नहीं थी, पर राजनीति का ये रूप जानने के बाद दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। सेना, खुफिया विभाग, ये सब, जो मेरे जैसे लोगों का स्वप्न होते है, अपने मायने खो देते हैं। पर ये व्यवस्था वैश्विक है, और मुझ जैसे व्यक्ति का इसके बारे में जानने का कोई मतलब नहीं था। सब से मजे की बात है कि सबसे निकृष्ट प्रजाति के लोग वो लोग निकले जो मेरी दृष्टि में सबसे अधिक सम्मानित लोगों में से एक थे। कलाकार, कहानीकार और लोगों को खबरें और ज्ञान देने वाले। खबरें देने वालों से, खास कर आजकल के खबरें देने वालों से में ऐसी निकृष्टता की उम्मीद कर भी सकता था, पर कलाकारों और कहानिकारों से नहीं। वो व्यक्ति किस बात के कलाकार और कहानीकार जो दूसरों के मस्तिष्कों से चुरा कर कला या कहानी बनाते हों। पर ये सब 2010 से ही शुरू हो चुका था। प्रजातंत्र या गणतंत्र का जो ढोंग इस देश में चल रहा है वो काबिलेतारीफ है, जब कि असलियत में लोगों की यादें और विचार, उनके कौशल और उनका ज्ञान युद्धस्तर पर चुराए जा रहे हैं, वो भी सीधे उनके मस्तिष्कों से। 

सर्वसत्तात्मक अराजकता

मैंने ऐसा समय तक देखा है जहां संगीत की व्यक्तिगत पसंद का भी नियंत्रण किया जाता है, ये बात और है कि इस वक्त समय के जिस दौर में मैं हूं वहां संगीत की मेरी व्यक्तिगत पसंद के कोई मायने नहीं रह गए। मैं बहुत धार्मिक नहीं हूं पर  अगर मुझे कोई सच्ची धार्मिक अनुभूति हुई है तो वो विलियम जेम्स की किताब, द वैराइटीज ऑफ रिलीजियस एक्सपीरियंस पढ़ने के बाद हुई। जैसा जीवन मैंने गुजारा है, जगहों के मेरे लिए कोई मायने नहीं है, सिवाय उन परिवर्तनों के जो अलग अलग जगहों पर जाने पर विचारों, मस्तिष्क और मानस में आते हैं। लोगों के व्यक्तिगत पसंद का नियंत्रण किया जा सकता है; ये बात मुझे तब पता चली जब मेरी संगीत की पसंद और साहित्य की पसंद का नियंत्रण किया गया। जहां तक मेरा विचार है, और जैसा मुझे लगा, महसूस हुआ, ये मेरे छोटे शहर के होने और सामाजिक वर्ग की वजह से किया गया। अब पीछे जीवन में देखता हूं तो अपने प्रति काफी पक्षपात और भेदभाव नजर आता है पर मैंने कभी उसपर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब पक्षपात और भेदभाव इस स्तर तक पहुंच गया कि उसे नकार पाना असम्भव हो गया तब मुझे इस देश में लोगों की परिस्थिति का अनुभव हुआ, खासकर उनकी जो मेरे से भी नीचे के सामाजिक तबके और जाति या संप्रदाय से वास्ता रखते हैं। इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है पर इन सब बातों, जातिगत भेदभाव, तबके या वर्ग आधारित भेदभाव का प्रवर्तन उस स्तर पर किया जाता है जिसके ऊपर कोई स्तर, कम से कम भौतिक स्तर पर अस्तित्व नहीं रखता, और इस भेदभाव का प्रवर्तन भौतिक रूप से भी कहीं ऊपर होता है, बस इसके परिणाम भौतिक संसार में दिखते हैं। मुझ पर इस भेदभाव से भरी यातना का कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि जिन चीजों को मद्देनजर रख कर मुझे यातनाएं दी गई उन चीजों के मेरे जीवन में कोई मायने नहीं थे। इस यातना से मुझे इस देश में स्तरों और तबकों की योजनाबद्ध बनावट का पता चला, और इस बात का भी कि लोगों के मस्तिष्कों से ज्ञान चुरा कर ज्ञान का अथाह भंडार रखने वाले व्यक्ति अक्षम और भ्रष्ट होने के साथ साथ हैवान भी हैं। अगर न्यायसंगत तरीके से सोचूं तो मेरी कोई गलती नहीं थी, मैं उतना ही स्तर चाहता था जितना पाने का मेरा माद्दा था। अपना स्तर बढ़ाने का मुझे कोई शौक नहीं था, और स्तरों पर, खास कर स्तर की वो परिभाषा जिसका परिचय मुझे बाद में हुआ, मेरा कोई खास विश्वास नहीं था। अभी भी आम आदमी मेरे जैसी ही सोच रखता है, और मानता है की व्यक्ति का असली स्तर उसका पुरुषार्थ है। जब की इस देश का, और इस दुनिया का सत्य ये नहीं है। असल सत्य ये है की आप जिस स्तर पर हैं वहीं पर मरेंगे, तब तक जब तक आप का चयन नहीं होता। स्तर या तबका बढ़ने का कारण पुरुषार्थ नहीं बल्कि चयन है। इस बात का पता मुझे कभी नहीं चलता अगर मेरे पास एक ऐसा वैरिएबल नहीं होता जिसने मुझे इस देश के समाज की, इस देश की भाषा की और इस देश के योजनाबद्ध तरीके से नियंत्रित तबकों की सीमा को नहीं दिखा दिया होता। अगर मेरे पास ये वेरिएबल नहीं होता तो मैं भी आम आदमी की तरह गलतफहमी में ही मारा जाता। अब कम से कम मैं गलतफहमी में तो नहीं मरूंगा। मैंने जीवन में कुछ फैसले किए जो घातक थे पर न मरने के कारण वही फैसले बाद में लाभप्रद साबित हुए, असल में लाभप्रद नहीं, बस सत्य से परिचय कराने के संदर्भ में। 

