Saturday, 9 October 2010

काम का सामान


आखिरकार वह मेरी गिरफ्त में आ ही गयी. दंगों का असली फायदा तो ये ही होता है. उस घर में उसके साथ बस एक बूढ़ा था जिसका एक ही डंडे में काम तमाम हो गया था. अब इसकी बारी थी. लेकिन इतनी जवान और खूबसूरत लड़की को बेजा थोड़ी जाने देंगे! सोलह सत्रह बरस की होगी वो. हिरन सी डरी आँखें थी उसकी, काजल आँखों से बह कर गालों पर आ गया था.

मेरे पीछे चार और खड़े थे लाइन में. मैंने शलवार का नाडा खींच दिया. उसकी गुलाबी टाँगे घुटनों से काँप रही थी. हैरत की बात ये थी कि वह कुछ बोली नहीं, न चीखी न चिल्लाई. हम पाँचों ने बारी बारी से अपना काम पूरा किया. अब बारी थी उसको उसके खुदा के पास पहुचाने की.

तभी दरवाजा टूटा और दूसरी तरफ के बलवाई अन्दर आ गए. कुछ दर्दनाक लम्हों के बाद हमारा काम का सामान उसके हाथों में था.

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