Saturday, 21 March 2015

काफ्का का करेला

हर बार मैं कुछ सोचता हूँ जो गलत हो जाता है। काफ्का अपनी कब्र में सो रहा है। और मैं रातों को जागता रहता हूँ। मैं जो हूँ वही लोग भी है। मैं जो हूँ वही लोग नहीं भी हैं। मैं लोगों को लंबी साँसे लेते हुए देखता हूँ। जिन्दा रहने के लिए साँसे लेना ज़रूरी है। जानवर और इंसान में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। आजकल लोग ज़िंदा हैं पर इंसान के जैसे नहीं, एक जानवर के जैसे। इंसान काफी कम हैं। 'आजकल' ये लफ्ज़ काफी इस्तेमाल होता है। सच्चाई ये है क़ि इंसान हमेशा से ऐसा है। इंसान हमेशा से एक जानवर रहा है। कुछ इंसान अपने अंदर के जानवर के मालिक होते हैं। और उन चुनिंदा इंसानों की वजह से इंसानो की दुनिया में कमज़ोर बचे हैं। क्योंकि कमज़ोर हर चीज़ में कमज़ोर नहीं होता और मज़बूत हर चीज़ में मज़बूत नहीं होता। ये एक मकड़जाल है, जो हम सब को उलझा कर काम  में लगाये रखता है। जोकि एक अच्छी बात है। मुझे खुद में कुछ बातें पसंद नहीं हैं। हर इंसान में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो उसे पसंद नहीं होता। पर कोई ज़रूरी नहीं की जो चीज़ पसंद न हो वो अच्छी भी न हो। करेला कड़वा होता है।

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