Wednesday, 31 August 2011

भागती भूखी ज़िन्दगी.....



रेलवे क्रासिंग पर पिता के साथ स्कूटर पर बैठा मैं,
देखता चारो ओर सड़क, लोग और दुकाने, 

जानवर जैसे कुत्ते, सूअर और गाय,
कुछ भागते, कुछ चलते और कुछ पगुराते, 

लोग भी कुछ वैसे ही, 
कुछ भागते, कुछ चलते और कुछ पगुराते,

सड़क पर दौड़ती गाड़ियां, 
और उनमे बैठे लोग,

फिर मैंने देखा एक सूअर का परिवार, 
मादा और उसके पांच बच्चे,

काली गन्दी बदसूरत माँ,
और उसके नन्हे गुलाबी शावक,

उछलते अपनी माँ के पीछे,
उसके स्तनों से अपनी क्षुधा तृप्त करने को,


गुलाबी शावक माँ के पीछे,
करते वह सड़क पार,

पर वह संभव न हो पाया,
सबके लिए तो नहीं  कम से कम,

उनमे से एक जीवित रहा, 
अपनी क्षुधा तृप्त करने को,

बाकियों के सुन्दर गुलाबी शरीर रह गए सड़क पर,
ट्रक के चौड़े  टायरों के बीच एक लाल मलीदे के रूप में,

कुछ लोगों ने देखा और भागे उस ओर,
बातें सुनी कुछ उनकी और सुना ' रात का भोजन',

उठा लिए गए  शावको के शव, 
क्षुधा तृप्ति ही कारण और अंत,

क्रासिंग का फाटक  खुला,
आगे बढ़ चला स्कूटर ,


पीछे छोड़ते हुए लोग और पशु,
कुछ भागते, कुछ चलते और कुछ पगुराते.

 

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