छोटी बच्ची माँ की लाश के पास बैठी रो रही थी. माँ की आँखें उलट चुकी थी. आस पास और लाशें थी. चारो तरफ खून बिखरा था. आज 26/11/09 सी. एस. टी. स्टेशन पर रहने का सबसे गलत दिन था.
आतंकवादी अभी भी बदहवास गोलियां चला रहे थे. मैं भी बाकी पुलिस वालों कि तरह दीवार की ओट में छुपा हुआ था. हमारी पुरानी 303 रायफल ने चलने से इनकार कर दिया था. मेरा एक बहादुर साथी जिसने अभी थोड़ी देर पहले बहादुरी दिखाई थी, सामने ज़मीन पर औंधे मुंह पड़ा था. गोली उसकी आँख से होती हुई उसके दिमाग से आर पार हो गयी थी.
मैं ओट से उस बच्ची को रोते हुए देख रहा था. लोग अभी भी भाग रहे थे. आतंकवादी अभी भी आराम से अपनी ए. के. 47 के शिकार चुन रहे थे. मेरा ज़मीर मुझे धिक्कार रहा था पर मैं कर भी क्या सकता था. 303 ले कर मैं ए. के. 47 का मुकाबला कैसे करता?
तभी मेरी नज़र मेरे मरे साथी के बगल में पड़ी पिस्टल पर पड़ी. मैंने फिर उस रोती बच्ची को देखा. उसे बचाना मेरा फ़र्ज़ था. गोलियों कि बौछार अभी भी जारी थी पर मुझसे रुका नहीं गया. मैंने झुक कर वो पिस्टल उठा ली. एक लम्बी सांस ले कर मैं प्लेटफ़ॉर्म कि तरफ भागा.
मुझे दौड़ते हुए देख कर आतंकवादियों ने मुझ पैर गोलियां चलाना शुरू कर दिया . मैंने उनकी तरफ दौड़ते हुए चार फायर किये. शायद उन दोनों में से एक को गोली लगी.
मैं बच्ची कि तरफ भाग रहा था तभी एक के बाद एक दो गोलियां मेरे सीने में लगी. मैं ज़मीन पर गिर गया. मेरे आस पास खून फैला था. मेरा अपना खून. मुझे अपनी बच्ची कि याद आई. मैंने अपना बटुआ निकला और उसकी तस्वीर देखी. मैं फ़र्ज़ निभाते हुए अपनी जान दे रहा था, एक पुलिस वाले का फ़र्ज़. पर एक बाप के फ़र्ज़ का क्या? वो तो अब मैं कभी नहीं निभा पाऊंगा.
मैंने एक गहरी सांस ली और लेटे हुए अपनी मौत का इंतज़ार करने लगा. वो छोटी बच्ची अभी भी अपनी माँ की लाश के पास बैठी रो रही थी.

Gud work man .keep it up..never knew tat ter was sch a hidden talent n u...though reading hindi aftr a long tym aftr my skl days, sum hw i managd readng it n understud the meang..
ReplyDelete