एक बेहद एकाकी अंतर्मन में कहीं कुछ उथल पुथल है। ये गुफाओं की तरह है, ये मन। गहरी स्याह गुफाएं। एक अकेला योद्धा अपने पथ पर बढ़ता हुआ। मैं क्या कर सकता हूँ ये सोचने वाली बात है। संस्कृतियों का मेल हो रहा है और अब सब कुछ आपस में मिल रहा है। मैं क्या हूँ मैं ये जानता हूँ पर स्वयं को पाना और बनाना ऐसी चीज़ें हैं जिनका कभी अंत नहीं होता। मैं डरा नहीं और मैं चलता रहा। मैंने स्वयं को ऐसी चीज़ों का परिचय दिया जिनको सहन कर पाना मेरे लिए कठिन था। मैं रुका नहीं और न ही मैं डरा। जो सत्य है वो है, और हमेशा रहेगा। मैं क्या हूँ ये न तो मुझे दूसरे बताएँगे और न मैं सुनूँगा।
आगे बढ़ने के लिए लोग कई चीज़ें करते हैं। मैं भी कई चीज़ें कर रहा हूँ। पर बृह्माण्ड और संसार का सच जानते हुए भी सत्य के लिए लड़ना ही मकसद है। प्रकृति कमज़ोरों के लिए नहीं है और संसार का सच प्रकृति का सच नहीं है। प्रकृति का सच जानते हुए भी संसार के सच का साथ देना ही मेरा कर्त्तव्य है।
साँसे आगे चलती रहेंगी और मैं एक दिन मिट्टी में मिल जाऊँगा। उस दिन तक सत्य और शांति के लिए लड़ना ही मेरा लक्ष्य है। सत्य कड़वा होता है, पर उसे मीठा बनाना मेरा काम है। प्रकृति का सच न सही तो संसार का ही सही।