मेरी बेवकूफियों का अंत नहीं है। बेवकूफियों में भाग नहीं लेने का फैसला कर के सबसे बड़ी बेवकूफी करना भी कैसी बेवकूफी है। मैं हिंदी में लिखना पसंद नहीं करता क्योंकि हिंदी में भावनाओं का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है। बचपन में जब मैं बाबा की गोद में बैठ के दूरदर्शन समाचार देखता था तो सोचता था की दुनिया बस इतनी सी है। बाबा मुझे पता नहीं कितनी बार उस जापानी लड़के की कहानी सुनाते थे जो अपनी अंधी बूढी माँ को छोड़ के जहाज़ ले कर उड़ गया ताकि अपनी जान दे कर वो अमेरिका का बड़ा विमान गिरा सके।
रात में छत पे बाबू मुझे पता नहीं कितनी कहानिया सुनाते थे। बड़े हो कर इन कहानियों का कोई मतलब नहीं रहता पर फिर भी बहुत मतलब रहता है। डर के जीने का कोई फायदा नहीं। पर अच्छे लोगों के पास डरने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। यही सच है।
लड़ाके लड़ने के लिए पैदा होते हैं, किसी चीज़ से नहीं तो अपनी किस्मत से। मैं फ़ालतू लड़ाइयां नहीं लड़ना चाहता था पर असलियत जानने के बाद असली लड़ाइयों का औचित्य ही खत्म हो जाता है।
बेहतर है कि ये नकली खेल ऐसे ही चलता रहे। हर समय और हर वक़्त। ईमानदार लोग अपना काम ईमानदारी से करते रहें। मैंने अपना काम काफी ईमानदारी से किया है, और उसका परिणाम मुझे मिला है, अच्छा भी और बुरा भी। मुझे कोई दुःख नहीं है, सिर्फ इसके अलावा कि मेरे पास जानने के लिए कुछ बचा नहीं है।
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