Thursday, 10 November 2016

अपने अनुभवों को अगर मैं लिखने बैठूं तो शायद शब्द ढूँढने पड़ें। किताबों की बातें किताबों तक ही सीमित रह जाती हैं। अगर ईश्वर होता तो शायद वो मुझे समझता, पर मेरा सुकून छोटे छोटे पत्थर के ईश्वरों में ही है। कहते हैं सत्य की विजय होती है, और अगर ऐसा है तो कितना भी घुमावदार क्यों न हो उसकी विजय होनी चाहिए। मुझे मेरी विजय नहीं चाहिए, कभी चाहिए नहीं थी। लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, और अगर उनका ईश्वर है तो वो सत्य जानता है।

मैंने सत्य की खोज कर ली। ईश्वर की खोज के लिए मेरे सत्य को सामने आना होगा। परिणाम जो भी हो, मेरा सत्य मैं जानता हूँ। इस पीड़ा का कोई अंत नहीं है, और विज्ञान के युग में मैं ऐसे किसी चमत्कार की अपेक्षा भी नहीं करता जो मेरे सत्य का लोगो को अनुभव करा दे।

निरर्थक प्रयासों के बाद, ईश्वर से मैं ये ही चाहूँगा की मेरा सत्य सामने आये, क्योंकि ये सत्य सिर्फ देखने का ही नहीं, अनुभव करने का  भी है।

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