Wednesday, 28 June 2023

आशियाना कॉर्प

बीता हुआ समय वापिस नहीं आता, और आपके जीवन के हिसाब से ये एक अच्छी बात भी हो सकती है और बुरी बात भी। मोहल्ले खत्म होते जा रहे हैं, और उनकी जगह ले रही हैं सोसायटीज। पहले मैं इस बात का शोक मनाता, पर अब मैं कुछ अधिक ही जान चुका हूं तो ये मानता हूं की सोसायटीज ही ठीक हैं मोहल्लों से जहां बेफिजूल की ताक झांक से मुक्ति मिलती है। मोहल्ले हमेशा से ऐसे नहीं थे, पहले मोहल्लों में ताक झांक थी तो प्रेम भी था, लोग मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते थे और उनको भी पता था कि उनको मदद चाहिए होगी तो ये मोहल्ले वासी ही उनके काम आयेंगे। अब अधिकतर जगहों पर मोहल्ले एक वीभत्स रूप धारण कर चुके हैं, प्रेम से भरे पुराने मोहल्ले लगभग खत्म हो चुके हैं, नई सोसायटीज हैं, पर उनमें से ज्यादातर ऐसी हैं जो मोहल्लों का ही एक विकृत स्वरूप हैं। उनमें मोहल्लों की तरह मदद की भावना तो नहीं है पर ताक झांक बराबर चालू रहती है। थोड़ा और ऊपर जाने पर ये ताक झांक खत्म हो जाती है और कोई मतलब नहीं रह जाता। आधुनिकता से सबसे पहले विकृत हुए गांव। गांव छोटे होते हैं और उनकी अपनी राजनीति और अपना प्रजातंत्र होता है। गांव की अपनी एक दुनिया होती है। समाज की विकृतियां बाहर से आकर गांवों में ऐसे फैलती हैं जैसे कोई महामारी। रीतियों के मामले में गांव सबसे ज्यादा नियंत्रित होते हैं, और इस नियंत्रण, आकार के कारण मानव व्यवहार की जानकारी, बाहरी विकृतियों के बारे में जानकारी और स्वयं की अंदर की विकृतियों के कारण गांव शहरों से भी वीभत्स होते जा रहे हैं। गांव सदा से ही वीभत्स रहे हैं, परंतु बाहरी और आधुनिक ज्ञान से इनकी वीभत्सता एक ऐसा आकार ले चुकी है, जिससे वो अपनी सारी अच्छाइयों का भी परित्याग कर चुके हैं। गांवों में अच्छाइयां भी थीं, अभी भी इस देश के कई गांवों में हैं। गांवों में रीतियों का पालन होता है, और कई रीतियां जिन्हे आधुनिकता के मारे रूढ़िवादिता का नाम देते हैं आज भी संस्कृति को बचाए रखने का काम कर रही हैं। इस देश में गांव दो प्रकार से विभाजित किए जा सकते हैं, अच्छे गांव और वीभत्स गांव, और अच्छे गांव वो ही हैं जिन्हे नियंत्रित करने वाले उदार और न्यायसंगत थे। वर्तमान राजनीति गांव के लोगों को गंवार और कैनन फॉडर समझती है, और इस वजह से बचे खुचे अच्छे गांव भी तेजी से वीभत्स रूप ग्रहण करते जा रहे हैं। मैं विचारधाराओं में नहीं पड़ता पर इस देश में समाजवाद के नकाब के पीछे पूंजीवाद का एक ऐसा घिनौना खेल चल रहा है, और शायद आजादी के बाद से ही चलता आ रहा है, कि सोशल मीडिया के आगमन के बाद आम लोगों ने अपने दुखों को भी सोशल मीडिया पर बेचना शुरू कर दिया है। और बेचे भी क्यों न, आम लोगों के पास दुख के अलावा और पूंजी भी क्या है। सुंदर लड़कियां अपने रूप, वक्षों और नितम्बों को सोशल मीडिया पर बेच रही हैं और बाकी लोग अपने दुखों और अनुभवों को। और इस पूरे व्यवसाय में इस बात का खयाल रखा जाता है की नैरेटिव ऊंचे दर्जे का या हाई क्वालिटी का न हो। क्योंकि हाई क्वालिटी का नैरेटिव सिर्फ उन्ही के लिए आरक्षित है जिन्होंने अंग्रेजों के अंडकोषों के नीचे अपने आशियाने ऐसे बनाए कि आजतक उनकी पुश्तें बादलों पर बने महलों में ही रह रही हैं।

