कभी कभी लगता है ऐसा रात कभी न जायेगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू फिर कभी न आएगी.
रात अँधेरी छायी सारी दुनिया ये धुंधलाई है,
राह देखते सुबह की सारी कलियाँ ये मुरझाई हैं.
काले काले चमगादड़ ये लटके लटके हँसते हैं,
समय हमारा बना रहेगा ऐसे फिकरे कसते हैं.
उल्लू की आवाज़ इन कानो में यूँ चुभती है,
ओट में सोयी छोटी बच्ची नींद में चिहुंक उठती है.
किरण सुबह की फूटे कब इसका इंतज़ार है,
रात में जग कर घडी देखता बूढा चौकीदार है.
डर लगता है अब की ये रात कभी न जायेगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू फिर कभी न आएगी.
तम का राज टूटेगा घडी सुनहरी आएगी ,
ठंडी ठंडी ओस की बूँदें घासों को चमकायेंगी.
आस ये अब भी बनी हुई है धूप सुनहरी छाएगी,
सुबह की ठंडी मीठी खुशबू कभी न कभी तो आएगी.

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