Monday, 28 February 2011

नयी सुबह


















कभी कभी लगता है ऐसा रात कभी न जायेगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू फिर कभी न आएगी.

रात अँधेरी छायी सारी दुनिया ये धुंधलाई है,
राह देखते सुबह की सारी कलियाँ ये मुरझाई हैं. 

काले काले चमगादड़ ये लटके लटके हँसते हैं,
समय हमारा बना रहेगा ऐसे फिकरे कसते हैं.

उल्लू की आवाज़ इन कानो में यूँ चुभती है,
ओट में सोयी छोटी बच्ची नींद में चिहुंक उठती है.

किरण सुबह की फूटे कब इसका इंतज़ार है,
रात में जग कर घडी देखता बूढा चौकीदार है.

डर लगता है अब की ये रात कभी न जायेगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू फिर कभी न आएगी.

तम का राज टूटेगा घडी सुनहरी आएगी ,
ठंडी ठंडी ओस की बूँदें घासों को चमकायेंगी.

आस ये अब भी बनी हुई है धूप सुनहरी छाएगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू कभी न कभी तो आएगी.   

   

 

No comments:

Post a Comment

Competent Authority

You imagine a girl painting a picture of you as Tyler Durden from fight club. A pizza delivery boy goes to deliver a pizza at a whorehouse. ...