रंगदारी व्याकरण

अजीब बात है न, लोगों को विक्षिप्त बनाने के लिए सस्ती फिल्मों का सहारा लेना। प्रोग्रामिंग का हिंदी शब्द शायद प्रोग्रामिंग ही है। तंत्रिका विज्ञान को एक नए निचले स्तर पर ले जाने वाला ये देश ही है। तंत्रिका विज्ञान की प्रोग्रामिंग को हिंदी में कैसे व्यक्त करेंगे? राष्ट्रभाषा के पास शब्द ही नहीं हैं जो इस हैवानियत को व्यक्त कर सकें। न्यूरोलॉजी को गूगल स्नायुविज्ञान बताता है, और स्नायु का अर्थ मसल बताता है। अजीब है न, राष्ट्रभाषा की ये हालत। अपने देश में ही तीसरा दर्जा। तीसरा इस लिए क्योंकि राष्ट्रभाषा का मज़ाक अंग्रेजी बोलने वाले भी उड़ाते हैं और चालू अथवा बोलचाल की भाषा बोलने वाले भी, पर अंग्रेजी का मज़ाक कोई नहीं उड़ाता, सिवाय उनके जिन्हे अंग्रेजी बोलने नहीं आती। भाषा विज्ञान के तीरंदाजों ने हिंदी को कवियों के अलावा किसी तक पहुंचने ही नहीं दिया। पर ये सब मायने ही नहीं रखता जब आप उस दर्जे की सड़न देख लें, जिस दर्जे की सड़न मैंने देखी है। हिंदी घिनौनी राजनीति का शिकार हो गई। जब मेरा सैबोटेज शुरू हुआ था तो सबसे पहले अंग्रेजी ग्रामर का इस्तेमाल किया गया। मुझे ऐसा दिखाया गया की सब मुझे मॉक कर रहे हैं मेरा अंग्रेजी लिखने का तरीका कॉपी कर के, साथ ही साथ मेरे अंग्रेजी व्याकरण का भी मखौल बनाया गया, जो कि मैं मानता हूं की बहुत अच्छा नहीं है पर इतना बुरा भी नहीं है। हिंदी की हालत ऐसी हो गई है की या तो उससे सरकारी सड़न की गंध आती है या फिर धार्मिक व्यवसाय की। या फिर उससे भी बुरा, व्यंग्य की। एक पूरी भाषा व्यंग्य बन के रह गई है, उस देश में जहां वो राष्ट्रभाषा है। वहीं उर्दू, हिंदी की भगिनी, तंबुओं की भाषा, सबको खूबसूरत लगती है, और कोई उसका मज़ाक नहीं बनाता। यहां पर तंत्रिका विज्ञान वाली बात दोबारा बोलने की आवश्यकता है, और तंत्रिका तंत्र की प्रोग्रामिंग की भी; भाषा की हालत को आपको इस नजरिए से जोड़ के देखने की आवश्यकता है, इस देश की वास्तविकता जानने के लिए। अभी की ये हालत है कि अभी तो कम से कम समकालीन संस्कृति से श्रृंगार रस को खत्म कर दिया गया है, श्रृंगार रस की जगह या तो उर्दू ने ली हुई है, या फिर भौंडेपन ने। और मजे की बात ये है की ये सब या तो सौ प्रतिशत प्लान किया हुआ है, या फिर अक्षमता और भ्रष्टता का एक अभूतपूर्व उदाहरण है। ये देश रंगदारी पर चल रहा है, और एक ऐसे स्तर पर जिसके न तो ऊपर कुछ है, न नीचे। 

