रोग और लोग। सरकार और समाज। आज़ादी के इतने सालों के बाद भी अभी बहुत कुछ बदलना है। मेरी समझ में भारत का संविधान शानदार है। मैं हमेशा स्वयं को एक देशभक्त मानता हूँ, क्योंकि हर वो चीज़ जो आपको जीवित रखती है उसके प्रति आपका कर्त्तव्य होता है।
भारत अपने हिसाब से प्रगति कर रहा है, तेज़ या धीमे जैसे भी। कुछ चीज़ें हम बदल नहीं सकते, और कई चीज़ें बदलना संभव है। मैं हमेशा एक ऐसे विश्व की कल्पना करता हूँ जहाँ कोई सीमाएं न हो, परंतु ये एक मुश्किल बात है। जब तक स्वयं को दूसरों से बेहतर समझने वाले लोग रहेंगे तब तक ये मुश्किल रहेगा। लोग बेहतर होते हैं पर उनके कारण होते हैं। इसीलिए मैं सोचता हूँ की जीवन में इतना बुद्धिजीवी बनने का कोई अर्थ नहीं।
क्या हम सच में दूसरों के बारे में सोचते हैं? शायद, जब हमारी अपनी ज़िन्दगी हमारी नज़र में ख़राब हो जाती है, या फिर तब जब हम महान बनना चाहते हैं। सब अपने अपने अनुभवों को शब्दों में ढालते हैं, और सीख देते हैं, अपनी विचारधारा बनाते हैं और दूसरों को उसपर चलने को मजबूर करते हैं।
विश्व का सत्य, धरती जा सत्य नहीं है, और यही सत्य मैं जानना चाहता था। हम सोच सकते हैं की कोई शक्ति हमारा खयाल कर रही है और साथ ही ये भी ख़याल कर रही है कि हम ज़रूरत से ज़्यादा न जाने। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। भय शांति लाता है, पर अंतर की नहीं। अंतर की शांति आती है संतुष्टि से। मैं विश्व का नहीं, पर मैं सांसारिक हूँ, मैं धरती से नाता रखता हूँ। मैं उचित को जानता हूँ और अनुचित को पहचानता हूँ।
जीवन बहुत छोटा है, और कुछ करना या न करना मन पर निर्भर है। लोग अपने नासमझी में जीते रहेंगे, और समझ वाले लोगो को उनका ख़याल रखना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि उनके पास करने के लिए कुछ बेहतर नहीं है।
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