इतने सालों की भयानक मानसिक प्रताड़ना के बाद, वो भी तब जब मैं खुद अपने शरीर की प्रताड़ना झेल रहा था ने मेरी स्तिथि काफी बुरी कर दी थी. कभी कभी ज़िन्दगी ऐसी ही हो जाती है कि खुद को यकीन ही नहीं होता. मुझे लोगों से कोई शिकवा नहीं है, दुःख सिर्फ इस बात का है कि दुनिया का असल रूप मैं सह नहीं पाया. मैं यहाँ से वहां तक गया, मैंने अपने मर्ज़ का इलाज खोजने की कोशिश की और उस कोशिश के चक्कर में कई ठोकरें भी खायीं.
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