भ्रम प्रोद्योगिकी

लेखन की अपनी एक विधा होती है। मैं पहले भी लेखन करता था लेकिन पहले मुझे दुनिया के बारे में इतनी जानकारी नहीं, खासकर इस देश के बारे में। मैं सोचता था कि देश की जानकारी हमें अखबारों से मिलती है, लेकिन ऐसा नहीं है, कभी कभी देश के बारे में जानकारी सीधे हमारे मस्तिष्क में डिलीवर होती है। मुझे कुछ हृदय तोड़ने वाली चीजें पता चलीं, ऐसी चीज़ें जिनको जानने के बाद जीवन का कोई मतलब नहीं रह जाता, पर मुझे ये भी पता चला कि प्रेम के लिए व्यक्ति किसी भी नरक में जा सकता है और वहां रह भी सकता है। मैं श्रृंगार रस से भरी लेखनी करना चाहता हूं क्योंकि वीर रस का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। कितने भी वीर बचे हैं या तो वो बेवकूफ हैं या भयानक पीड़ाओं से गुज़र रहे हैं। व्यंग्य के कोई मायने नहीं रह गए क्योंकि ये देश मानवता के नाम पर स्वयं एक व्यंग्य है। मैंने नरक देखा है, और नरक में सदा के लिए फंसे हुए लोगों को भी। मैंने भयानक पीड़ाएं देखी हैं, स्वयं के जीवन में भी और दूसरों के जीवन में भी, पर हृदय को तोड़ने वाली बात ये थी कि ये सब जान बूझ कर किया जाता है। लोगों को जानबूझ कर नरक में भेजा जाता है, उन्हे वहां रखा जाता है और उनकी भयानक पीड़ाओं का आनंद उठाया जाता है। व्यवस्था कुछ ऐसी है कि न आप के विचार आपके हैं न आपके कर्म आपके हैं, बस जो पीड़ा है जो कष्ट है, आपका है। मुझे दस साल लग गए ये जानने में की ये सब टेक्नोलॉजी है जो संस्कृति या कल्चर के हिसाब से एडॉप्ट की गई है। हम सब दास हैं, गुलाम हैं, अधीन हैं, और एक ऐसे स्तर पर जिसपर हिंदी का अंत हो जाता है। हिंदी भाषा में ऐसे शब्द ही नहीं है जो इस स्तर के घिनौनेपन को व्यक्त कर सके, पर ये घिनौनापन ही इस देश का सत्य है। टेक्नोलॉजी कुछ ऐसी है की इस टेक्नोलॉजी को रखने वाला अपने भ्रमों, गलतफहमियों और भ्रांतियों को दूसरों के ऊपर थोप सकता है। संक्षेप में, आप दूसरों की आंखों के गंद का हर्जाना भरते हैं, और संपूर्ण जीवन भरते ही रहते हैं। 

Friday, 16 September 2022

2082

It's 2082, the world has not progressed a bit since the 2020s. Everything is the same, except cars, all the cars in the world have become electric and consumption of fossil fuel by them has totally ceased. In India, an invisible coup has happened and no one knows about it. The people are now unknowingly controlled by a neurological mechanism which feeds emotions and thoughts into people rendering them as automatons. Boys and girls from good families are controlled like this in the India of 2082. They are neurologically possessed by criminals who are employed by those who orchestrated the invisible coup and then these criminals use these good boys and girls for their depraved games. The benefit is twofold, one, these good boys and girls can't rise up in society due to the neurological sabotage for the benefit of the ruling class which has total control over the government now, and two, they act as sources of depraved pleasure for demonic games of criminals who have been employed for the sabotage of these good boys and girls. The gods of depravity would be ashamed if they would see the depraved games being played with these poor, well raised souls. The demons in the deepest pits of hells will weep tears of grief seeing what the criminals do with these innocent. In this India, no one is safe, everyone's memories and sensory data including visual and auditory along with the emotions, feelings and sensations is stored at a centralised cloud. The bodily sensations of a man being cut into half is transmitted to the cloud until the brain is dead, these pain is stored and later relayed back to souls whom the invisible government wants to torture. Externally the world remains as it was in 2020. The technology of neurological possession prevents upward class mobility, and allows the elite an opportunity to play depraved games with real, living, breathing people. People are tortured on whims and fancies of the ones who control the neurological control apparatus. It's like the wild west just that middle and lower class doesn't have any power. Companies force people to buy their products by directly manipulating their neurology. Mental health has become an epidemic and Pharma companies are minting money by selling psychiatric drugs. The future from The Jetsons is nowhere to be seen.

Competent Authority

You imagine a girl painting a picture of you as Tyler Durden from fight club. A pizza delivery boy goes to deliver a pizza at a whorehouse. ...